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स्पेसपोर्ट के कामकाज का प्राइवेटाइजेशन करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है In-SPACe, 986 करोड़ रुपये का है प्रोजेक्ट

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Aug 9, 2026


डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। स्पेस प्रमोटर और रेगुलेटर इन-स्पेस ने तमिलनाडु के कुलसेकरपट्टिनम में इसरो के बनाए जा रहे 986 करोड़ रुपये के स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च कॉम्प्लेक्स (एसएलसी) के ऑपरेशन और मैनेजमेंट को प्राइवेट सेक्टर को सौंपने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

लगभग 2,233 एकड़ में फैले इस दूसरे स्पेसपोर्ट के शुरुआती प्लान के मुताबिक, सरकार ने कहा था कि इसके चालू होने के बाद प्राइवेट सेक्टर की ओर से एसएसएलवी और इसी तरह के दूसरे लॉन्च व्हीकल की लॉन्चिंग यहीं से की जाएगी।

प्राइवेट आमंत्रित कर रहा इन-स्पेस

IN-SPACe अब इस दिशा में एक कदम और आगे बढ़ते हुए प्राइवेट कंपनियों को इसके ऑपरेशन और मेंटेनेंस की जिम्मेदारी लेने के लिए आमंत्रित कर रहा है। एक सही इंडस्ट्री पार्टनर की पहचान करने के लिए इन-स्पेस ने एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EoI) जारी किया है। इसमें योग्य भारतीय कंपनियों से नए लॉन्च कॉम्प्लेक्स को ऑपरेट और मैनेज करने के लिए प्रस्ताव मांगे गए हैं। यह कॉम्प्लेक्स मुख्य रूप से छोटे रॉकेट लॉन्च करने के लिए बनाया जा रहा है।

IN-SPACe के अनुसार, “कामकाज को आसानी से ट्रांसफर करने और क्षमता विकसित करने के लिए इसरो चुनी गई कंपनी को जरूरी टेक्निकल गाइडेंस, ऑपरेशनल सपोर्ट, ट्रेनिंग और शुरुआती मदद देगा। यह मदद एक तय समय तक दी जाएगी या तो चुनी गई कंपनी द्वारा लॉन्च व्हीकल ऑपरेटरों को तीन लॉन्च सर्विस पूरी होने तक या एक साल तक जो भी पहले हो।”

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चुना गया ऑपरेटर लॉन्च कॉम्प्लेक्स के एंड-टू-एंड मैनेजमेंट के लिए जिम्मेदार होगा। इसमें लॉन्च कैंपेन ऑपरेशन, सुविधाओं और सिस्टम का मेंटेनेंस, सुरक्षा, मिशन की तैयारी, एसेट मैनेजमेंट, लॉजिस्टिक्स और इसरो, इन-स्पेस व लॉन्च कस्टमर्स के साथ तालमेल बिठाना शामिल है।

नए स्पेसपोर्ट से क्या होगा फायदा?

एसएससी कुलसेकरपट्टिनम में बन रहे नए स्पेसपोर्ट का हिस्सा है, जिसे इसरो भारत के दूसरे लॉन्च साइट के तौर पर विकसित कर रहा है। तमिलनाडु के तट पर थूथुकुडी से लगभग 55 किमी दूर स्थित यह साइट छोटे सैटेलाइट को पोलर और सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में लॉन्च करने के लिए कई फायदे देती है।

श्रीहरिकोटा से होने वाले लॉन्च के उलट कुलसेकरपट्टिनम से रॉकेट सीधे दक्षिण की ओर हिंद महासागर के ऊपर से उड़ान भर सकते हैं। उन्हें श्रीलंका के ऊपर से उड़ान भरने से बचने के लिए डॉग-लेग मैन्यूवर (रास्ता बदलने की प्रक्रिया) करने की जरूरत नहीं पड़ती।

इससे पेलोड ले जाने की क्षमता बेहतर होती है, ईंधन की जरूरत कम होती है और मिशन ज्यादा कुशल बनते हैं, खासकर एसएसएलवी के लिए। लॉन्च कॉम्प्लेक्स को इस तरह डिजाइन किया गया है कि मिशन के बीच कम समय में तेजी से दोबारा लॉन्च किया जा सके।

इसरो का एसएसएलवी छोटे सैटेलाइट्स को जरूरत पड़ने पर लॉन्च करने के लिए बनाया गया था। इसमें बड़े लॉन्च व्हीकल की तुलना में कम लोगों और कम इंटीग्रेशन समय की जरूरत होती है।

माना जा रहा है कि यह व्हीकल और नया लॉन्च कॉम्प्लेक्स मिलकर छोटे सैटेलाइट्स के लिए खास तौर पर होने वाले लॉन्च की बढ़ती घरेलू और ग्लोबल मांग को पूरा करेंगे।

इसरो की टेक्नोलॉजी लेने को तैयार इन-स्पेस

पिछले कुछ महीनों में इन-स्पेस ने इंडस्ट्री से इसरो द्वारा विकसित पीएसएलवी और एलवीएम-3 लॉन्च व्हीकल की टेक्नोलॉजी लेने को कहा है, जबकि एसएसएलवी की टेक्नोलॉजी पहले ही डिफेंस पीएसयू हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने 511 करोड़ रुपये में ले ली है।

जून में एजेंसी ने प्राइवेट कंपनियों को इसरो की अहम सुविधाओं में से एक नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) के अंदर ग्राउंड स्टेशन बनाने और चलाने के लिए आमंत्रित किया था। इस EoI के जरिए हैदराबाद के बाहरी इलाके शादनगर में एनआरएससी कैंपस के अंदर सैटेलाइट ग्राउंड स्टेशन बनाने और चलाने के लिए तीन भारतीय कंपनियों को चुना जाना था।

इसके अलावा इन-स्पेस दो नई योजनाएं भी लागू करेगा। इनसे भारतीय प्राइवेट स्पेस कंपनियों और गैर-सरकारी संस्थाओं को लॉन्च सर्विस और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर से लेकर सैटेलाइट डेटा और इसरो की सुविधाओं तक के इस्तेमाल पर 30% से 100% तक सब्सिडी मिलेगी।

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