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असम के मुख्यमंत्री के तौर पर हिमंत बिस्वा सरमा दूसरी बार शपथ लेने जा रहे हैं.
बीते 4 मई को जब असम विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आए और एनडीए गठबंधन दो-तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में लौटी, तो गुवाहाटी स्थित भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) दफ़्तर से सिर्फ़ जश्न की ही तस्वीर सामने नहीं आई, बल्कि हिमंत बिस्वा सरमा के बढ़ते राजनीतिक क़द को लेकर चर्चाएं भी सुनाई दीं.
यहां बीजेपी ख़ेमे में ज़्यादातर लोगों का मानना है, ”इस जीत के पीछे सबसे बड़ी वजह हिमंत का नेतृत्व है”.
126 विधानसभा सीटों वाले प्रदेश में पार्टी अकेले 82 सीटें जीतने में सफल रही है. वहीं उसकी सहयोगी पार्टियों समेत एनडीए गठबंधन को कुल 102 सीटें मिलीं. गठबंधन के लिए प्रदेश में इस जीत को पार्टी कार्यकर्ता ऐतिहासिक मान रहे हैं और इसके लिए हिमंत बिस्वा सरमा को क्रेडिट दे रहे हैं.
कई कार्यकर्ताओं का मानना था कि असम में इस तरह की निर्णायक जीत ने हिमंत बिस्वा सरमा के राजनीतिक क़द को राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ा दिया है.
एक महिला कार्यकर्ता हमसे कहती हैं, ”ऐसा लगता है कि वो और आगे जाएंगे, प्रधानमंत्री के लेवल तक.”
वहीं एक और महिला ने कहा, ”हम लोग सोचते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी के बाद वही देश के अगले प्रधानमंत्री बनेंगे क्योंकि उनमें नेतृत्व करने की बेहतरीन क्षमता है.”
ये सारी बातें वैसे तो हमें बीजेपी के ही खेमे से सुनाई दीं…लेकिन इन्हें अतिशयोक्ति मानकर नहीं चला जा सकता, क्योंकि विपक्ष भी असम की राजनीति में हिमंत बिस्वा सरमा की केंद्रीय भूमिका को स्वीकार करता है.
चुनाव प्रचार के दौरान बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में विपक्षी नेता अखिल गोगोई ने ये तक कहा था कि, “लड़ाई बीजेपी से नहीं, बल्कि हिमंत से है.”
राष्ट्रीय राजनीति
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ऐसे में हिमंत के नेतृत्व में पार्टी ने जो निर्णायक जीत दर्ज की है, क्या उससे हिमंत का क़द राष्ट्रीय राजनीति में और बड़ा होगा?
इस सवाल के जवाब में सेंट्रल गुवाहाटी से नवनिर्वाचित विधायक और पार्टी के वरिष्ठ नेता विजय गुप्ता कहते हैं कि हिमंत का क़द पहले से ही राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा हो चुका है.
उनके मुताबिक, ”हिमंत अब सिर्फ़ असम या पूर्वोत्तर तक सीमित नेता नहीं रहे, बल्कि बीजेपी के उन चेहरों में शामिल हो चुके हैं जिनकी रणनीति और चुनावी क्षमता पर पार्टी नेतृत्व खुलकर भरोसा करता है.”
पिछले कुछ सालों में देखें तो हिमंत बीजेपी के सबसे सक्रिय स्टार कैंपेनर्स में से एक बनकर उभरे हैं. उन्होंने सिर्फ़ असम ही नहीं, बल्कि कई दूसरे राज्यों में भी चुनाव प्रचार किया.
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ख़ासतौर पर 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने लगभग डेढ़ महीने में आठ राज्यों में 47 जनसभाएं और कई रोड शो किए. उनके आक्रामक तेवर और सांप्रदायिक भाषणों की तुलना उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी की जाती है.
बीजेपी नेता विजय गुप्ता कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और कैबिनेट के तमाम दिग्गज मंत्रियों से इतर राष्ट्रीय पटल पर बीजेपी के दो चेहरे ऐसे हैं, जिनकी स्वीकार्यता और लोकप्रियता की चर्चा होती है – ”एक योगी आदित्यनाथ और दूसरे हिमंत बिस्वा सरमा”.
