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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समय पांच देशों के विदेश दौरे पर हैं. पीएम मोदी के नॉर्वे दौरे के दौरान एक महिला पत्रकार की टिप्पणी की काफ़ी चर्चा है.
दरअसल नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास स्टोर के साथ साझा बयान के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से महिला पत्रकार हेला लेंग सवाल पूछना चाहती थीं, जबकि प्रधानमंत्री वहाँ से जाते दिखाई दे रहे हैं.
हेला लेंग ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में कहा है कि पत्रकार होने के नाते सवाल पूछना उनका काम है और जब कोई ताक़तवर देश उनके छोटे से देश में आता है और उनसे संबंध मज़बूत करना चाहता है, तो सवाल पूछना उनकी ज़िम्मेदारी है.
सोमवार को नॉर्वे की राजधानी ओस्लो के एक वीडियो में पत्रकार हेला लेंग को यह कहते हुए सुना जा सकता है, “प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवालों को क्यों नहीं लेते?”
प्रेस कॉन्फ़्रेंस में उनकी और भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के बीच हुई तीखी बहस की भी काफ़ी चर्चाएं हैं. हेला ने इन सभी मुद्दों पर बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से विस्तार से बात की है.

पीएम मोदी से सवाल पूछने के समय क्या-क्या हुआ था?
सबसे पहले हेला से पूछा गया कि उनका पूरा परिचय क्या है? इस सवाल पर उन्होंने कहा, “संक्षेप में कहूं तो मैं पिछले पांच साल से ज़्यादा समय से पत्रकार के तौर पर काम कर रही हूं. मैंने नॉर्वे के राष्ट्रीय अख़बारों के साथ काम किया है. अपने पिछले अख़बार के लिए मुझे अमेरिका चुनाव कवर करने के लिए भी भेजा गया था. और अब मैं वापस नॉर्वे में हूं, जहां राजनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को कवर करती हूं. लेकिन अब एक कमेंटेटर की भूमिका में हूं.”
हेला लेंग उस कार्यक्रम में मौजूद थीं जहां भारत के प्रधानमंत्री नॉर्वे के प्रधानमंत्री के साथ मौजूद थे और दोनों ने साझा बयान दिया था. उनसे पूछा गया कि उस समय वहां क्या-क्या हुआ था?
इस सवाल पर उन्होंने कहा, “जब भी कोई राष्ट्रप्रमुख नॉर्वे आता है तो सड़कों पर काफ़ी पुलिस तैनात रहती है और कुछ सड़कें बंद कर दी जाती हैं. पूरा सिस्टम बहुत सख़्त होता है. आपको ये अच्छे से पता होना चाहिए कि मान्यता यानी एक्रिडिटेशन के लिए कैसे आवेदन करना है और वहां प्रवेश कैसे मिलेगा.
कल हम प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़े एक दफ़्तर गए. लेकिन हम उस जगह पहुंचे जहां प्रेस ब्रीफ़िंग हो रही थी. फिर दोनों नेता कमरे में आए और बोलना शुरू किया.”
“सबसे पहले नॉर्वे के प्रधानमंत्री ने भारत और नॉर्वे के रिश्तों और दोनों देशों के संबंध मज़बूत करने के एजेंडे पर बात की. उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने भी अपनी सोच और इस राजकीय दौरे के उद्देश्य के बारे में बात की.”
“नॉर्वे में आमतौर पर ऐसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में यही होता है. नेता प्रेस से बात करते हैं और फिर कुछ सवाल भी लेते हैं. उदाहरण के लिए, पिछले साल जब मैक्रों (फ़्रांस के राष्ट्रपति) यहां आए थे, तब उन्होंने नॉर्वे के पत्रकारों के सवाल लिए थे.”
हेला ने कहा, “मैं ये मानती हूं कि पत्रकार होने के नाते सवाल पूछना हमारा काम है. जब कोई ताक़तवर देश हमारे छोटे से देश में आता है और हमसे संबंध मज़बूत करना चाहता है, तो सवाल पूछना हमारी ज़िम्मेदारी है. मुझे पता है कि आपके प्रधानमंत्री सवाल लेना पसंद नहीं करते, लेकिन सवाल पूछना मेरा कर्तव्य था.”
