• Sat. May 23rd, 2026

24×7 Live News

Apdin News

मौत के आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन नहीं हो रहा, इसलिए हीटवेव की भयावहता सामने नहीं आ रही: डॉ. मावलंकर

Byadmin

May 23, 2026


रुमनी घोष। ‘भारत की गर्मी अब केवल गर्म नहीं रही बल्कि ‘अनएस्केपेबल’, हो गई है…यानी जिससे बचा न जा सके है।’ जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था ‘क्लाइमेट ट्रेंड्स’ की यह नई रिपोर्ट डरा रही है तो मौसम विभाग के आंकड़े भी आग उगल रहे हैं। दिल्ली, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, बंगाल, ओडिशा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के कई हिस्सों में पारा 45 से 48 डिग्री सेल्सियस के बीच ही ठहरा हुआ है। 30 मई तक यही स्थिति बनी रहने की आशंका जताई जा रही है।

सबसे ज्यादा चिंता यह है कि भारत के 36 में से 35 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में रातें भी बेहद गर्म हो रही हैं और यही जानलेवा है। भारत में हीटवेव यानी ‘लू’ कोई नई बात नहीं है, लेकिन इसकी बढ़ती आवृत्ति और अवधि ने जनस्वास्थ्य सेवाओं पर असर डॉ.लना शुरू कर दिया है। सवाल यह उठता है कि 13 साल पहले देश का पहला हीटवेव प्लान बन चुका था, तो फिर इससे निपटने में सरकारी तंत्र के पसीने क्यों छूट रहे हैं? वर्ष 2013 में अहमदाबाद के लिए देश का पहला हीटवेव प्लान बनाने वाले इंडियन इंस्टीट्यूट आफ पब्लिक हेल्थ, गांधीनगर (आइआइपीएच, गांधीनगर) के पूर्व निदेशक डॉ.. दिलीप मावलंकर इसका जवाब देते हैं कि इतने सालों में हमने चाहे जितने भी हीटवेव एक्शन प्लान बना लिए हों, लेकिन जब तक हर शहर या जिले में नियमित रूप से मौत के आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन नहीं होगा, तब तक इसकी भयावहता का आकलन नहीं किया जा सकता है। जब इसकी भयावहता महसूस नहीं होगी, तो उससे निपटने की तैयारी भी मुकम्मल नहीं होगी।

देश के शीर्षस्थ जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों में से एक डॉ.. मावलंकर ने अमेरिका के जान हॉपकिन्स स्कूल ऑफ हाईजीन एंड पब्लिक हेल्थ में डिग्री हासिल की। वह कोलंबिया विश्वविद्यालय, मदर केयर प्रोजेक्ट (यूएसए), डब्ल्यूएचओ (जिनेवा, पश्चिमी प्रशांत क्षेत्रीय कार्यालय), यूनिसेफ (नई दिल्ली), यूएनडीपी, वर्ल्ड बैंक (भारत), अगा खान फाउंडेशन, सेंटर फार डेवलपमेंट एंड पापुलेशन एक्टिविटीज (सीईडीपीए) जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं में बतौर सलाहकार जुड़े रहे। पाल हार्पर पुरस्कार, ह्यूलेट फाउंडेशन जैसी फैलोशिप मिली। उन्हें डेल्टा ओमेगा मानद सार्वजनिक स्वास्थ्य समाज (अमेरिका) में शामिल किया गया। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के मिशन स्टीयरिंग ग्रुप, मातृ स्वास्थ्य पर तकनीकी कार्य समूह और भारत की योजना आयोग की 12वीं पंचवर्षीय योजना के स्वास्थ्य स्टीयरिंग ग्रुप जैसी उच्च-स्तरीय समितियों में भी रहे। दैनिक जागरण की समाचार संपादक रुमनी घोष ने उनसे हीटवेब्स की वजह से जनस्वास्थ्य पर पड़ने वाला असर, बचाव के उपाय और सरकारों की तैयारियों पर विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

हीटवेव को लेकर अभी पूरा देश चिंतित है। अहमदाबाद कैसे 13 साल पहले ही अलर्ट हो गया और हीटवेव एक्शन प्लान बना लिया?

