Congress:दिग्विजय की पटवारी से दूरी और उमंग से नजदीकी से कांग्रेस में नए समीकरण? सवालों में पार्टी की एकजुटता – Are New Political Equations Forming Within The Mp Congress? Patwari, Singhar, And Digvijay Are Key Players.
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मध्य प्रदेश के दतिया में उपचुनाव हैं। जब कांग्रेस को एक होकर मैदान में उतरना चाहिए, तब भी पार्टी अलग-अलग पॉवर सेंटर में बंटी नजर आ रही है। कांग्रेस की एकजुटता की कमी एक बार फिर उज्जैन में वीर भारत न्यास को जमीन देने के आरोपों पर खुलकर सामने आई थी। प्रदेश अध्यक्ष और एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता के बीच बयानबाजी और उसके बाद कांग्रेस के भीतर ही खिलाफत की खबरों ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। कुल मिलाकर कहें तो कांग्रेस में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। हाल ही में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के बीच हुई बंद कमरे में लंबी बातचीत से नई सियासी समीकरणों को हवा मिल रही है।
लगभग दो दशक से सत्ता से बाहर चल रही मध्यप्रदेश कांग्रेस आज भी अंदरूनी खींचतान से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाई है। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के रूप में कांग्रेस ने नई पीढ़ी को नेतृत्व सौंपा है, लेकिन प्रदेश की राजनीति में दिग्विजय सिंह और कमलनाथ जैसे वरिष्ठ नेताओं का प्रभाव अभी भी कायम है। इसी बीच उमंग सिंघार का अचानक दिग्विजय सिंह के निवास पहुंचना और दोनों नेताओं के बीच करीब दो घंटे तक बंद कमरे में चर्चा होना कई सवाल छोड़ गया है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह केवल शिष्टाचार मुलाकात थी या फिर कांग्रेस के भीतर बदलते राजनीतिक समीकरणों का संकेत? ये भी बता दें कि दिग्विजय सिंह और उमंग सिंघार के रिश्ते हमेशा सहज नहीं रहे हैं। वर्ष 2018 में कांग्रेस सरकार बनने के बाद उमंग सिंघार ने दिग्विजय सिंह पर सरकार में हस्तक्षेप और पर्दे के पीछे से फैसले लेने जैसे आरोप लगाए थे। उस समय दोनों नेताओं के बीच खुलकर बयानबाजी भी हुई थी।
जीतू-दिग्विजय विवाद के बाद बढ़ी हलचल
यह मुलाकात ऐसे समय हुई है, जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और दिग्विजय सिंह के बयानों को लेकर पार्टी असहज स्थिति में नजर आई थी। जीतू पटवारी ने उज्जैन में सरकारी जमीन आवंटन को लेकर भाजपा सरकार पर 500 करोड़ रुपये की जमीन एक रुपये में देने का आरोप लगाया था। इसके बाद दिग्विजय सिंह ने सार्वजनिक रूप से कहा कि संबंधित जमीन सरकारी ट्रस्ट की है और उसे निजी संस्था को नहीं दिया गया। भाजपा ने इसे कांग्रेस के अंदर की लड़ाई बताकर बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाया। इस मामले के बढ़ने के बाद दिग्विजय सिंह ने भोपाल में यह स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस पूरी तरह एकजुट है और उनके तथा जीतू पटवारी के बीच किसी तरह का मतभेद नहीं है।
नई और पुरानी पीढ़ी के बीच तालमेल बड़ी चुनौती
कांग्रेस हाईकमान ने प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष जैसे दोनों अहम पद नई पीढ़ी के नेताओं को सौंपे हैं। जीतू पटवारी और उमंग सिंघार को राहुल गांधी की टीम का करीबी माना जाता है। वहीं दिग्विजय सिंह लंबे समय तक प्रदेश कांग्रेस की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में रहे हैं। कमलनाथ की प्रदेश में सक्रियता पहले की तुलना में काफी कम हुई है। उनका अधिकांश समय अब छिंदवाड़ा तक सीमित रहता है। इसके विपरीत दिग्विजय सिंह लगातार प्रदेशभर में सक्रिय हैं और राजनीतिक मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखते हैं। ऐसे में नई और पुरानी पीढ़ी के बीच बेहतर तालमेल बनाए रखना कांग्रेस नेतृत्व के सामने बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
एमपी कांग्रेस : बीते दिनों हुई दिग्विजय सिंह और उमंग सिंघार के बीच चर्चा ने लोगों को चौंकाया है।
– फोटो : अमर उजाला
कांग्रेस में सब ठीक नहीं वाली बात फिर क्यों उठी?