क्या पत्रकार को पता था पीएम मोदी सवाल लेंगे?

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब विदेश दौरे पर जाते हैं तो बहुत कम मौकों पर उन्हें सवाल लेते देखा गया है. विदेश में अब तक सिर्फ़ दो मौकों पर (अमेरिका दौरा- जून 2023 और फ़रवरी 2025) ही उन्होंने सवाल लिए हैं. ऐसा अक्सर नहीं होता.
हमने हेला से पूछा कि क्या वहां पहले से ये बताया गया था कि दोनों प्रधानमंत्री सवाल लेंगे?
इस पर हेला ने कहा, “नहीं. हमें पहले से पता था कि सवाल नहीं लिए जाएंगे.”
“और यही बात मेरे काम को और ज़्यादा अहम बना देती है. क्योंकि हम किसी विदेशी नेता को यहां आकर लोकतंत्र की परिभाषा तय करने की छूट नहीं दे सकते.”
“लोकतंत्र क्या है? आपके प्रधानमंत्री दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने की बात करते हैं. लेकिन लोकतंत्र क्या होगा, अगर आपके देश के सबसे ताक़तवर व्यक्ति से सवाल पूछने की गुंजाइश ही न हो?”
“भारत में प्रेस की आज़ादी और मानवाधिकार उल्लंघनों की स्थिति को देखते हुए, ये मेरा कर्तव्य था कि मैं इतने बड़े देश के सबसे ताक़तवर व्यक्ति से सवाल पूछूं.”
नॉर्वे प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में सबसे ऊपर रहता है और भारत हाल के वर्षों में गिरकर 157वें स्थान पर पहुंच गया है. नॉर्वे में काम करने वाले एक पत्रकार के लिए प्रेस फ्रीडम इंडेक्स कितना अहम है, वो भी तब जब आपके देश आए किसी विदेशी राष्ट्रप्रमुख से सवाल पूछता है?
इस सवाल पर हेला ने कहा, “नॉर्वे में हमें अपने समाज के काम करने के तरीके पर गर्व है. हमें इस बात पर गर्व है कि हमारे प्रधानमंत्री जब नॉर्वे के छोटे से छोटे इलाके में भी जाते हैं, जहां सिर्फ़ कुछ हज़ार लोग रहते हों, तब भी वो स्थानीय अख़बारों और न्यूज़ चैनलों से बात करते हैं.”
“हमें इस बात पर गर्व है कि हमारी प्रेस स्वतंत्र और निष्पक्ष है. हम वही सवाल पूछते हैं जो हम पूछना चाहते हैं और सत्ता से जवाब मांगते हैं. यही हमारा काम है. और यही काम तब भी होता है जब हम ऐसे विदेशी नेताओं से मिलते हैं जो शायद पत्रकारिता को हमारी तरह महत्व नहीं देते.”
ऐसा कहा गया है कि इस घटनाक्रम के बाद नॉर्वे के प्रधानमंत्री वापस वहां आए और मीडिया के सवाल लिए. क्या आप वहां मौजूद थीं?
इस सवाल पर हेला लेंग ने कहा, “मेरे प्रधानमंत्री ने, जो कल काफ़ी व्यस्त थे, प्रधानमंत्री मोदी के जाने के बाद नॉर्वे के बड़े मीडिया संस्थानों के सवालों के जवाब दिए. मैं उस कतार में नहीं थी. मैंने पूछा था कि क्या उनके पास समय है, लेकिन उनके पास समय नहीं था. और मेरे लिए ये ठीक है क्योंकि मुझे पता है कि अगर मैं चाहूं तो इस हफ़्ते किसी समय उनसे बात कर सकती हूं.”
नॉर्वे के पीएम ने जवाब दिए

क्या हेला को ये देखकर अजीब लगा कि भारतीय मीडिया नॉर्वे के प्रधानमंत्री से सवाल पूछ रहा था लेकिन भारत के प्रधानमंत्री से नहीं?