– भारत में वर्ष 2010 से ही हीटवेव पर चर्चा शुरू हो गई थी। उसी साल अहमदाबाद में तेज गर्मी पड़ी थी। 19 से 23 मई 2010 के बीच तापमान 40-42 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था। इस दौरान अखबारों में अचानक बढ़े शोक संदेश और अस्पतालों में मरीजों की संख्या ने हम लोगों का ध्यान खींचा। वर्ष 2011 में हम लोगों ने शोध कार्य शुरू किया और अहमदाबाद नगर निगम से बीते पांच साल में हर महीने होने वाली मौतों का आंकड़ा जुटाया। जब तुलनात्मक चार्ट तैयार किया तो पता चला कि 55 लाख की आबादी वाले इस शहर में हर महीने औसतन 100 मौतें होती हैं, लेकिन 19 मई के बाद से यह आंकड़ा यकायक बढ़ना शुरू हुआ। पहले दिन 100, दूसरे दिन 200 और तीसरे दिन, यानी 21 मई को मौत का आंकड़ा 300 के पार हो गया। इस तरह से एक सप्ताह के भीतर यह आंकड़ा 800 के पार पहुंच गया। उसके बाद धीरे-धीरे कम होते हुए फिर 100 पर आ गया। जिस अवधि में मौत का आंकड़ा बढ़ा, उस दौरान न कोई भूकंप आया था और न कोई महामारी फैली थी। इस अवधि में जो लोग मरे थे, उनकी मेडिकल हिस्ट्री निकाली गई, तो हीटवेब्स (लू) से होने वाली स्वास्थ्य परेशानियों के निशान मिले। बाद में पत्रिकाओं में यह शोध प्रकाशित हुआ था। हमने लोगों ने इसे अहमदाबाद नगर निगम को भी सौंपा था।

खबरें और भी

dr mavlankar-003

… लेकिन शोध करने का विचार कैसे आया?

– 2011 में आइआइपीएच और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली अमेरिकी एजेंसी नेचुरल रिसोर्स डिफेंस काउंसिल (एनआरडीसी) ने मिलकर अहमदाबाद में ‘हीट वेव्स एंड मोर्टालिटी (लू से होने वाली मौतों) विषय को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार हुआ था, जिसमें 40 से ज्यादा विज्ञानियों और जन स्वास्थ्य से जुड़े विशेषज्ञ, डॉ.क्टर्स, पालिसी मेकर्स शामिल हुए थे। दरअसल, 1995 में शिकागो में एक सप्ताह के हीटवेब्स में 800 अतिरिक्त मौतें दर्ज की गई थीं। 2003 दो सप्ताह के हीटवेव की वजह से यूरोप में 17 हजार मौतें दर्ज की गई थी। इस वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसको लेकर काफी चर्चाएं हो रही थीं। यह भी एक वजह थी। उसके निष्कर्ष को हम लोगों ने अहमदाबाद नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग से साझा किया। एक्शन प्लान बनाकर नगर निगम सहित सभी संबंधित विभागों को भी दिया। वह रिपोर्ट आज भी मौजूं है और अहमदाबाद में इसका पालन हो रहा है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने भी जितने हीट एक्शन प्लान हैं, इनमें से कई बिंदुओं को शामिल किया गया है।

अहमदाबाद में हीटवेब एक्शन प्लान लागू करने का क्या असर दिखा?

– वर्ष 2013 में अहमदाबाद में हीटवेव एक्शन प्लान लागू किया गया। उस समय मौसम विभाग लंबी अवधि का अनुमान जारी नहीं करता था। हम लोगों ने अमेरिका के जर्जिया यूनिवर्सिटी के मौसम अनुमान केंद्र से अनुबंध कर उनसे डॉ.टा लेना शुरू किया था। तीन साल (वर्ष 2013, 2014 व 2015) के डॉ.टा से एक रिपोर्ट तैयार की गई। इसमें मौत के आंकड़ों में 40 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई थी। इस रिपोर्ट से एनडीएमए को राष्ट्रीय स्तर पर हीटवेब एक्शन प्लान बनाने में बहुत मदद मिली। इस रिपोर्ट के बाद नासिक का हीटवेव एक्शन प्लान बनाया था।

लू से जनजीवन अस्त-व्यस्त जरूर हो गया, लेकिन यह उतना भयावह नजर नहीं आ रहा है, जितना आप बता रहे हैं?

– …क्योंकि किसी भी शहर में हर महीने मौतों के आंकड़ों का न चार्ट बन रहा है, न तुलनात्मक अध्ययन हो रहा है। यहां तक कि जन्म-मृत्यु प्रमाण-पत्र जारी करने वाले नगर निगमों व अस्पतालों के पास भी यह मौजूद नहीं है।

एनडीएमए का दावा है कि देश में करीब 300 हीटवेव एक्शन प्लान तैयार हैं?

