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पाकिस्तान और चीन के बीच साल 1963 में हुए सीमा समझौते की भारत में एक बार फिर चर्चा हो रही है.
एक तरफ़ पाकिस्तान और चीन सीमा पार जल-सहयोग की बात कर रहे हैं तो दूसरी तरफ़ भारत इस बात को सिरे से मानने से ही इनकार कर रहा है कि चीन और पाकिस्तान के बीच कोई साझा सीमा मौजूद है.
भारत की यह प्रतिक्रिया हाल के दिनों में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ के चीन दौरे के बाद जारी संयुक्त बयान के बाद आई है.
भारत को इस बयान में शामिल कश्मीर और जल संसाधनों से जुड़े हवालों पर एतराज़ है.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ 23 से 26 मई तक चीन की आधिकारिक यात्रा पर गए थे. इस दौरे के अंत में चीन और पाकिस्तान की ओर से एक संयुक्त घोषणापत्र जारी किया गया.
इस घोषणापत्र की एक पंक्ति में कहा गया है कि दोनों पक्षों (यानी पाकिस्तान और चीन) ने समानता और पारस्परिक लाभ के सिद्धांतों के तहत सीमा पार जल संसाधनों में सहयोग करने की इच्छा जताई है.
इसके जवाब में भारत के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि चूंकि चीन और पाकिस्तान के बीच कोई साझा सीमा ही नहीं है, इसलिए ‘सीमा पार जल संसाधनों में सहयोग’ का सवाल ही पैदा नहीं होता.
भारत ने यह भी कहा कि वह चीन और पाकिस्तान के बीच साल 1963 के सीमा समझौते को स्वीकार नहीं करता और जम्मू-कश्मीर के संबंध में संयुक्त बयान में शामिल बिंदुओं को भी रद्द करता है.
आख़िर पाकिस्तान, भारत और चीन के बीच सीमा क्षेत्र को लेकर विवाद क्या है और चीन-पाकिस्तान के बीच साल 1963 का वह समझौता क्या है, जिसे मानने से भारत इनकार कर रहा है?
वो समझौता जिसने चीन-पाकिस्तान दोस्ती की बुनियाद रखी
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साल 1950 के दशक में ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ नारे का शोर था. जब शीत युद्ध चरम पर था तो जनवादी गणराज्य बने कम्युनिस्ट चीन को अमेरिका की ओर झुके पाकिस्तान के बजाय सोवियत संघ से जुड़े भारत में ज़्यादा दिलचस्पी थी.
इसलिए शायद ही किसी ने सोचा होगा कि अगले ही दशक में उसका पाकिस्तान के साथ एक ऐसा समझौता होगा कि ये दोनों देश ‘आयरन ब्रदर्स’ और ‘हर सुख-दुख के दोस्त’ बन जाएंगे.
एंड्रयू स्मॉल अपनी किताब ‘द चाइना-पाकिस्तान एक्सिस: एशियाज़ न्यू जियोपॉलिटिक्स’ में लिखते हैं कि 1950 के दशक की शुरुआत में चीन का साथी पाकिस्तान नहीं बल्कि भारत था.
“चीन और भारत का संबंध कम से कम कुछ वर्षों के लिए ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारे के सबसे ऊंचे स्तर पर था. यहां तक कि चीन ने भारत के साथ अपने सीमा विवाद पर बातचीत करने और एक-दूसरे के प्रशासनिक नियंत्रण वाले क्षेत्रों की अदला-बदली से इसे सुलझाने का प्रस्ताव भी दिया था.
पश्चिम में चीन के नियंत्रण वाले अक्साई चिन को भारत, लद्दाख का हिस्सा बताता है, जिसे भारत ने छह साल पहले कश्मीर से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया.
पूर्व में भारत में ब्रिटिश काल के दौरान बनी मैकमोहन लाइन पर मतभेदों के कारण भारत अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा मानता है लेकिन चीन इसे स्वीकार नहीं करता और इसे तिब्बत के स्वायत्त क्षेत्र का हिस्सा ‘झांगनान’ क़रार देता है.