इस पर उन्होंने कहा, “मुझे हैरानी नहीं हुई क्योंकि ये चौंकाने वाली बात नहीं है. बल्कि ये चिंताजनक है. मुझे चिंता इस बात की है कि भारत में आप लोग किस तरह चर्चा को आगे बढ़ाते हैं, अगर आप अपने नेता और उनकी नीतियों से सीधे सवाल नहीं पूछ सकते.”
“यही चीज़ मेरे लिए चिंता का विषय है. मुझे लगता है कि आज नॉर्वे के नेताओं को भी इस पर विचार करना चाहिए कि जब हम भारत के साथ संबंध मज़बूत करते हैं, तो क्या हम अनजाने में मानवाधिकार उल्लंघनों और प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में गिरावट को जारी रहने दे रहे हैं? ये हमारे प्रधानमंत्रियों के लिए एक जटिल भू-राजनीतिक स्थिति है.”
नॉर्डिक देश जैसे नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क और फ़िनलैंड कई दशकों से मानव विकास सूचकांक में शीर्ष पर रहे हैं. प्रेस की स्वतंत्रता पर वहां लगातार चर्चा होती रही है.
भारत हमेशा कहता है कि वो मानवाधिकारों का सम्मान करता है. देश में क़ानून का शासन है. लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान है, चाहे न्यायपालिका हो, विधायिका हो या कार्यपालिका.
वे पत्रकार, जो ऐसे देशों में काम करते हैं जहाँ प्रेस की स्वतंत्रता सर्वोपरि है वे इस पूरी बहस को और सरकार के कामकाज के तरीके को किस नज़र से देखते हैं?
इस पर हेला ने कहा, “ये बहुत अच्छा सवाल है. जब आप ज़मीन पर मौजूद नहीं होते तो चीज़ों को समझना मुश्किल होता है. लेकिन मैं एमनेस्टी और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स पर भरोसा करती हूं. कल के बाद मुझे भारत के अलग-अलग हिस्सों से कई संदेश भी मिले. जिन चीज़ों का लोग ज़िक्र कर रहे हैं, वो काफ़ी चिंताजनक हैं.”
“हालांकि मैं जानती हूं कि भारत में मौजूदा सरकार के समर्थकों और विरोधियों के बीच बड़ा मतभेद है. इसलिए मैं उन्हीं स्रोतों पर भरोसा करती हूं जिन पर आज भी भरोसा करती हूं.”
“कुछ लोगों के लिए एमनेस्टी विवादास्पद हो सकती है, लेकिन मेरे लिए नहीं. और हमारे प्रधानमंत्री विदेश नीति के बहुत अनुभवी नेता हैं. उन्होंने अपना करियर इसी पर बनाया है. उन्होंने भी कहा कि वो सॉफ्ट पावर को अच्छी तरह समझते हैं.”
“लेकिन उन्होंने भी हमारे मूल्यों और भारत के मूल्यों के बीच अंतर को लेकर मेरी अपेक्षा से ज़्यादा खुलकर बात की.”

विदेश मंत्रालय की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में हुई बहस पर क्या कहा?
पीएम मोदी से सवाल पूछे जाने के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने हेला को एक्स पर टैग करके एक औपचारिक ब्रीफिंग में आने को कहा था, जहां उन्होंने फिर सवाल पूछा.
वो अनुभव कैसा रहा और क्या वो जवाब से संतुष्ट थीं? इस सवाल पर हेला ने कहा, “सबसे पहले तो मुझे उस कार्यक्रम में पहले से ही आमंत्रित किया गया था. भारतीय दूतावास ने बाद में निमंत्रण दिया, जो अच्छी बात थी. लेकिन मैं अपने सवालों के साथ वहां गई थी.”
“लेकिन उस पूरी प्रक्रिया में जो मेरे हिसाब से गड़बड़ी थी और मैं पूछ भी रही थी कि क्या आप तुरंत जवाब दे सकते हैं?
