पीटीआई, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कॉरपोरेट जगत और न्याय प्रणाली को झकझोर देने वाले एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी कंपनी पर आपराधिक मुकदमा केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि जांच एजेंसी ने उसके किसी खास निदेशक, कर्मचारी या अन्य अधिकारी को इस मामले में प्रत्यक्ष रूप से आरोपित नहीं बनाया है।
यह ऐतिहासिक फैसला जस्टिस जे.बी. पार्डीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने सैनोफी इंडिया लिमिटेड की उस अपील को खारिज करते हुए सुनाया, जिसमें कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें कंपनी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद करने से इनकार कर दिया गया था।
भाभा एटामिक रिसर्च सेंटर के लिए दवाओं की कथित तौर पर अधिक दरों पर खरीद और उसके बदले रिश्वत से जुड़े इस मामले ने पूरे देश का ध्यान खींचा है।
कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या किसी व्यक्ति को आरोपित बनाए बिना सीधे कॉरपोरेट इकाई के खिलाफ कानूनी कार्यवाही को आगे बढ़ाया जा सकता है।
98 पन्नों के अपने इस संवेदनशील और विस्तृत फैसले में जस्टिस पार्डीवाला ने इस बात पर गहराई से विचार किया कि कैसे एक अमूर्त और अदृश्य संस्था होने के बावजूद कोई कंपनी आपराधिक भावना यानी ‘मेन्स रिया’ की दोषी हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानूनी रूप से यह सर्वविदित है कि कंपनियों की अपनी कोई आत्मा नहीं होती जिसे सजा दी जा सके और न ही कोई शरीर होता है जिसे जेल भेजा जा सके। इसके बावजूद, अपार वित्तीय और सामाजिक ताकत रखने वाली ये बड़ी संस्थाएं समाज और व्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखती हैं।
ऐसे में, यह जरूरी है कि अपराध के प्रत्यक्ष प्रमाण और परिस्थितियों के आधार पर कंपनी की भूमिका को सीधे तौर पर आंका जाए, भले ही पर्दे के पीछे काम करने वाले किसी विशेष व्यक्ति का नाम शुरुआती चार्जशीट में शामिल न हो सके।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक चार्जशीट से यह साफ तौर पर जाहिर होता है कि कंपनी ने स्वयं अपराध किया है और उसकी आंतरिक कार्यप्रणाली व फैसलों में अवैधता शामिल रही है, तब तक केवल व्यक्तिगत नाम न होने से कॉरपोरेट अपराध की यह न्याय प्रक्रिया कमजोर नहीं पड़ेगी।
इस व्यवस्था के तहत सुप्रीम कोर्ट ने तीन चरणों वाला एक व्यापक ढांचा भी तय किया है, जिसके जरिये यह परखा जाएगा कि किसी इंसान का दोषी मन आखिरकार कंपनी तक कैसे ‘आरोपित’ होता है।
इस फैसले ने देश में कॉरपोरेट अपराध और उसकी जवाबदेही की परिभाषा को हमेशा के लिए बदल दिया है।