इमेज स्रोत, Subhankar Chakraborty/Hindustan Times via Getty Images
पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों के बाद उत्तर प्रदेश में भी राजनीतिक हलचल तेज़ हो गई है. प्रदेश में अगले साल 2027 में विधानसभा के चुनाव हैं.
बीजेपी चुनाव की तैयारियों को लेकर बूथ लेवल कमिटियों को सक्रिय करने का काम शुरू कर चुकी है.
इसके अलावा हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में जातीय और क्षेत्रीय समीकरण साधने की कोशिश की गई है.
विपक्षी दल भी चुनाव की तैयारी में जुट गए हैं.
मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ज़िलेवार बैठकें कर रहे हैं.
बीएसपी अध्यक्ष मायावती ने भी 24 मई को लखनऊ में बैठक करके पार्टी के नेताओं के साथ चुनावी रणनीति पर चर्चा की है.
जातीय और क्षेत्रीय समीकरण
इमेज स्रोत, MYogiAdityanath/facebook
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 10 मई, 2026 को प्रदेश सरकार में छह नए मंत्रियों को शामिल किया और दो राज्य मंत्रियों को स्वतंत्र प्रभार देकर उनका प्रमोशन किया गया.
आगामी विधानसभा चुनावों से पहले यह अंतिम कैबिनेट विस्तार हो सकता है क्योंकि योगी कैबिनेट में अब मंत्रियों की कुल संख्या 60 हो गई है, जो अधिकतम है.
इस कैबिनेट विस्तार में राज्य बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी को भी मंत्री पद मिला है. उनके अलावा समाजवादी पार्टी के बाग़ी विधायक मनोज कुमार पांडे को भी मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है, जो रायबरेली की ऊंचाहार सीट से विधायक हैं.
उनके अलावा फ़तेहपुर की खागा सीट से विधायक कृष्णा पासवान, अलीगढ़ के खैर से विधायक सुरेंद्र दिलेर, तिर्वा से विधायक कैलाश सिंह राजपूत और एमएलसी हंसराज विश्वकर्मा ने भी इस कैबिनेट विस्तार में राज्य मंत्री पद की शपथ ली है.

राज्य मंत्री अजीत सिंह पाल और सोमेंद्र तोमर को राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाया गया है.
जोड़े गए छह नए मंत्रियों में तीन अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और दो अनुसूचित जाति (एससी) से हैं. मनोज पांडे ब्राह्मण वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं.
अब योगी कैबिनेट में पिछड़ा वर्ग से 25, सामान्य वर्ग से 22, अनुसूचित वर्ग से 10, अनुसूचित जनजाति से एक, एक सिख और एक मुस्लिम मंत्री हैं.
नए बने छह मंत्रियों में तीन मध्य उत्तर प्रदेश, दो पश्चिमी उत्तर प्रदेश और एक पूर्वी उत्तर प्रदेश से हैं.
‘अपने लोग फिस्स, आन गांव का सिद्ध’
इमेज स्रोत, Deepak Gupta/Hindustan Times via Getty Images
नए मंत्रियों को विभागों का बंटवारा आठ दिन बाद ही हो सका. सोशल मीडिया पर इस देरी ही नहीं, बल्कि विभागों के बंटवारे को लेकर भी खूब चर्चा हो रही है.
समाजवादी पार्टी ने बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी को सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग विभाग और सपा से आए मनोज पांडे को खाद्य और रसद जैसा महत्वपूर्ण विभाग मिलने पर चुटकी ली.
अखिलेश यादव ने एक्स पर लिखा, ‘अपने लोग फिस्स, आन गांव का सिद्ध’.
मंत्रिमंडल विस्तार पर वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलाहंस कहते हैं, “ब्राह्मण चेहरे के रूप में मनोज पांडे को मंत्री बनाने से पार्टी के भीतर इस वर्ग में नाराज़गी है, क्योंकि पांडे समाजवादी पार्टी से आए थे. बीजेपी में उनसे बेहतर ब्राह्मण चेहरे मौजूद हैं. विभागों के बंटवारे में मनोज पांडे को छोड़कर बाकी लोगों को अपेक्षाकृत कम महत्व वाले विभाग दिए गए हैं.”
लेकिन वरिष्ठ पत्रकार कामना हजेला की राय अलग है.
वह कहती हैं, “इस मंत्रिमंडल विस्तार ने कई संकेत दिए हैं. योगी आदित्यनाथ के दूसरे कार्यकाल का यह बहुप्रतीक्षित विस्तार था. इस विस्तार से योगी आदित्यनाथ ने कई संदेश दिए हैं.”
अनुमान लगाया जा रहा था कि जब भी राज्य में कैबिनेट विस्तार होगा, उसमें पश्चिम उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल के बीच संतुलन बनाने की कोशिश होगी.
लेकिन वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं, “बीजेपी यह संतुलन बनाने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाई है. प्रदेश की सत्ता और संगठन पर पूर्वांचल का पलड़ा भारी है.”
