जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को कहा कि लोकतंत्र की मजबूती टकराव में नहीं, बल्कि संस्थागत संतुलन और पारस्परिक मर्यादाओं से होती है। 75 साल में न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन की एक अच्छी स्पि्रट बनी है, इसे और दृढ़, सुदृढ़ और आगे बढ़ाने के लिए हम सबको साथ मिलकर काम करना चाहिए।
ये बातें गृह मंत्री ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दो पुस्तकों द बेंच द बार एंड द बिजार तथा द लाफुल एंड द आफुल के विमोचन के अवसर पर कहीं। उन्होंने कहा कि इन पुस्तकों के लेखक न सिर्फ भारत के सालिसिटर जनरल और एक विद्वान वकील हैं, बल्कि उनके दोस्त भी हैं।
अमित शाह ने की तुषार मेहता की तारीफ
अमित शाह ने कहा कि मैं तुषार भाई को जानता हूं कि उन्होंने कानूनी मर्यादा और गंभीरता दोनों को बनाए रखते हुए अदालती प्रक्रियाओं में छिपे जीवन, हास्य व्यंग्य और मानवीय स्वभाव की बहुत सुंदर अभिव्यक्ति बड़ी बारीकी के साथ की है।
इस मौके पर भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, अटार्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और न्यायविद् व कानूनविद् मौजूद थे। दिल्ली के भारत मंडपम में दोनों पुस्तकों का रविवार को विमोचन हुआ। तुषार मेहता की ये पुस्तकें कानूनी पेशे से जुड़े अनोखे, ज्ञानवर्धक, विचारोत्तेजक किस्सों को सामने लाती हैं। ये पाठकों को कानून, वकालत और मानवीय अनुभवों के दिलचस्प मेल की झलक दिखाती हैं।
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हालांकि पुस्तकें दुनिया की अदालतों के किस्सों की बात करती हैं। ये भारतीय न्यायपालिका पर नहीं हैं। समारोह के मुख्य अतिथि गृह मंत्री अमित शाह ने भारतीय लोकतंत्र और इसके आधार भारतीय संविधान की खासियत को बताते हुए कहा कि संस्थाओं को एक दूसरे का विरोध करने के लिए नहीं, बल्कि एक दूसरे को संतुलित करने के लिए बनाया गया है।
भारत का मजबूत लोकतंत्र
इस कड़ी को हमें समझना पड़ेगा। कार्यपालिका निर्णय लेती है, न्यायपालिका उसकी संवैधानिक समीक्षा करती है। हमारे संविधान निर्माताओं ने संवाद, मर्यादा और संतुलन तीनों को बनाए रखने के लिए बहुत अच्छे तरीके से संविधान को लिखा है।
उन्होंने कहा कि संविधान और न्यायपालिका ने भारत के लोकतंत्र की जड़ों को गहरा करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 1947 से अब तक संसद और विधानसभाओं द्वारा लाए गए बदलावों को बिना एक बूंद खून बहाए स्वीकार किया गया है, जो यह दिखाता है कि हमारे देश में लोकतंत्र की जड़ें कितनी गहरी हैं। इसे हासिल करने में अदालतों और संविधान की बड़ी भूमिका रही है।
उन्होंने कहा कि पूरे देश को यह भरोसा है कि किसी भी अन्याय की स्थिति में संविधान उनकी रक्षा के लिए मौजूद है। यदि अधिकारों पर कोई हमला होता है तो न्याय के द्वारा खुले हैं। और यदि कहीं भी किसी कमजोर व्यक्ति की आवाज दबाई जाती है तो अदालतें निश्चित रूप से उन आवाजों को सुनेंगी।
कैसे दूर होंगी कमियां?
उन्होंने कहा कि यदि इसमें कुछ कमियां हैं तो उसे कार्यपालिका और न्यायपालिका को एक ठोस समय सीमा वाले रोडमैप के जरिये दूर करना होगा। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने तुषार मेहता की लेखन शैली और पुस्तकों की प्रशंसा की।
कहा कि इन दोनों पुस्तकों की विषय वस्तु देखने के बाद यही सोच रहा था कि यदि कानून की दुनिया छुट्टी मनाने किसी कामेडी क्लब में चली जाए तो क्या होगा। विद्वान सालिसिटर के पास इसका उत्तर है। अपने साहित्यिक डबल डेकर के रूप में दो पुस्तकें द बेंच द बार एंड द बिजार और द लाफुल एंड आफुल।
चीफ जस्टिस ने कहा कि इन दोनों पुस्तकों को लगातार पढ़ना ऐसा है मानो किसी कोर्ट रूम ड्रामा ने गलती से स्टैंडअप कामेडी सेशन में प्रवेश कर लिया हो। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि विद्वान सालिसिटर जनरल ने वह किया है, जिसे करने का साहस बहुत कम लोग जुटा पाते हैं।
चीफ जस्टिस ने क्या कहा?
वे कानूनी जगत के पवित्र गलियारों में केवल तीक्ष्ण व्यंग्य और सूक्ष्म दृष्टि के सहारे प्रवेश कर गए और उन्होंने ऐसी पुस्तकों का संग्रह तैयार किया जिसमें किस्सों का ऐसा खजाना है जो सबसे गंभीर न्यायविद को भी मुस्कराने पर मजबूर कर दे।
चीफ जस्टिस ने कहा कि इन हास्यप्रद प्रसंगों को पढ़ते हुए उन्हें हमारी न्यायालय प्रणाली की कुछ अमूल्य कहानियां याद आ गईं। जस्टिस सूर्यकात ने भारतीय अदलतों में बार और बेंच के बीच के कई रोचक किस्से भी साझा किए।
‘ये किताबें पेश करती हैं न्याय दिलाने की प्रक्रिया के छिपे हुए पहलुओं की एक दुर्लभ और गहरी झलक’
अटार्नी जनरल आर वेंकरमणी ने मेहता की पुस्तकों की सराहना करते हुए कहा कि ये किताबें न्याय दिलाने की प्रक्रिया के छिपे हुए पहलुओं की एक दुर्लभ और गहरी झलक पेश करती हैं। तुषार मेहता ने अपनी पुस्तकों के बारे में बात करते हुए कहा कि एक वकील होने और कानून के हल्के-फुल्के पहलुओं पर किताब प्रकाशित करने में एक खास बात है।
यह कुछ ऐसा लगता है जैसे कि कोई सर्जन अपने ही ऑपरेशन थिएटर के बारे में मजाकिया अंदाज में लिख रहा हो। उन्होंने कहा कि ये पुस्तकें न तो कोई शोध ग्रंथ हैं और न ही कानून के किसी खास विषय की आलोचना। ये सच्ची कहानियों का संग्रह हैं।
किताब में क्या-क्या है?
इनमें कुछ भी काल्पनिक या मनगढ़ंत नहीं है। मेहता ने कहा कि चूंकि मै भारत में वकालत कर रहा हूं और अगले कुछ वर्षों तक ऐसा ही करने का इरादा है, इसलिए मैंने भारतीय अदालतों, भारतीय जजों या भारतीय फैसलों से जुड़ा कोई भी किस्सा शामिल न करने का फैसला किया है।