एक सवाल यह भी उठता है कि योगी आदित्यनाथ देश के सबसे बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और हिमंत असम जैसे छोटे राज्य के, तो दोनों के क़द को एक जैसा कैसे देखा जा सकता है?
लंबा सफर बाकी
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इस सवाल के जवाब के लिए हिमंत बिस्वा सरमा के बीजेपी में सफ़र को देखना होगा.
11 साल पहले 2015 में अमित शाह की पहल पर हिमंत बीजेपी में शामिल हुए थे. तब असम में कांग्रेस का दबदबा था और बीजेपी के केवल पांच विधायक थे. वहीं त्रिपुरा में वामपंथ की सरकार मज़बूती के साथ सत्ता में थी, जबकि मेघालय, मिज़ोरम और नगालैंड जैसे राज्यों में क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस का प्रभाव ज़्यादा था.
अगले ही साल साल 2016 में हिमंत को बीजेपी की तरफ़ से नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस यानी नेडा का संयोजक बनाया गया, उन्होंने क्षेत्रीय दलों को बीजेपी के साथ जोड़ने की रणनीति पर काम किया.

असम में बीजेपी की पहली सरकार बनाने से लेकर अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और त्रिपुरा जैसे राज्यों में पार्टी या उसके सहयोगियों की सरकार बनवाने में उनकी बड़ी भूमिका मानी गई.
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, हिमंत ने पूर्वोत्तर में कांग्रेस के लंबे वर्चस्व को तोड़ने, क्षेत्रीय नेताओं को अपने साथ लाने और बीजेपी को एक स्वीकार्य राजनीतिक ताक़त बनाने में अहम भूमिका निभाई और यही कारण है कि वह पार्टी के भीतर और बाहर मज़बूत चेहरा बनकर उभरे.
इस उभार के बीच उनके केंद्र की राजनीति में क़दम बढ़ाने को लेकर कयास लगते रहे हैं. यहां तक कि इस बात को लेकर भी कि जब कभी पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन होगा, तब हिमंत भी एक विकल्प के तौर पर देखे जा सकते हैं.
लेकिन विश्लेषक मानते हैं कि अभी इसमें वक़्त है और पूरे देश में एक बड़े राष्ट्रीय नेता की पहचान बनाने के लिए हिमंत को और लंबा सफ़र तय करने की ज़रूरत.
राज्य की राजनीति से आगे बढ़ने के संकेत

वैसे इसी साल फ़रवरी के महीने में हिमंत ने मीडियाकर्मियों से बात करते हुए कहा था कि वह अभी अगले पांच सालों के लिए खुद को राज्य की राजनीति तक ही सीमित रखना चाहते हैं.
अपने इस बयान में वह कहते हैं, ”कई लोग हैं जो प्रधानमंत्री या गृहमंत्री के पद की रेस में हैं, पर असम को मेरी ज़रूरत है और इसलिए मैं अगले पांच सालों के लिए स्टेट पॉलिटिक्स में ही रहना चाहता हूं. उसके बाद का मुझे नहीं पता. मैं 60 साल का हो जाऊंगा…फिर क्या करूंगा ये उसी वक़्त देखा जाएगा.”
लेकिन असम की राजनीति को बीते 30 सालों से कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार रनेन गोस्वामी दावा करते हैं कि हिमंत की महत्वाकांक्षाएं पहले से केंद्र में जाने की रही है.
वह कहते हैं, ”2019 में हिमंत बिस्वा सरमा लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में थे. उन्होंने पार्टी से तेज़पुर सीट से टिकट की मांग की थी. सबकुछ तय हो चुका था पर फिर पार्टी के पार्लियामेंट्री बोर्ड ने तय किया कि हिमंत फ़िलहाल राज्य में ही रहें.”
नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर प्रदेश में बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि जो साल 2019 में नहीं हो सका, वो अगले कुछ सालों में आपको देखने को मिल जाएगा. हिमंत को राष्ट्रीय राजनीति में ले जाने की योजना है.
