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राहुल गांधी पर पीएम मोदी के लगातार हमले लेकिन नेहा बोरा-दीपके पर चुप्पी के क्या मायने हैं

Byadmin

Oct 23, 2026


राहुल गांधी (बाएं) और नरेंद्र मोदी (दाएं)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को ‘फेल्ड प्रोडक्ट’ कहा है.

एक निजी चैनल के कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने राहुल गांधी के साथ-साथ कांग्रेस पर भी निशाना साधते हुए कहा, “पार्टी के नेता की साल भर में जितनी बार लॉन्चिंग होती है, उतनी श्रीहरिकोटा से भी नहीं होती.”

नरेंद्र मोदी ने ये भी कहा कि जब दुनिया ‘नई व्यवस्था’ की तलाश कर रही है, तब कुछ लोग ‘अव्यवस्था’ का सपना देख रहे हैं और भारत की वैश्विक छवि को ख़राब करना चाहते हैं.

गुरुवार को ही गृह मंत्री अमित शाह ने भी राहुल गांधी पर तंज कसा. उन्होंने नई दिल्ली में यमुना से जुड़ी योजनाओं का उद्घाटन करते हुए राहुल गांधी के विदेश दौरों पर तंज़ करते हुए कहा, “मैं जनता के बीच रहता हूं, इसलिए हर छह माह में मुझे विदेश नहीं जाना पड़ता.”

नरेंद्र मोदी और अमित शाह का एक ही दिन यानी गुरुवार को राहुल गांधी पर ये ‘डबल अटैक’ था. इस डबल अटैक की पृष्ठभूमि में कथित वोट चोरी के मुद्दे को लेकर हाल ही में हुआ प्रोटेस्ट है.

वीडियो कैप्शन, दिल्ली प्रोटेस्ट से निपटने का दिल्ली पुलिस का तरीका कितना सही?

वहीं अख़बार दैनिक जागरण के नेशनल ब्यूरो में सहायक संपादक अरविंद शर्मा कहते हैं, “अपने प्रतिद्वंद्वी को इग्नोर करना, कभी-कभी रणनीति का हिस्सा होता है. मोदी जी भी वही कर रहे हैं, दीपके और नेहा पर साइलेंट रहकर. उनको इग्नोर किया जा रहा है, ताकि उनका भाव न बढ़े.”

नेहा बोरा छात्र संगठन आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. ये छात्र संगठन सीपीआई (माले) से जुड़ा हुआ है.

पार्टी के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य बीबीसी से कहते हैं कि सरकार स्ट्रैटिजी के तहत ऐसा कर रही है. वो कहते हैं, “मोदी और शाह जनता के आंदोलन से डरे हुए हैं. ये लोग जेन-ज़ी की ताकत से डरते हैं. अभी मोहन भागवत का पूरा भाषण भी नौजवानों के ख़िलाफ़ था. डरी सरकार की यही स्ट्रैटजी है.”

‘बीजेपी का कांग्रेस मुक्त भारत अभियान’

विशेषज्ञों के मुताबिक़ एसआईआर के ख़िलाफ़ कांग्रेस सबसे मुखर रही है इसलिए पीएम के निशाने पर राहुल गांधी हैं

इमेज कैप्शन, विशेषज्ञों के मुताबिक़ एसआईआर के ख़िलाफ़ कांग्रेस सबसे मुखर रही है इसलिए पीएम के निशाने पर राहुल गांधी हैं

लेकिन क्या ये सिर्फ़ पॉलिटिकल राइवलरी है या कांग्रेस मुक्त भारत के बीजेपी के घोषित उद्देश्य की तरफ़ बढ़ाया गया एक रूटीन कदम है?

समाजशास्त्री और राजनीतिक विश्लेषक पुष्पेंद्र कहते हैं, “कांग्रेस कमज़ोर ही सही, लेकिन उसकी पूरे भारत में उपस्थिति है. एसआईआर के मुद्दे पर सबसे ज़्यादा मोबिलाइज़ेशन कांग्रेस का रहा है. ऐसे में आंदोलनों का सबसे ज़्यादा फ़ायदा अगर किसी को मिलेगा, तो कांग्रेस को मिलेगा. वहां अभी एक ही नेता है, राहुल गांधी. इसलिए राहुल पर आक्रामक होकर और अभिजीत-नेहा पर एक कदम पीछे हटकर बीजेपी अपने बड़े एजेंडे पर काम कर रही है. यानी कांग्रेस मुक्त के ज़रिए विपक्ष मुक्त भारत बनाना.”

