डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। संसदीय समिति ने बसों में लगे इमरजेंसी अलर्ट बटन से जुड़े एक अजीब मामले पर ध्यान दिया है। हालांकि इन स्विच की कीमत सिर्फ 15-20 रुपये है लेकिन इनका ज्यादातर इस्तेमाल नहीं हुआ है क्योंकि अलर्ट का जवाब देने के लिए कोई खास सेंटर नहीं हैं।
बस ऑपरेटरों ने समिति को बताया कि उन्हें अभी भी हर गाड़ी के लिए 2,500 से 25,000 रुपये तक देने पड़ते हैं ताकि जरूरी फिटनेस टेस्ट के दौरान इन स्विच की जांच हो सके। जेडीयू के संजय झा की अध्यक्षता वाली ट्रांसपोर्ट, टूरिज्म और कल्चर पर संसदीय स्थायी समिति की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि 2012 के निर्भया मामले के बाद महिला यात्रियों की सुरक्षा के लिए ये बटन लगाना जरूरी कर दिया गया था।
सिस्टम को 112 नंबर से भी जोड़ा गया
रिपोर्ट में कहा गया है कि सड़क परिवहन मंत्रालय ने समिति को बताया कि कई राज्यों में इस सिस्टम को इमरजेंसी रिस्पॉन्स नंबर 112 से जोड़ा गया था। इसमें यह भी कहा गया है कि कई बार गलत अलार्म बजने की घटनाएं हुईं, जिसके कारण कुछ राज्यों ने इन्हें बंद कर दिया।
रिपोर्ट में कहा गया है, “मंत्रालय चाहता है कि सिस्टम को फिर से चालू किया जाए, जबकि ऑपरेटरों का मानना है कि इसे हटा दिया जाना चाहिए।” समिति के एक सदस्य ने कहा कि अगर सिस्टम असरदार नहीं है तो इसके लिए इतना ज्यादा चार्ज करना सही नहीं है। एक सदस्य ने पूछा कि सीसीटीवी क्यों नहीं लगाए जा सकते।
‘नई बसों में कैमरे लगाना जरूरी’
मंत्रालय ने बताया कि नई बसों में कैमरे लगाना जरूरी किया जा रहा है। समिति ने सुझाव दिया कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट की गाड़ियों में इमरजेंसी बटन, कॉल की सुविधा और गाड़ी की लोकेशन ट्रैक करने वाले डिवाइस लगाने के प्रोग्राम को उन 16 राज्यों के अलावा बाकी राज्यों में भी आगे बढ़ाया जाए, जिन्होंने इसे लागू करने में तरक्की की है।