असम छोड़कर केंद्र की राजनीति में प्रवेश करने को लेकर वरिष्ठ पत्रकार नवा ठाकुरिया कहते हैं, ”हिमंत के लिए फ़िलहाल असम छोड़ना संभव नहीं है. उन्होंने असम में ऐसे बहुत से मुद्दे उठा दिए हैं, जिन पर उन्हें काम करना ही पड़ेगा. जैसे- उन्होंने जो बेदखली अभियान चलाया है, जो राज्य पर कर्ज़ का बोझ है, और जो असम की स्थानीय जनता है, उनकी पहचान को बचाने का मुद्दा है…इन सभी मुद्दों को देखते हुए उनका अगले दो-तीन साल में दिल्ली जाना संभव नहीं लगता.”
बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता भी इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं.
अगले प्रधानमंत्री की रेस
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रही बात नेतृत्व परिवर्तन और हिमंत के दावेदारी की, तो राजनीतिक लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय का मानना है कि बीजेपी में नेतृत्व परिवर्तन का सवाल ही अभी दूर है.
उनके मुताबिक, ”बीजेपी अगला लोकसभा चुनाव भी नरेंद्र मोदी के चेहरे पर ही लड़ेगी. उनका कहना है कि भले ही 2034 तक नहीं, लेकिन मोदी कम से कम 2031 तक प्रधानमंत्री पद पर बने रह सकते हैं. ऐसा होने पर वे देश के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता बन जाएंगे और जवाहर लाल नेहरू का रिकॉर्ड भी पीछे छोड़ देंगे.”
नीलांजन मुखोपाध्याय का यह भी मानना है कि मोदी के बाद सबसे मज़बूत दावेदार गृह मंत्री अमित शाह माने जाते हैं. उनके मुताबिक, ”हाल के विधानसभा चुनावों में बीजेपी के प्रचार का सबसे बड़ा चेहरा अमित शाह का होना इसी तरफ़ इशारा करता है.”
हालांकि वे यह भी कहते हैं कि उत्तराधिकारी कौन होगा, यह सवाल पार्टी नेतृत्व और संभावित दावेदारों, दोनों के दिमाग में कहीं न कहीं मौजूद रहेगा.
नीलांजन मुखोपाध्याय के मुताबिक, ”भविष्य के नेतृत्व का फ़ैसला मुख्य रूप से तीन बातों पर निर्भर कर सकता है.
पहली – हिंदुत्व की राजनीति को आगे बढ़ाने की क्षमता, ख़ासकर तब जब राम मंदिर और अनुच्छेद 370 हटाने जैसे बड़े मुद्दे पूरे हो चुके हैं और समान नागरिक संहिता पर भी काम जारी है.”
दूसरी – संगठन को मज़बूत बनाए रखने और दक्षिण भारत तक बीजेपी का विस्तार करने की क्षमता.
और तीसरी – आरएसएस के साथ अच्छे रिश्ते और उसका समर्थन.
विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में नरेंद्र मोदी के उत्तराधिकारी को चुनते समय उम्र भी एक अहम फैक्टर होगा. हिमंत बिस्वा सरमा, योगी आदित्यनाथ और देवेंद्र फडणवीस…तीनों अभी पचास की उम्र के आसपास हैं. अगर नेतृत्व परिवर्तन 2034 के आसपास होता है, तो तब तक तीनों की उम्र लगभग वही होगी, जितनी उम्र में मोदी प्रधानमंत्री बने थे.
आरएसएस का समर्थन किस नेता को है?
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तीनों नेता ऐसे राज्यों के मुख्यमंत्री हैं जो बीजेपी के लिए बेहद अहम माने जाते हैं. देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र जैसे आर्थिक रूप से सबसे मज़बूत राज्य से आते हैं, योगी आदित्यनाथ देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश का नेतृत्व करते हैं, जबकि हिमंत बिस्वा सरमा उस राज्य से आते हैं जिसने बीजेपी को हिंदी पट्टी से बाहर पूर्वोत्तर में विस्तार करने का रास्ता दिया.
लेकिन इन तीनों नेताओं में सबसे निर्णायक बढ़त किसके पास हो सकती है?
महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र साठे का मानना है कि आरएसएस का समर्थन यहां सबसे बड़ा फैक्टर होगा और इस मामले में फडणवीस सबसे आगे दिखाई देते हैं. उनके मुताबिक, ”फडणवीस लंबे समय से संघ की ज़मीनी राजनीति से जुड़े रहे हैं और महाराष्ट्र में होने की वजह से नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय के भी काफ़ी करीब हैं.”