आंशिक रूप से कश्मीर के हिमालयी क्षेत्र से जुड़े इस विवाद को आम तौर पर केवल पाकिस्तान और भारत के बीच तनाव और युद्धों का कारण माना जाता है.
लेकिन इसी विवाद के बारे में हाल ही में पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता अहमद शरीफ़ चौधरी ने एक प्रेस ब्रीफ़िंग में कहा कि कश्मीर एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा है जो तीन देशों पाकिस्तान, भारत और चीन के बीच है.
रॉन्गशिंग गुओ की किताब ‘टेरिटोरियल डिस्प्यूट्स एंड कॉन्फ़्लिक्ट मैनेजमेंट’ के अनुसार, कश्मीर का 45.62 प्रतिशत हिस्सा भारत के पास, 35.15 प्रतिशत पाकिस्तान के पास और 19.23 प्रतिशत हिस्सा चीन के पास है.
ब्रिटिश राज के बाद नक़्शों का विवाद
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इस विवाद ने तब जन्म लिया था जब भारत पर ब्रिटेन का शासन था.
आधुनिक दक्षिण एशिया के इतिहासकार डॉक्टर याक़ूब ख़ान बंगश के अनुसार, महाराजा रंजीत सिंह की मौत के बाद जब सिख साम्राज्य कमज़ोर पड़ा तो अंग्रेजों ने उसके ख़िलाफ़ अपने पहले युद्ध के बाद 16 मार्च 1846 को अमृतसर समझौते के तहत कश्मीर की घाटी, जम्मू के राजा गुलाब सिंह को 75 लाख रुपये में बेच दी थी.
बीबीसी से बात करते हुए डॉक्टर बंगश का कहना था कि इस तरह जब जम्मू-कश्मीर राज्य का गठन हुआ तो उसकी पूर्वी सीमा तय नहीं हुई थी.
“तिब्बत और शिनजियांग की तरफ़ यह सीमा बंजर और बेआबाद थी, इसलिए इसके बारे में कोई बहुत ज़्यादा फ़िक्रमंद भी नहीं था.”
भारत और पाकिस्तान के बीच, और लद्दाख के छोर पर भारत और चीन के बीच विवादित सीमा क्षेत्रों के बारे में दक्षिण एशिया के मामलों की विशेषज्ञ मायरा मैकडोनल्ड ने किताब ‘व्हाइट ऐज़ द श्राउड: इंडिया, पाकिस्तान एंड वॉर ऑन द फ़्रंटियर्स ऑफ़ कश्मीर’ लिखा है.
वो लिखती हैं कि जब भारत में ब्रिटिश अधिकारियों ने इस सीमा को तय करने की कोशिश की तो चीनी साम्राज्य पतन की ओर था.
“ब्रिटेन ने कई प्रस्तावों पर विचार किया, जिसमें 1865 की अर्डाग-जॉन्सन लाइन शामिल थी जो अक्साई चिन के बड़े हिस्से को लद्दाख में शामिल करती थी.”
“इसके अलावा 1899 की मैकार्टनी-मैकडोनल्ड लाइन जो एक हद तक सतर्क प्रस्ताव था. लेकिन ये प्रस्ताव कभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माने नहीं जा सके.”
“इसलिए अंग्रेज़ इसमें नाकाम रहे और एक उलझी हुई विरासत छोड़ गए.”
इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी, लाहौर के ह्यूमैनिटीज़ एंड सोशल साइंसेज़ डिपार्टमेंट के डीन डॉक्टर बंगश बताते हैं कि 1865 की अर्डाग-जॉन्सन लाइन से लेकर 1914 की मैकमोहन लाइन तक सीमा का जो भी निर्धारण हुआ, वह एक-दूसरे से अलग था.
