डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि परमाणु दुर्घटना की स्थिति में उचित मुआवजा तय करने की प्रक्रिया से क्या न्यायालय को अलग रखा गया है। कोर्ट ने केंद्र से शांति अधिनियम (सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट आफ न्यूक्लियर एनर्जी) के प्रविधानों के बारे में स्पष्ट जवाब मांगा है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली जस्टिस जयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहाना की पीठ ने कहा, हमें दो बिंदुओं पर स्पष्टीकरण चाहिए। पहला, क्या उचित मुआवजा तय करने की प्रक्रिया में संवैधानिक न्यायालय की शक्ति को रुकावट या बेड़ी माना जा रहा है।
दूसरा, अधिनियम की उपधारा 17 (4) जिसमें परमाणु ऊर्जा नियामक परिषद के सदस्यों की नियुक्ति संबंधी प्रविधान हैं। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि नियामक संस्था में सदस्यों की नियुक्ति को लेकर क्या कहीं पर हितों का टकराव हो रहा है ?
सुप्रीम कोर्ट इस सिलसिले में दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा है। इस याचिका को विज्ञान के प्रोफेसरों और विज्ञानियों सहित कई जागरूक नागरिकों ने दायर किया है। इस समूह का नेतृत्व पूर्व नौकरशाह ईएएस सरमा कर रहे हैं। याचिका में कहा गया है कि 2025 में बने नए अधिनियम के प्रविधान नागरिकों को संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मिले मूल अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन हैं।
याचिकाकर्ताओं के समूह की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण और नेहा राठी ने याचिका के समर्थन में दलीलें पीठ के समक्ष रखीं। कहा, शांति अधिनियम किसी भी दुर्घटना की स्थिति में जिम्मेदारी को सीमित करने वाला है जिसका खामियाजा अंतत: पीड़ित को भुगतना पड़ेगा।
याचिका में कहा गया है कि शांति अधिनियम में किसी भी बड़े परमाणु संयंत्र में होने वाली दुर्घटना के लिए अधिकतम तीन हजार करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति का प्रविधान है। जबकि चेर्नोबिल (सोवियत संघ) और फुकुशीमा (जापान) में परमाणु दुर्घटना की स्थिति में इस धनराशि से सैकड़ों गुना ज्यादा का नुकसान हुआ था और उसी अनुपात में मुआवजा तय हुआ था।
सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, शांति अधिनियम को लेकर कई तरह की आशंकाएं हैं। अगर परमाणु संयंत्र का संचालकों की जिम्मेदारी को तय करने में संसद निर्णय नहीं ले पाई लेकिन कोर्ट को न्यायोचित क्षतिपूर्ति का निर्धारण करने से नहीं रोका जा सकता है।
उन्होंने कहा, संसद ने इस अधिनियम से जुड़ा विधेयक परमाणु परियोजना समर्थकों के लाभ और निवेश को बढ़ावा मिलने की नीयत से पारित किया। पीठ ने केंद्र सरकार से एटामिक एनर्जी रेग्यूलेटरी बॉडी के सदस्यों की स्थिति और उनके अधिकारों के बारे में स्पष्ट जानकारी देने के लिए कहा है।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)