सिद्धार्थ कलाहंस का भी कहना है, “मुख्यमंत्री, दोनों उपमुख्यमंत्री और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सभी पूर्वांचल से हैं. गृह, सूचना, राजस्व और लोक निर्माण जैसे महत्वपूर्ण विभाग मुख्यमंत्री के पास ही हैं.”
‘बीजेपी की आंतरिक सियासत’
इमेज स्रोत, Subhankar Chakraborty/Hindustan Times via Getty Images
कुछ राजनीतिक हलकों में कहा जा रहा है कि बीजेपी के दिल्ली के नेताओं और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच संबंध पूरी तरह से सहज नहीं हैं.
पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव लगातार कहते रहे हैं कि “डबल इंजन” आपस में टकरा रहे हैं.
क्या दिल्ली और लखनऊ के बीच वाक़ई तकरार है?
इस सवाल के जवाब में शरत प्रधान कहते हैं, “यह बात काफ़ी हद तक सही है कि दिल्ली के नेताओं और योगी आदित्यनाथ के बीच संबंध बहुत अच्छे नहीं हैं. हालांकि, इस बार की बाज़ी योगी आदित्यनाथ के हाथ लगी है.”
“योगी आदित्यनाथ की अपनी एक अलग पहचान है, जो हिंदुत्व की राजनीति पर आधारित है. इसी वजह से केंद्रीय नेतृत्व भी उन्हें पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता.”
मंत्रिमंडल विस्तार और विभागों के बंटवारे से पहले योगी आदित्यनाथ ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ बैठक की थी. इससे पहले कई दौर की बैठक प्रदेश संगठन के साथ भी हुई थी.
पत्रकार बृजेश शुक्ला कहते हैं, “इसके दो मायने हैं. पहला, केंद्रीय नेतृत्व ने पुराने मंत्रियों को छेड़ने की अनुमति नहीं दी. दूसरा, नए मंत्रियों के विभागों के वितरण में योगी आदित्यनाथ को फ्री हैंड दिया है.”

कामना हजेला के मुताबिक़, इस विस्तार ने उन सभी कयासों को ग़लत साबित कर दिया है, जिनमें कहा जा रहा था कि अब योगी आदित्यनाथ की नहीं चलेगी और केंद्रीय नेतृत्व उन पर लगाम कस रहा है.
वह कहती हैं, “इसके उलट, इस विस्तार ने 2027 तक योगी आदित्यनाथ की स्थिति और मज़बूत होने का संकेत दिया है. इसके स्पष्ट संकेत हैं कि 2027 में भी उत्तर प्रदेश में बीजेपी का चेहरा योगी आदित्यनाथ ही होंगे.”
सिद्धार्थ कलाहंस कहते हैं, “योगी आदित्यनाथ की सरकार में कई मंत्री केंद्रीय कोटे के हैं. इनमें ऊर्जा और नगर विकास मंत्री एके शर्मा भी हैं. शर्मा पहले आईएएस अधिकारी थे और इनकी गिनती प्रधानमंत्री के क़रीबी अफ़सरों में होती है.”
एके शर्मा के समर्थकों ने राज्य बीजेपी कार्यालय के पास होर्डिंग भी लगाई, “दुश्मन लाख बुरा चाहे तो क्या होता है, वही होता है जो ईश्वर को मंज़ूर होता है.”
इसके अलावा कई मंत्रियों को हटाए जाने को लेकर अटकलें थीं.
इस पर वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ला का कहना है, “केंद्रीय नेतृत्व ने इसकी अनुमति नहीं दी थी. बीजेपी के दिल्ली के नेता नहीं चाहते थे कि चुनाव वाले साल मंत्रिमंडल में बड़े स्तर पर छेड़छाड़ की जाए, क्योंकि इससे ग़लत राजनीतिक संदेश जाने का अंदेशा था.”
2027 में फिर से योगी आदित्यनाथ?
इमेज स्रोत, Debarchan Chatterjee/NurPhoto via Getty Images
मंत्रिमंडल विस्तार के बाद योगी आदित्यनाथ उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के यहां आयोजित पूजा में पहुंचे. इसे नया राजनीतिक संदेश देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.
हालांकि, राजनीतिक हलकों में कई साल से चर्चा है कि ब्रजेश पाठक केंद्रीय नेतृत्व की पसंद हैं.
इस पर वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ला कहते हैं, “पार्टी को योगी आदित्यनाथ की ज़रूरत है. चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद चुनाव प्रचार में योगी आदित्यनाथ की सबसे अधिक मांग रहती है. उत्तर प्रदेश से बाहर भी उनकी लोकप्रियता है. इसलिए पार्टी में उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती.”
वहीं, चुनाव के क़रीब योगी आदित्यनाथ भी यह संदेश देना चाहते हैं कि पार्टी पूरी तरह एकजुट है. अगले विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ की प्रतिष्ठा दांव पर रहेगी.
वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ला को लगता है कि अगर बीजेपी राज्य का अगला चुनाव जीतती है, तो पार्टी के भीतर योगी आदित्यनाथ का क़द और बढ़ जाएगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.