“कभी ब्रिटिश भारत सरकार किसी हिस्से को जम्मू-कश्मीर का हिस्सा घोषित करती तो कभी किसी और को. यह उलझन भी रही कि हालांकि तिब्बत को इस प्रक्रिया में कई बार शामिल किया गया लेकिन शिनजियांग में मौजूद चीन की सरकार के साथ शायद ही कभी बातचीत हुई कि सीमा क्या होगी.”
इसी वजह से चीन ने पूर्वोत्तर कश्मीर में ब्रिटिश काल की इन सीमा रेखाओं को कभी स्वीकार नहीं किया और साल 1949 में चीन में कम्युनिस्ट सरकार की स्थापना के बाद भी उसका यही रुख़ बरक़रार रहा.
बंगश कहते हैं कि चीन का कहना था कि बीजिंग में उसकी सरकार का भारत सरकार के किसी अधिकारी के साथ ऐसा कोई समझौता नहीं हुआ था कि सीमा क्या होगी, न पूर्व में और न ही पश्चिम में.
मैकडोनल्ड लिखती हैं, “जब ब्रिटिश राज ख़त्म हुआ तो ब्रिटिश नक़्शों पर अक्साई चिन की कोई साफ़ सीमा मौजूद नहीं थी.”
मतभेद
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भारत और चीन दोनों ने अक्साई चिन पर दावा ठोंक दिया, जो उस समय ‘नो मैन्स लैंड’ यानी बिना मालिकाना हक़ वाला इलाक़ा था.
पत्रकार नेविल मैक्सवेल ने अपनी किताब ‘इंडियाज़ चाइना वॉर’ में लिखा है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का रुख़ यह था कि अक्साई चिन सदियों से लद्दाख क्षेत्र का हिस्सा रहा है.
“चीनी प्रधानमंत्री झोउ एनलाई का कहना था कि पश्चिमी सीमा कभी भी औपचारिक रूप से निर्धारित नहीं की गई थी और मैकार्टनी-मैकडोनल्ड लाइन एकमात्र सीमा प्रस्ताव था जो किसी चीनी सरकार को दिया गया था. इसके तहत अक्साई चिन का कुछ हिस्सा चीनी सीमा के भीतर आता है.”
“उन्होंने यह दावा भी किया कि अक्साई चिन पहले से ही चीन के प्रशासन के तहत है और बातचीत में मौजूदा ज़मीनी हक़ीक़त को ध्यान में रखा जाना चाहिए.”
एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका के लिए अपने शोध में आदम ज़ैदान लिखते हैं कि चीन ने तिब्बत और शिनजियांग पर अपना नियंत्रण मज़बूत करने के बाद लद्दाख के पूर्वोत्तर क्षेत्रों में क़दम बढ़ाए.
“इस क़दम का मक़सद अक्साई चिन क्षेत्र से गुज़रने वाली एक मिलिट्री रोड बनाना था. यह 1956-57 में बनकर तैयार हुई. इस सड़क से शिनजियांग और पश्चिमी तिब्बत के बीच संपर्क बेहतर हुआ और चीन को भारत व तिब्बत के बीच कई महत्वपूर्ण दर्रों पर नियंत्रण भी मिल गया.”
अपनी रिपोर्ट ‘रीड्रॉइंग द मैप्स इन कश्मीर’ में जर्मन संस्थान एसडब्ल्यूपी से जुड़े क्रिश्चियन वैगनर और एंजेला स्टैंज़ेल लिखते हैं कि 1959 में चीनी प्रधानमंत्री झोउ एनलाई ने प्रस्ताव दिया था कि दोनों देश कुछ क्षेत्रों पर अपना अधिकार छोड़कर एक-दूसरे से अदला-बदली करें.
यानी चीन को अक्साई चिन दे दिया जाए और वह पूर्वोत्तर भारत (वर्तमान अरुणाचल प्रदेश राज्य) पर अपने दावे से पीछे हट जाए. लेकिन भारत सरकार ने इस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया.