– मैं निजी तौर पर मानता हूं कि यदि मौत के आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन किए बगैर बनाए गए हीटवेब एक्शन प्लान से आप उसकी गंभीरता को न आंक सकते हैं और न ही समझ सकते हैं। मुझे तो अभी तक किसी भी शहर (अहमदाबाद व नासिक) में हर महीने होने वाली मौतों के आंकड़ों का तुलनात्मक चार्ट कहीं भी (न आफ लाइन, न आनलाइन) दिखाई नहीं देता। दरअसल, मौत के आंकड़ों को लेकर हमारे भीतर एक अजीब-सा संकोच है। न सरकारी एजेंसियां इसे सार्वजनिक करना चाहती हैं, न मीडिया इसे छापना चाहती है और न जनता सुनना चाहती है, जबकि इन मौतों के आंकड़ों में ही जीवन बचाने का रास्ता छिपा है। यदि किसी गांव, जिला, शहर, राज्य या देश का जन स्वास्थ्य बेहतर रखना चाहते हैं, लोगों को असामयिक मौतों से बचाना चाहते हैं तो आपको हर महीने होने वाली मौत के आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन करना ही होगा। इसे ‘ लंदन बिल्स आफ मोर्टालिटी’ फार्मूला कहते हैं… और यह इतना सरल है कि कोई सातवीं का बच्चा भी इसके जरिये परिणाम निकाल सकता है।

dr dileep mavlankar-3

लंदन बिल्स आफ मोर्टालिटी क्या है?

– लंदन बिल्स आफ मोर्टालिटी… 16वीं से 19वीं शताब्दी के बीच लंदन के पेरिस (धार्मिक क्षेत्रों) द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक और वार्षिक मृत्यु रिकार्ड। इस रिकार्ड का मुख्य उद्देश्य प्लेग (महामारी) और अन्य बीमारियों से होने वाली मौतों की संख्या पर नजर रखना और सार्वजनिक स्वास्थ्य को सुरक्षित रखना था। आज भी यह इतना ही मौजूं है।

भारत में भी एसआरएस रिपोर्ट जारी होती है? क्या वह उपयोगी नहीं ?

– सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम यानी एसआरएस रिपोर्ट (मौत के कारणों की जानकारी देती रिपोर्ट) सरकार हर दो साल में जारी करती है। यदि रिपोर्ट में मौतों में बहुत उछाल भी दिखता है तो कोई फायदा नहीं है, क्योंकि बचाव के लिए बहुत देर हो चुकी होगी। इतने समय में तो महामारी हो या हीटवेब से होने वाली मौतें विकराल रूप ले सकती हैं। यही स्थिति चिकनगुनिया के समय हुई थी। उस दौरान भी सरकारें कहती रहीं कि इससे मौतें नहीं होती हैं, लेकिन मौतों के तुलनात्मक अध्ययन से ही हमने साबित किया था कि चिकनगुनिया से 2000 से ज्यादा मौतें हुई थीं।

तो क्या यह माना जाए कि बचाव के उपाय तलाशने में बहुत देर हो गई है ?

– एक कहावत है… जब जागो तभी सबेरा। पहले नहीं किया, इस पर प्रलाप-विलाप के बजाय, आज से ही शुरू कीजिए। आगे जो नुकसान होने वाला है, उससे तो बचाव कर सकेंगे।

यदि मौतों का आंकड़ा निकाल भी लिया, तो यह कैसे साबित होगा कि इनमें से कितनी मौतें हीटवेव या हीट स्ट्रोक्स की वजह से हुई हैं? हमारे यहां मौत के कारणों में आमतौर पर हार्ट अटैक, किडनी फेल, ब्रेन स्ट्रोक आदि का ही उल्लेख होता है?
– यह सही है कि हमारे देश में हीटवेव की वजह से मौत साबित करना बहुत मुश्किल है। ‘काज आफ डेथ’, यानी मौत के कारणों का उल्लेख किस तरह किया जाना चाहिए, उसका एक साइंटिफिक सिस्टम है, लेकिन हमारे यहां अधिकांश डॉ.क्टरों को न इसकी जानकारी है और न वे प्रशिक्षित हैं और न ही उनसे पालन करवाया जा रहा है। जनस्वास्थ्य (पब्लिक हेल्थ) से जुड़े डॉ.क्टर्स को ‘काज आफ डेथ’ के बारे में पता लगाना सिखाया जाता है, लेकिन मुझे लगता है कि वे भी भूल चुके होंगे। यह ठीक वैसा ही है, जैसे यदि कोई बुजुर्ग का कार एक्सीडेंट हो जाए तो कारण में लिखा जाए कि बुजुर्ग होने की वजह से उन्हें ठीक से दिखाई नहीं देता था, इसलिए खुद को बचा नहीं सके। किसी भी समस्या को दबाने या छिपाने से उसका समाधान तो नहीं होगा न। यदि छिपाना ही है तो मौसम विभाग को हीटवेव अलर्ट ही जारी करना बंद कर देना चाहिए। जब अलर्ट नहीं होगा, तो हीटवेब भी नहीं होगा। हीटवेव का जन स्वास्थ्य पर क्या और कितना असर पड़ रहा है, इसका सटीक आकलन करना है तो ‘डेथ आफ काज’ पता लगाने के सिस्टम को ठीक से लागू करना होगा और उसे सार्वजनिक भी करना होगा।