साठे के मुताबिक, हिमंत बिस्वा सरमा का कांग्रेस से बीजेपी में आना आज भी उनके राजनीतिक सफ़र की एक कमज़ोर कड़ी माना जाता है. वहीं योगी आदित्यनाथ को लेकर संघ के भीतर यह चिंता हो सकती है कि उनकी व्यक्तिगत छवि पार्टी से भी ज़्यादा बड़ी न हो जाए.
हालांकि उत्तर प्रदेश के पत्रकार विजय त्रिवेदी इससे सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि आरएसएस बेहद व्यवहारिक संगठन है और उसके लिए सबसे अहम बात यह होती है कि कौन हिंदू वोटों को सबसे मज़बूती से जोड़ सकता है. उनके मुताबिक, योगी आदित्यनाथ में यह क्षमता साफ़ दिखाई देती है.
आरएसएस और सीनियर लीडरशिप के साथ रिश्ते
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वहीं नवा ठाकुरिया का दावा है, ”आरएसएस के लिए हिमंत एक पूंजी की तरह हैं. संघ हिंदू एकजुटता की बात करता है जिसे लेकर हिमंत ने काम किया है. देखने से ऐसा लगता है कि फ़िलहाल हिमंत को आरएसएस का समर्थन प्राप्त है.”
सीनियर लीडरशिप के साथ सहज रिश्तों के सवाल पर दोनों ही वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि हिमंत के गृहमंत्री अमित शाह के साथ सौहार्दपूर्ण रिश्ते हैं. वहीं प्रधानमंत्री मोदी के साथ औपचारिक.
नवा ठाकुरिया एक उदाहरण देकर इस बात को समझाते हैं कि हाल ही में जब चार राज्यों के नतीजे आए, तो प्रधानमंत्री मोदी ने असम में बीजेपी की बड़ी जीत के लिए कहीं भी हिमंत को सार्वजनिक मंच से श्रेय नहीं दिया.
वरिष्ठ पत्रकार नवा ठाकुरिया हिमंत के रास्तों की चुनौतियों को गिनाते हुए कहते हैं, ”हिमंत फ़िलहाल प्रधानमंत्री पद के दावेदार के योग्य नहीं हैं. वह हिंदी में असरदार भाषण नहीं दे पाते. तो ऐसी हिन्दी के साथ अगर आप दिल्ली में काम करना चाहते हैं, तो चुनौतियां तो आएंगी ही. वो खुद स्वीकार भी करते हैं कि मैं एक छोटे से राज्य का मुख्यमंत्री हूं, दिल्ली मेरे लिए दूर है.”
“लेकिन वहां पहुंचने की महत्वाकांक्षा उनमें ज़रूर है. और उसके लिए पहले उन्हें केंद्रीय राजनीति में हिस्सा लेना होगा. हर नेता नरेंद्र मोदी की तरह मुख्यमंत्री से सीधे प्रधानमंत्री नहीं बन सकता.”
मोदी के बाद बीजेपी में सबसे लोकप्रिय नेता कौन है?
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नीलांजन मुखोपाध्याय भी मानते हैं कि मोदी के उत्तराधिकारी में वैसी ही जनअपील और करिश्मा होना ज़रूरी होगा.
इस मामले में पत्रकार विजय त्रिवेदी का मानना है कि योगी आदित्यनाथ सबसे मज़बूत स्थिति में दिखाई देते हैं. उनके मुताबिक, बीजेपी समर्थकों के बीच मोदी के बाद योगी सबसे लोकप्रिय नेता हैं. यहां तक कि आक्रामक हिंदुत्व समर्थकों के एक हिस्से में उनकी लोकप्रियता मोदी से भी ज़्यादा मानी जाती है.
हालांकि त्रिवेदी यह भी कहते हैं कि हिमंत भी हिंदुत्व की राजनीति को तेज़ी से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर खुद को उसी तरह स्थापित करने के लिए उन्हें अभी और समय चाहिए.
विशेषज्ञों का कहना है कि आख़िरकार यह सब उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा, जब मोदी और अमित शाह के बाद नेतृत्व परिवर्तन का सवाल सामने आएगा.
हालांकि अगर आने वाले वर्षों में बीजेपी कमज़ोर पड़ती है और गठबंधन की राजनीति पर निर्भर होती है, तो परिस्थितियां बदल भी सकती हैं.
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