पीटीआई, नई दिल्ली। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा है कि पर्यावरण संरक्षण का दायरा सिर्फ अलग-अलग प्रजातियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए रहकर पूरे लैंडस्केप तक बढ़ना चाहिए, जिसमें वैज्ञानिक प्रबंधन और समुदाय की भागीदारी हो।
लैंडस्केप का मतलब किसी खुले क्षेत्र या जमीन का वह हिस्सा है जो एक बार में आंखों से दिखाई देता है, जिसमें पहाड़, नदियां, पेड़-पौधे और इमारतें शामिल हो सकती हैं। मंत्री ने ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के संरक्षण की स्थिति और प्रोजेक्ट चीता की समीक्षा के दौरान ये बातें कहीं।
भुज गुजरात में आयोजित इस कार्यक्रम में भूपेंद्र ने ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण) के संरक्षण के लिए गुजरात एक्शन प्लान भी जारी किया, जिसे वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने गुजरात वन विभाग के सहयोग से तैयार किया था। मंत्री ने घास के मैदानों के महत्व पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि ये भारत के कुल जमीन के लगभग 24 प्रतिशत हिस्से में हैं, लेकिन फिर भी ये देश के सबसे कम संरक्षित इकोसिस्टम में से एक हैं।
प्रोजेक्ट चीता की समीक्षा करते हुए भूपेंद्र यादव ने बताया कि भारत में चीतों की संख्या 52 तक पहुंच गई है, जिसमें देश में पैदा हुए 49 शावक भी शामिल हैं।
‘मैंग्रोव को जीवित इकोसिस्टम के तौर पर संरक्षित करें’
भूपेंद्र यादव ने कहा कि मैंग्रोव को जीवित इकोसिस्टम के तौर पर संरक्षित किया जाना चाहिए, क्योंकि ये तटीय जैव-विविधता, मछली पालन, तट की सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन का सामना करने की क्षमता और आजीविका के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।
कच्छ जिले के भुज में मैंग्रोव संरक्षण, बहाली और टिकाऊ प्रबंधन पर आयोजित कार्यशाला में मंत्री ने मैंग्रोव के वैज्ञानिक प्रबंधन, सामुदायिक भागीदारी और तकनीक-आधारित निगरानी पर भी जोर दिया।
इस कार्यक्रम में उन्होंने गुजरात का मैंग्रोव एटलस जारी किया और मैंग्रोव जीआइएस पोर्टल लॉन्च किया।