हीटवेव के दुष्प्रभाव के क्या-क्या लक्षण होते हैं?

– इसके कई चरण हैं। पहला, प्रिकली हीट-इससे हम सब वाकिफ हैं। इसमें शरीर में दाने निकल आते हैं। यह सामान्य है और पाउडर आदि से ठीक हो जाता है। दूसरा, हीट एक्सजरशन-इसमें बहुत पसीना निकलता है और थकान महसूस होती है। बुखार भी होता है। तीसरा, हीट सिंकोप-अचानक चक्कर आना या कुछ समय के लिए बेहोश हो जाना। यह स्थिति तब होती है जब अत्यधिक गर्मी से शरीर का ब्लड प्रेशर (रक्तचाप) अचानक गिर जाता है और मस्तिष्क में खून का प्रवाह कम हो जाता है। सेना में भर्ती के दौरान दौड़ लगाते युवाओं, लंबे समय तक धूप में खड़े रहने वाले एनसीसी कैडेट में इस तरह की घटनाएं होती हैं। चौथा, हीट क्रैम्प या इडिमा- इसमें हाथ-पैर में दर्द या सूजन की शिकायत आ जाती है। पांचवां, हीट स्ट्रोक-इसमें पसीना आना बंद हो जाता है, क्योंकि ब्रेन काम करना बंद कर देता है। व्यक्ति अचेतावस्था में पहुंच जाता है। 30-40 प्रतिशत मौतें इस स्थिति की वजह से ही होती हैं।

क्या हार्ट अटैक की तरह ही हीट-स्ट्रोक में भी ‘गोल्डन पीरियड’ होता है

– बिलकुल। शुरुआती आधे से एक घंटा गोल्डन पीरियड होता है। इस अवधि में अस्पताल पहुंचने वाले गंभीर मरीजों के बचने की संभावना तुलनात्मक रूप से बहुत अधिक होती है।

‘क्लाइमेट ट्रेंड्स’ की रिपोर्ट बता रही है कि देश के 36 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में से 35 में रात का तापमान नीचे नहीं गिर रहा है? यह कितना खतरनाक है।

– खतरनाक संकेत। दिन के बजाय रात का तापमान ज्यादा हो तो हीट-स्ट्रोक की वजह से हार्ट या किडनी फेल की आशंका ज्यादा रहती है। आदर्श स्थिति में रात को कमरे के भीतर का तापमान 24 डिग्री या उससे नीचे होना चाहिए, ताकि शरीर के अंगों को आराम मिल सके। तापमान ज्यादा रहने से नींद पूरी नहीं होती है और बेचैनी की वजह से हार्ट अटैक या स्ट्रोक की शिकायत सामने आती है। दरअसल, हमारा शरीर 37 सेंटीग्रेट की स्थिति में सामान्य रहता है और अंगों में मौजूद केमिकल्स संतुलित रहते हैं। 40 डिग्री सेंटीग्रेट तक किसी तरह सहन कर लेता है, लेकिन उसके बाद केमिकल्स का संतुलन बिगड़ने लगता है और शरीर में इनका रिसाव होने लगता है। इसकी वजह से ही बेचैनी महसूस होने लगती है। लंबे समय तक यह स्थिति बने रहने पर आर्गन फेलियर जैसी घटनाएं होती हैं।

मानव शरीर कितनी गर्मी सहन कर सकता है?