वो एक समस्या थी कि उन्होंने शायद तीन-चार सवाल लिए और फिर जवाब दिए. एक पत्रकार के तौर पर अगर मेरे सवाल का जवाब नहीं मिलता तो मुझे जवाब देने वाले को रोककर दोबारा मुद्दे पर लाना पड़ता है. लेकिन कल ऐसा नहीं हो पाया.”
“मैंने मानवाधिकार उल्लंघनों को लेकर सवाल पूछा था, लेकिन उन्होंने उस हिस्से पर जवाब नहीं दिया. मैंने करीब एक मिनट बाद उन्हें बीच में रोककर बातचीत को उसी मुद्दे की तरफ़ लाने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हो सकी. ये चुनौतीपूर्ण है.”
“नॉर्वे में मैं इस बात की आदी हूं कि अगर जवाब पसंद न आए तो मैं दोबारा सवाल पूछ सकूं. कम से कम ये महसूस हो कि मेरे सवाल का जवाब दिया गया. मेरे लिए ये ज़रूरी है कि मैं सवाल पूछूं और फिर राजनेता वो जवाब दें जो मैं पूछ रही थी. और आमतौर से ऐसे जवाब ज़्यादा दिलचस्प होते हैं और ये बेहतर ज़रिया है दूसरों के नज़रिए को समझने का.”
“लेकिन कल बातचीत भारत द्वारा 2020 में वैक्सीन सप्लाई करने और योग तक पहुंच गई. मुझे योग पसंद है और भारतीय संस्कृति की कई चीज़ें भी पसंद हैं. भारत बहुत अच्छा काम भी करता है. लेकिन मैं प्रेस कॉन्फ्रेंस में आमतौर पर किसी देश की तारीफ़ सुनने नहीं जाती.”
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‘भारत में पत्रकारिता जोखिम भरा काम है’
क्या हेला को आश्चर्य हुआ कि प्रधानमंत्री या विदेश मंत्रालय की तरफ़ से कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया? वहीं हाल ही में नीदरलैंड्स के प्रधानमंत्री ने भी भारत में अल्पसंख्यकों की स्वतंत्रता और क़ानून के शासन पर चिंता जताई थी.
इस पर उन्होंने कहा, “मुझे बहुत ज़्यादा हैरानी नहीं हुई. लेकिन मेरा मानना है कि पत्रकार को हमेशा पूरी कोशिश करनी चाहिए. कुछ लोगों को लगा होगा कि दूसरी प्रेस कॉन्फ्रेंस में मैं थोड़ी रूखी लगी. लेकिन टकराव वाली पत्रकारिता का तरीका यही होता है. आपको बीच में बोलना पड़ता है, और जवाब हासिल करने की कोशिश करनी पड़ती है. हालांकि कल मुझे वो जवाब नहीं मिला.”
हेला के सवाल पूछने के तरीक़े को लेकर प्रधानमंत्री और सरकार के समर्थकों का कहना है कि वो प्रेस इंटरैक्शन नहीं था, इसलिए प्रधानमंत्री ने जवाब नहीं दिया. इस तर्क को वो कैसे देखती हैं?
हेला ने इस पर कहा, “क्या वो कभी सीधे प्रेस के सवालों का जवाब देते हैं? मैंने ऐसा नहीं देखा, जब तक कि सब कुछ पहले से तय न हो.”
हालांकि पीएम मोदी ने विदेश में दो बार प्रेस के सवालों के जवाब दिए हैं. इस सवाल पर हेला ने कहा, “उन्हें अपने देश की प्रेस के सवाल लेने चाहिए और आलोचनात्मक प्रेस को जगह देनी चाहिए. भारत में पत्रकारिता जोखिम भरा काम है. आप मुझसे बेहतर जानते हैं कि वहां पत्रकारों को बहुत संभलकर काम करना पड़ता है.”
“इसलिए जब तक मैं पत्रकारिता कर रही हूं, नॉर्वे आने वाले किसी भी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के सवाल न लेने के रवैये का विरोध करती रहूंगी. मैं हमेशा कोशिश करूंगी.”
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