लेकिन गुरुवार को नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में ‘ईमानदार आलोचकों’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए आंदोलनकारियों के प्रति सहानुभूति भी दिखाई. इसको कैसे देखा जाना चाहिए?

इस सवाल पर विजय त्रिवेदी कहते हैं, “सरकार दबाव में दिखती है. सरकार की कोशिश है कि आंदोलन का कोई बड़ा संगठित स्वरूप तैयार न हो. लेकिन छिटपुट आंदोलनों से सरकार को कोई दिक्कत नहीं है.”

वहीं समाजशास्त्री पुष्पेंद्र कहते हैं कि सरकार लगातार आंदोलन को नकार रही है, लेकिन मोदी सरकार तीन आंदोलनों में बैकफुट पर भी आई.

वो कहते हैं, “सरकार बौखलाई हुई है. एक आंदोलन ख़त्म होता है, दूसरा शुरू हो जाता है. सीएए, किसान और स्टूडेंट पेपर लीक प्रोटेस्ट में सरकार को पीछे हटना पड़ा. सच्चाई ये है कि कोई आंदोलन सफल हो या असफल, वो नए आंदोलन के लिए स्पेस तैयार करता है और किसी भी सरकार को जन आंदोलन पसंद नहीं है.”

राहुल की विदेश यात्राएं और डायस्पोरा

राहुल गांधी

इमेज कैप्शन, बीजेपी राहुल गांधी की विदेश यात्राओं पर लगातार सवाल उठाती रही है

कांग्रेस और राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए नरेंद्र मोदी ने ‘भारत की छवि ख़राब करने का आरोप’ लगाया. वहीं अमित शाह ने राहुल गांधी की विदेश यात्राओं पर टिप्पणी की.

आम लोगों में भी राहुल गांधी की विदेश यात्राएं चर्चा में रहती हैं.

वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं, “जैसे अभी सरकार दबाव में थी, उसी वक़्त जब राहुल गांधी विदेश जाते हैं, तो आंदोलनों को झटका लगता है. वहीं दूसरी तरफ़ सरकार को राहुल गांधी के मूवमेंट के बारे में जानकारी होती है, लेकिन वो इस तरह का राजनीतिक माहौल तैयार करती है कि राहुल गांधी एक नॉन-सीरियस नेता हैं. राहुल गांधी और उनकी टीम को इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए.”

लेकिन इस पूरी बहस में पुष्पेंद्र भारतीय डायस्पोरा का ज़िक्र लाते हैं.

वो कहते हैं, “मोदी को ये क्रेडिट जाता है कि उन्होंने ये साबित कर दिया कि कैसे डायस्पोरा भारत की अंदरूनी राजनीति को प्रभावित कर सकता है. उन्होंने इसको चैनलाइज़ किया और फंडिंग को नया उछाल दिया. चाइनीज़ डायस्पोरा के बाद इंडियन डायस्पोरा सबसे बड़ा है, ऐसे में मोदी को उसका बड़ा फ़ायदा भी हुआ. लेकिन बीते कुछ सालों में राहुल ने इस डायस्पोरा को पंक्चर भी किया है.”

पुष्पेंद्र कहते हैं, “राहुल गांधी की विदेश यात्राएं बुरी नहीं हैं. ख़ामी इस बात में है कि उनकी टीम उनकी यात्राओं के बारे में ठीक से कम्युनिकेट नहीं कर पा रही है, जैसा मोदी की यात्राओं का कम्युनिकेशन होता है. कम्युनिकेशन में गैप के चलते कंफ्यूज़न होता है और राहुल गांधी की एक नॉन-सीरियस नेता की छवि बनती है, जो बीजेपी संगठन की 24 घंटे काम करने वाली छवि के बरक्स कहीं स्टैंड नहीं करती.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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