– यह इस पर निर्भर करता है कि आप किस तापमान के आदि हैं। यूरोप के लिए 35 डिग्री सेल्सियस में ही मौतें होने लगती हैं। हमारे यहां उप्र के बांदा या राजस्थान के चुरू में तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस के बीच बना रहता है। लोग इसके आदि हैं, इसलिए यहां लोगों को तब असर पड़ेगा जब तापमान 50 डिग्री से ऊपर चला जाएगा। वैसे फीजियोलाजिस्ट अब तापमान के बजाय ‘वेट बल्ब टेम्परेचर’ (डब्ल्यूबीटी) का आधार मानते हैं। इसमें तापमान भले ही बहुत ज्यादा नहीं हो, लेकिन आर्दता की वजह से बेचैनी होती है। ब्रेन शरीर का तापमान नियंत्रित नहीं कर पाता है और शरीर के अंगों पर असर डॉ.लना शुरू करता है। वर्ष 2023 मुंबई के खारघर में आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान लू लगने से हुई 15 लोगों की मौत की जांच के बाद यह बात सामने आई थी। उस समय तापमान बहुत ज्यादा नहीं था, लेकिन हीटवेब या लू से ही लोगों की मौत हुई थी। नदी या समुद्र किनारे बसे शहरों में इसका खतरा ज्यादा रहता है। बीते कुछ सालों में हुए अध्ययन के बाद अब इस पर चर्चा हो रही है कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका असर पड़ता है।

हमारे अस्पताल कितने तैयार हैं?

– अहमदाबाद के अस्पतालों में आइस पैक (बर्फ की थैली) रखने लगे हैं। दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में आइस बाथटब जैसी व्यवस्थाएं हैं। इसमें जैसे ही हीट स्ट्रोक के गंभीर मरीज आते हैं, उन्हें बर्फ के पानी के भरे टब में बिठा दिया जाता है। यह काफी कारगर है। हालांकि यह वह व्यवस्थाएं हैं, जो अस्पताल या लोग अपने स्तर पर कर रहे हैं।

और सरकार के लिए क्या सुझाव?

– केंद्र व राज्य सरकारों को इसके लिए अलग से बजट तैयार रखना चाहिए, जिसका बड़ा हिस्सा जन जागरूकता में लगाना चाहिए। इतने गंभीर हीटवेब के बीच में भी मैंने तो कहीं किसी राज्य का एक भी सरकारी विज्ञापन नहीं देखा, जिसमें लोगों को जागरूक किया जा रहा हो। बचाव के उपाय बताए जाएं। एक बार फिर कहूंगा, हर नगर निगम, हर जिला, हर राज्य और केंद्र सब मौतों का तुलनात्मक अध्ययन करवाए। जन स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए यह बेहद जरूरी है। सिर्फ हीटवेब नहीं, बल्कि सभी तरह की बीमारी, महामारी व आपदा से बचने के लिए।

हीटवेव से बचाव के लिए आपके सुझाव ?

– प्यास लगी हो या नहीं, पानी पीते रहें। दोपहर 12 से शाम 4 बजे के बीच बाहर जाने से बचें। सीधे सूरज के नीचे काम करने वाले हर 45 मिनट-एक घंटे में खुद पर पानी छिड़के और थोड़ी देर छांव में बैठ जाएं। यदि बेचैनी हो रही है या फिर हल्का सिरदर्द शुरू हो गया तो तुरंत पास के अस्पताल में पहुंचे और शरीर में ठंडॉ. पानी डॉ.लें या आइस पैक रखें। रेड अलर्ट के दौरान केंद्र व राज्य सरकारें वालेंटरी कर्फ्यू लगाएं।

वर्ष 1961 से अब तक भारत में हीटवेव (लू) की आवृत्ति हर दशक 0.1 दिन और अवधि 0.44 दिन प्रति दशक की दर से बढ़ी है। वर्ष 2010 से 2024 के बीच देश में औसत न्यूनतम तापमान लगभग 0.21 डिग्री सेल्सियस प्रति वर्ष बढ़ा है। मौसम विज्ञान के लिहाज से यह छोटा बदलाव खेती, बिजली की मांग, मजदूरों की कार्यक्षमता एवं अस्पतालों पर भारी दबाव बना रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की गाइडलाइंस के अनुसार, घर के भीतर का तापमान लगातार 24 डिग्री सेल्सियस से ऊपर नहीं होना चाहिए, अन्यथा यह नींद, दिल और शरीर की रिकवरी पर बुरा असर डॉ.लता है, जबकि भारत के 36 में से 35 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में रात का पार तय मानकों से ऊपर बना हुआ है।

 

By admin