ज़ैदान लिखते हैं, “भारत को सड़क के बारे में देर से पता चला. इसके बाद दोनों देशों के बीच सीमा पर झड़पें शुरू हो गईं, जो आख़िरकार अक्टूबर 1962 के भारत-चीन जंग में बदल गईं. इस युद्ध के बाद से लद्दाख का पूर्वोत्तर हिस्सा चीन के पास है.”
जर्मन संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार, “साल 1988 के बाद जब भारत और चीन के संबंधों में सुधार हुआ तो सीमा का मुद्दा फिर से केंद्र में आ गया.”
“सन् 1993 के समझौते के तहत मौजूदा वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) को स्वीकार किया गया, जो एक ‘लाइन’ के बजाय असल में गश्ती के रास्तों और सैन्य चौकियों का एक क्षेत्र है जिसे दोनों पक्ष मान्यता देते हैं.”
फिर, पांच अगस्त 2019 को भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर राज्य के विशेष दर्जे को ख़त्म कर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया.
इसके जवाब में 4 अगस्त 2020 को पाकिस्तान ने एक नया नक़्शा जारी किया जिसमें पूरे कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया गया.
चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने तब एक प्रेस ब्रीफ़िंग में कहा था, “हाल ही में भारत ने अपने आंतरिक क़ानून में एकतरफ़ा बदलाव करके चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता को नुकसान पहुंचाया है. यह क़दम क़बूल नहीं है और न ही इसका कोई क़ानूनी आधार है.”
जर्मन संस्थान की रिपोर्ट में लिखा है कि सितंबर 2020 के अंत में चीन ने भी लद्दाख/अक्साई चिन के मामले में भारत के साथ ‘स्टेटस को’ (यथास्थिति) को ख़त्म कर दिया.
“ये सभी क़दम बताते हैं कि कश्मीर विवाद अब एक नए चरण में दाख़िल हो चुका है, एक ऐसा चरण जहां चीन और पाकिस्तान शायद अधिक निकटता से सहयोग कर सकते हैं.”
पाकिस्तान और चीन के बीच सीमा समझौता
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पाकिस्तान और चीन के बीच भी कुछ सीमाई क्षेत्रों को लेकर विवाद थे.
भारतीय बुद्धिजीवी, क़ानूनविद् और इतिहासकार एजी नूरानी ‘फ़्रंटलाइन’ में 20 अक्टूबर 2006 को छपे अपने एक लेख में लिखते हैं कि नवंबर 1959 में जब पाकिस्तान ने बातचीत की पेशकश की तो उसे चीन का ठंडा और संदेह से भरा रवैया देखने को मिला.
“चीन, अमेरिका के सहयोगी पाकिस्तान के बजाय भारत को तरजीह देता था. पाकिस्तान की इस पेशकश का जवाब देने में चीन ने पूरा एक साल लगा दिया और आख़िरकार 8 दिसंबर 1960 को प्रतिक्रिया दी.”
‘फ़ेसिंग द ट्रुथ’ शीर्षक के तहत इस लेख में नूरानी ने लिखा है कि पाकिस्तान के सैन्य शासक अय्यूब ख़ान ने अपनी आत्मकथा ‘फ़्रेंड्स नॉट मास्टर्स’ में लिखा है कि दिसंबर 1961 में चीनी राजदूत ने संयुक्त राष्ट्र में चीन की सीट के लिए पाकिस्तान का समर्थन मांगा.
इस पर अय्यूब ने उन्हें सीमा के मुद्दे की याद दिलाई.
चीनी राजदूत ने इस मुद्दे को जटिल बताया, जिस पर अय्यूब ने जवाब दिया, “हमें दोनों मुद्दों को उनकी मेरिट के आधार पर देखना चाहिए.”
