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मैं जंतर-मंतर हूं… तारों-ग्रहों की चाल देखने वाला जेन-जी की ताकत को भी जान लिया

Byadmin

Jul 26, 2026


स्वदेश कुमार, नई दिल्ली। मैं जंतर-मंतर हूं… कभी तारों और ग्रहों की चाल मापने के लिए गढ़ा गया एक यंत्र था, लेकिन बाद में देश की तकदीर तय करने वाले आंदोलनों का ठिकाना बन गया। 1724 में जयपुर के राजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने मुझे इसलिए तराशा था, ताकि मैं खगोलीय पिंडों और समय की चाल को माप सकूं।

पर समय बदला और 19वीं सदी के नौवें दशक में जब बोट क्लब पर प्रदर्शनों पर पाबंदी लगी, तब लुटियंस दिल्ली के दिल में बसा मेरा आंगन जन-आकांक्षाओं, नारों और तख्तियों का स्थायी ठिकाना बन गया। मैं तो कई धरना-प्रदर्शनों का मूक गवाह रहा हूं, लेकिन जेन-जी के सैलाब को पहली बार देखा और उनकी ताकत से भी परिचित हो गया।

मैंने बीते दशकों में इस मुल्क की सियासत और समाज को बदलते देखा है। मेरी लाल ईंटों ने सत्ता के आगे जनता की आवाज को गूंजते सुना है। साल 2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की शुरुआत मेरी ही जगह से हुई थी, जो कि बाद में दिल्ली में तख्तापलट का कारण बना। सेना के पूर्व सैनिकों की महीनों चली भूख हड़ताल और उनकी मांगों की गूंज मैंने सुनी थी। किसानों के हक से लेकर देश का नाम रोशन करने वाली महिला पहलवानों के आंसुओं और संघर्ष का साक्षी भी मैं ही बना था।

यही नहीं, अनगिनत धरने, भाषण और लाठीचार्ज देखे हैं, पर 20 जून से जो प्रदर्शन हुआ, वह मेरे लिए भी अभूतपूर्व था। यह बिल्कुल अलग था। पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था के विरोध में देश के कोने-कोने से आए जेन-जी (साल 1997 से 2012 के बीच जिनका जन्म हुआ) ने जब शांतिपूर्ण मार्च निकाला, तो दिल्ली की सड़कें थम गईं। पुलिस की बैरिकेडिंग, वाटर कैनन और लाठियों के आगे भी जब ये जेन-जी नहीं डिगे, तो मुझे अहसास हो गया कि इस देश की नई पीढ़ी अपनी आवाज उठाना जानती है।

ये अन्य प्रदर्शनों और आंदोलनों के जैसा नहीं था। इसमें कोई राजनीतिक झंडा नहीं था, न ही कोई पुराना ढर्रा। ये युवा हाथ में किताबें, न्याय की मांग की तख्तियां और आंखों में अपने भविष्य को बचाने की जिद लेकर आए थे। मैंने कभी अपने आंगन में आंदोलन करने वालों को पिज्जा, बर्गर और अन्य तरह के फास्ट फूड खाते नहीं देखा था। पहले तो ज्यादा से ज्यादा हलवाई बैठ जाते थे। पूड़ी-सब्जी बन जाती थी। बाहर से खाना आता था तो रोटी-सब्जी जैसी खाद्य सामग्री होती थी।

डिलीवरी ब्वायज की लंबी कतारें देखीं। धरना स्थल पर लोगों से ज्यादा खाद्य सामग्री पहुंचते और फिर सड़क पर ये बर्बाद होते हुए देखा। इससे फैल रही गंदगी से निराशा हुई। प्रदर्शन में उपद्रवियों को भी मैंने देखा। इससे नाराजगी हुई, लेकिन युवाओं के जोश और उनके मुद्दे ऐसे थे जिसके लिए ये सब सहन किया जा सकता था।

मैं आज भी वहीं खड़ा हूं। खगोल शास्त्र के मेरे यंत्र भले ही अब समय मापने का पुराना जरिया बन चुके हों, लेकिन जब भी इस देश का युवा अपनी हक की लड़ाई लड़ने मेरी गोद में आएगा, तो मुझे महसूस होगा है कि देश के सुनहरे भविष्य की घड़ी टिक-टिक कर आगे बढ़ रही है।

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