जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। अभी कुछ ही दिन पहले की बात है वैश्विक बाजार में यूरिया की बढ़ती कीमतों के कारण सरकार का बजटीय प्रबंधन देखने वालों की सासें फूली हुई थीं।
सब्सिडी का बोझ लगभग दोगुना होने का अनुमान लगाया जा रहा था, लेकिन बड़ी राहत की खबर आई जब सरकारी कंपनी नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (एनएफएल) ने हाल ही में 17 लाख टन यूरिया आयात के लिए निविदा जारी की।
इसमें पश्चिमी तट के लिए 449 डॉलर प्रति टन और पूर्वी तट के लिए 445 डॉलर प्रति टन की सबसे कम बोलियां मिलीं। यह कीमत पिछले सौदों की तुलना में 50 प्रतिशत से ज्यादा कम है।
अप्रैल में इंडियन पोटाश लिमिटेड (आईपीएल) की निविदा में भारत ने पश्चिमी तट के लिए 935 डॉलर और पूर्वी तट के लिए 959 डॉलर प्रति टन की दर से 25 लाख टन यूरिया आयात करने पर सहमति जताई थी। जाहिर है, कुछ महीनों में ही वैश्विक बाजार में यूरिया के दाम में भारी गिरावट आई है।
आइपीएल के प्रबंध निदेशक डॉ. पीएस गहलोत इसके लिए चीन को बड़ा कारण मानते हैं। उन्होंने कहा कि चीन ने वैश्विक बाजार में बडे पैमाने पर यूरिया निर्यात शुरू किया है। कुछ नए निर्यातक देश भी सामने आए हैं।
अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 17 लाख टन की खरीद के लिए जारी निविदा के मुकाबले 60 लाख टन से अधिक यूरिया के प्रस्ताव भारत को मिल चुके हैं। ऐसे में सरकार 17 लाख टन की निर्धारित मात्रा से अधिक खरीद की अनुमति दे सकती है, बशर्ते अन्य आपूर्तिकर्ता भी सबसे कम बोली (एल-1) के बराबर कीमत पर आपूर्ति करने को तैयार हों।
किसानों को होगा फायदा
इससे भारत को सब्सिडी के मोर्चे पर फायदा हो सकता है। किसानों को यूरिया तय कीमत पर उपलब्ध कराया जाता है। बाजार मूल्य और बिक्री मूल्य के अंतर की रकम सरकार सब्सिडी के रूप में देती है। यूरिया सस्ता होगा सरकार के पैसे बचेंगे।
दरअसल, चालू वित्त वर्ष की शुरुआत में तस्वीर अलग थी। पश्चिम एशिया में तनाव, ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी और आपूर्ति संबंधी आशंकाओं को देखते हुए खाद सब्सिडी बढ़ने का अनुमान था, जो अब बदल सकता है।
हालांकि सरकार जल्दबाजी में नहीं है। अंतिम निर्णय सप्लायरों की पुष्टि, वास्तविक आयात मात्रा और आगे की जरूरतों के आकलन के बाद ही होगा।
यदि मौजूदा कीमतें लंबे समय तक बनी रहती हैं तो सब्सिडी खर्च में उल्लेखनीय कमी संभव है। सरकार इस अवसर का लाभ भी उठा सकती है और अतिरिक्त खरीदारी कर स्टाक बढ़ा सकती है।
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