नीलू रंजन, नई दिल्ली। एनसीपी (शरद पवार गुट) के महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक के समर्थन के संकेत के बाद सरकार इसके लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत के थोड़े और करीब पहुंच गई है।
एनसीपी (शरद पवार गुट) के आठ सांसदों के विधेयक के समर्थन की स्थिति में सत्तापक्ष का आंकड़ा 332 तक पहुंच जाएगा, जो 543 सदस्यीय लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत के जरूरी 362 सांसदों से 30 कम है। आईएनडीआईए गठबंधन से अलग हो चुके 22 सांसदों वाले डीएमके के रूख के साथ-साथ झारखंड मुक्ति मोर्चा जैसे छोटे दलों का रूख सरकार के पक्ष में बाजी पलट सकता है।
महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक पर पहली नजर
आगामी मानसून सत्र में सबसे ज्यादा नजर महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक पर ही रहेगी। 17 अप्रैल को सरकार संख्या बल जुटाने में विफल रही थी। विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े थे, जबकि विपक्ष में 230 वोट पड़े थे। कुल 528 सांसदों ने मतदान किया, विधेयक को पास कराने के लिए इसके दो-तिहाई यानी 352 वोट चाहिए थे।
लेकिन पिछले तीन महीने में लोकसभा का गणित तेजी से बदला है। पहले टीएमसी में टूट के बाद 20 सांसदों का नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी आफ इंडिया (एनसीपीआइ) के राजग में आने और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के छह सांसदों के शिवसेना में शामिल होने के बाद विधेयक का समर्थन करने वालों सांसदों की संख्या 324 पहंच गई है। यदि आठ सांसदों वाला एनसीपी (शरद पवार गुट) विधेयक का समर्थन करता है तो यह संख्या 332 पहंुच जाती है।
डीएमके पर सबकी नजरें
अब नजरें डीएमके के रूख को लेकर है। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव ठीक पहले डीएमके ने विधेयक का पूरजोर विरोध करते हुए इसके खिलाफ मतदान किया था। लेकिन चुनाव परिणामों के बाद स्थिति बदल गई है। एसआइआर के पक्ष में भारत के मुख्य न्यायाधीश को लिखे पत्र पर विपक्ष के साथ हस्ताक्षर करने के बाद कांग्रेस डीएमके के भाजपा विरोधी रूख पर कायम रहने की उम्मीद कर रही है।
वहीं 50 फीसद सीटों की एकमुश्त बढ़ोतरी का हवाला देकर भाजपा डीएमके को मनाने में जुटी है। विधेयक के पक्ष में डीएमके वोट करने की स्थिति में 354 सांसदों के समर्थन के सत्तापक्ष की स्थिति काफी मजबूत हो जाएगी। यदि डीएमके मतदान के समय सदन से अनुपस्थित भी रहता है तो जरूरी दो-तिहाई बहुमत की संख्या 348 आ जाएगी, जो सत्तापक्ष के पास मौजूद 332 सांसदों से महज 16 कम है। ऐसे में केवल 24 और सांसदों की अनुपस्थिति से सत्तापक्ष में 332 सांसदों के सहारे भी दो-तिहाई बहुमत तक पहुंचा जा सकता है।