बातचीत 12 अक्टूबर 1962 को शुरू हुई. चीनियों ने शुरुआत में ख़ुंजेराब घाटी और के-2 के पास के क्षेत्रों पर दावा किया लेकिन आख़िरकार मामूली बदलावों के साथ पाकिस्तान के नक़्शे वाली नियंत्रण रेखा को स्वीकार कर लिया.
के-2 की चोटी को दोनों देशों के बीच साझा करने पर सहमति बनी.
पाकिस्तान ने शिमशाल दर्रे के पार स्थित चरागाह क्षेत्रों पर दावा किया जो सदियों से हुंज़ा के लोगों के इस्तेमाल में थे.
चीनी प्रतिनिधि इस बात पर सहमत हुए कि इस मामले को ‘मेरिट’ के आधार पर सुलझाया जाएगा और बाद में यह क्षेत्र पाकिस्तान को दे दिया गया.
27 दिसंबर 1962 को सैद्धांतिक समझौते की घोषणा की गई. 2 मार्च 1963 को बीजिंग में समझौते पर हस्ताक्षर हुए और 26 मार्च 1965 को ज़मीन के सीमांकन के प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए गए.
नूरानी के अनुसार, यह समझौता काराकोरम वाटरशेड पर आधारित था, न कि कुनलुन या 1897 की अर्डाग लाइन पर.
इसमें 1899 का मैकार्टनी-मैकडोनल्ड प्रस्ताव और 1905 का कर्ज़न संशोधन शामिल था.
भारत ने कहा कि पाकिस्तान ने चीन को एक बहुत बड़ा इलाक़ा दे दिया और इस समझौते को ‘ग़ैर-क़ानूनी’ क़रार दिया.
उसके अनुसार, 1947 के इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन (विलय पत्र) के तहत पूरा कश्मीर भारत का हिस्सा है. भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को एक विरोध पत्र भी भेजा था.
भुट्टो की चीन-समर्थक नीति
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26 मार्च 1963 के अपने भाषण में पाकिस्तान के विदेश मंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो ने इस विरोध पत्र का हवाला देते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर का क्षेत्र न तो यूनियन (यानी भारत) का हिस्सा है और न ही उसका ‘अटूट अंग’ है.
“यह क्षेत्र जम्मू-कश्मीर के आम लोगों की संपत्ति है. इसका भविष्य संयुक्त राष्ट्र आयोग के 13 अगस्त 1948 और 5 जनवरी 1949 के प्रस्तावों के अनुसार तय होना है यानी संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में एक निष्पक्ष जनमत संग्रह के ज़रिए.”
“चूंकि भारत और पाकिस्तान दोनों इन प्रस्तावों से बंधे हैं, इसलिए किसी एक पक्ष द्वारा जम्मू-कश्मीर पर संप्रभुता का दावा करना बेहद अफ़सोसनाक और अनुचित है.”
“चीन और पाकिस्तान के बीच हुआ सीमा समझौता असल में चीन के शिनजियांग प्रांत और उन आस-पास के क्षेत्रों के बीच मौजूद सीमा के सीमांकन के संबंध में एक साझा समझ पर आधारित है जिसकी रक्षा की ज़िम्मेदारी पाकिस्तान पर है.”
“यह समझौता जम्मू-कश्मीर क्षेत्र की स्थिति को किसी भी तरह से प्रभावित नहीं करता है.”
भुट्टो ने यह भी कहा कि पाकिस्तान ने चीन को एक इंच ज़मीन भी नहीं दी बल्कि पाकिस्तान को 750 वर्ग मील का क्षेत्र मिला जो पहले चीन के पास था.
राजनयिक अब्दुल सत्तार, जो बाद में पाकिस्तान के विदेश मंत्री भी रहे, लिखते हैं कि सीमा निर्धारण पर सहमति बन चुकी थी और पाकिस्तान सरकार को एहसास हो गया था कि शिमशाल दर्रे के उस पार स्थित कुछ चारागाहों का इस्तेमाल ऐतिहासिक रूप से हुंज़ा के निवासियों द्वारा किए जाते रहे हैं.
“इसलिए पाकिस्तान ने एक अपवाद का अनुरोध किया. झोउ एनलाई ने उदारता दिखाते हुए सीमा में संशोधन पर सहमति व्यक्त की और इस तरह 750 वर्ग मील का क्षेत्र पाकिस्तान की ओर शामिल कर लिया गया.”
यह सब आधी रात के बाद हुआ.
एंड्रयू स्मॉल लिखते हैं कि अय्यूब ख़ान ने एहतियात से लेकिन निर्णायक क़दम आगे बढ़ाए.
“पाकिस्तान में जो व्यक्ति ‘चीन-समर्थक खेमे’ का प्रमुख बना वह ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो थे. भुट्टो ने अय्यूब ख़ान पर ज़ोर दिया कि वह अपना वह बयान वापस लें जिसमें उन्होंने भारत-चीन विवाद को केवल ‘भारत की समस्या’ बताया था.”
“इसके बजाय, भुट्टो ने सुझाव दिया कि पाकिस्तान को चीन को एक स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि वह भारत के रुख़ की बुनियाद को ही चुनौती दे रहा है.”
“यह समझौता पाकिस्तान की ओर से भुट्टो के पूर्ववर्ती मंज़ूर क़ादिर ने अय्यूब ख़ान की देखरेख में तय किया था लेकिन समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मार्च 1963 में भुट्टो खुद बीजिंग पहुंचे. वहां उन्होंने चीन के विदेश मंत्री चेन यी के साथ समझौता किया और ख़ूब वाहवाही बटोरी.”
कश्मीर पर पाकिस्तान के रुख़ का समर्थन
‘पाकिस्तान होराइज़न’ के लिए अपने लेख ‘1963 के पाक-चीन सीमा समझौते का महत्व’ में परवेज़ इक़बाल चीमा लिखते हैं कि इस समझौते के बाद चीन ने कश्मीर पर पाकिस्तान के रुख़ का पूरा समर्थन किया.
“पाक-चीन सीमा समझौते ने चीन की दक्षिणी सीमा को स्पष्ट कर दिया और 1962 के भारत-चीन युद्ध जैसे एक और बेमतलब टकराव के ख़तरों को पूरी तरह से ख़त्म कर दिया.”
“पाकिस्तान ने चीन के साथ उत्तरी सीमा का निर्धारण किया और चीन ने इस सीमा को एक अस्थायी व्यवस्था के रूप में स्वीकार किया ताकि कश्मीर मुद्दे के अंतिम समाधान की स्थिति में इसकी समीक्षा की जा सके.”
“निश्चित रूप से यह समझौता पाकिस्तान और चीन के बीच भविष्य के दोस्ताना संबंधों की एक मज़बूत बुनियाद बना.”
नूरानी लिखते हैं, “चीन ने 1963 से 2008 के बीच अफ़ग़ानिस्तान, ताजिकिस्तान, कज़ाकिस्तान, रूस, मंगोलिया, म्यांमार, नेपाल, पाकिस्तान, लाओस, उत्तर कोरिया और वियतनाम के साथ अपने सीमा विवाद सुलझा लिए हैं.”
लेकिन नूरानी के अनुसार, “भारत और भूटान के साथ चीन के सीमा विवाद अब तक अनसुलझे हैं. हमें ईमानदारी से ख़ुद से पूछना चाहिए: क्या हम इन विवादों को एकतरफ़ा तरीक़े से सुलझाएंगे या पाकिस्तान और चीन के साथ एक औपचारिक समझौते के ज़रिए?”
“कोई भी हल तब तक मुमकिन नहीं है जब तक कि समझौता ऐसा न हो जो दोनों पक्षों को क़बूल हो. और समझौते का मतलब दोनों पक्षों की ओर से रियायतें देना है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.