यूं तो कांग्रेस में गुटबाजी हमेशा हावी रही है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद कमलनाथ समेत कई नेता सीमित दायरे में रहकर काम कर रहे हैं। समय-समय पर बयानबाजी आपसी खटास की परतें खोलती दिखती हैं। ऐसा ही ताजा मामला उज्जैन स्थित वीर भारत न्यास को जमीन आवंटन के आरोपों पर सामने आया। हाल ही में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने आरोप लगाया था कि राज्य सरकार ने करीब 500 करोड़ रुपये मूल्य की सरकारी जमीन मात्र एक रुपये में वीर भारत न्यास के सचिव और मुख्यमंत्री के संस्कृति सलाहकर श्रीराम तिवारी से जुड़े एक ट्रस्ट को आवंटित कर दी। उन्होंने इस मामले में सरकार पर पक्षपात और नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया था। पटवारी के आरोपों के बाद यह मामला राजनीतिक रूप से गरमा गया था। हालांकि बाद में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भी इस मामले पर अलग राय रखते हुए कहा था कि संबंधित जमीन एक सरकारी ट्रस्ट से जुड़ी व्यवस्था के तहत है, जिसके बाद कांग्रेस के भीतर भी इस मुद्दे पर अलग-अलग बयान सामने आए थे।
राजनीतिक जानकार बोले-गुटबाजी पार्टी की बड़ी कमजोरी
वरिष्ठ पत्रकार गणेश साकल्ले का कहना है कि यदि मध्यप्रदेश कांग्रेस पूरी तरह एकजुट होकर चुनावी मैदान में उतरे, तो वह भाजपा को कड़ी टक्कर दे सकती है। लेकिन फिलहाल पार्टी के भीतर अलग-अलग शक्ति केंद्र दिखाई देते हैं। सार्वजनिक तौर पर नेता एकजुटता का संदेश देते हैं, जबकि अंदरूनी स्तर पर मतभेद समय-समय पर सामने आते रहते हैं। उनके अनुसार यही कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती है। नेताओं की मुलाकातें सकारात्मक संदेश जरूर देती हैं, लेकिन असली एकजुटता तभी मानी जाएगी, जब यह चुनावी रणनीति और संगठनात्मक कामकाज में भी नजर आए।
आखिर क्यों उठ रहे सवाल?
वरिष्ठ पत्रकार अरविंद तिवारी कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति पर कहते हैं कि जिस तरह की मदद पटवारी को वरिष्ठ नेताओं से मिलना चाहिए, वैसी मिल नहीं रही है। एकजुटता का दिखावा कांग्रेस को अगले विधानसभा चुनाव में भारी पड़ सकता है। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि कांग्रेस में दिखावे की एकजुटता है। पटवारी कांग्रेस की बी टीम को ज्यादा महत्व दे रहे हैं। इस कारण कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कार्यक्रमों, प्रदर्शनों में मुंह दिखाई की रस्म निभाते नजर आते हैं, जबकि उनके अनुभव का लाभ पार्टी उठा सकती है। पटवारी और दिग्विजय सिंह के सरकार द्वारा उज्जैन में लीज पर ट्रस्ट को दी गई जमीन को लेकर अलग-अलग बयान नजर आए, उससे यह तो तय हो चुका है कि इस तरह के बड़े मुद्दों पर भी पटवारी वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठकर रणनीति नहीं बनाते हैं। यदि ऐसा होता तो दोनों की अलग-अलग राय सामने नहीं आती।
एमपी कांग्रेस : राजनीतिक जानकार बताते हैं कि कांग्रेस इन दिनों कई चुनौतियों का सामना कर रही है।
– फोटो : अमर उजाला
कई बड़े नेता खुद को समेटकर बैठे
पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की सक्रियता भी अब कम हो गई है। वे भोपाल के बजाय छिंदवाड़ा और दिल्ली में ज्यादा सक्रिय रहते हैं। प्रदेश के मामलों में उनके बयान भी काफी कम आते हैं। पटवारी को प्रदेशाध्यक्ष बनाए जाने के बाद से ही कमलनाथ ने खुद की भूमिका पार्टी में सीमित कर दी थी। वे कांग्रेस नेता राहुल गांधी की गुड लिस्ट में हैं, लेकिन फिर भी वे प्रदेश की राजनीति में हस्तक्षेप नहीं कर रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे अरुण यादव और कांतिलाल भूरिया की निमाड़ और आदिवासी अंचल में मैदानी पकड़ है, लेकिन उन्होंने भी पार्टी में अपनी भूमिका सीमित कर ली है। आक्रामक रणनीति बनाने में मदद करने के बजाय दोनों नेता सिर्फ कांग्रेस के आयोजनों में नजर आते हैं। पटवारी भी भूरिया को ज्यादा महत्व देने के बजाय आदिवासी अंचल से नाता रखने वाले नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के साथ तालमेल बनाकर चल रहे हैं।
अंदरखाने हो रही वरिष्ठ नेताओं की खिलाफत भी चर्चा में
हाल ही में उज्जैन के वीर भारत न्यास पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के बीच दिखी अलग बयानबाजी पर संगठन के भीतर भी खुली खिलाफत दिखने लगी। कांग्रेस की प्रदेश महासचिव निधि सत्यव्रत चतुर्वेदी ने फेसबुक पोस्ट के जरिए दिग्विजय सिंह पर तीखा हमला बोलते हुए पार्टी नेतृत्व से उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग कर डाली। पूर्व सांसद सत्यव्रत चतुर्वेदी की बेटी निधि ने अपनी पोस्ट में कहा कि किसी भी वरिष्ठ नेता को प्रदेश अध्यक्ष के खिलाफ सार्वजनिक मंच से बयान देकर पार्टी की छवि को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए। उनका कहना है कि यदि किसी मुद्दे पर असहमति थी तो उसे संगठन के भीतर उठाया जाना चाहिए था, न कि मीडिया के सामने। निधि चतुर्वेदी ने आरोप लगाया कि दिग्विजय सिंह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और पुत्र-मोह के कारण संगठन को कमजोर कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि अपने बेटे जयवर्धन सिंह को आगे बढ़ाने की राजनीति में पार्टी अनुशासन की अनदेखी की जा रही है।
निधि ने अपनी पोस्ट में 2020 में कांग्रेस सरकार गिरने, 2023 विधानसभा चुनाव, 2024 लोकसभा चुनाव और हालिया राज्यसभा चुनाव का उल्लेख करते हुए कहा कि लगातार अंदरूनी खींचतान से पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा है। हालांकि कांग्रेस संगठन ने इस पर एक्शन लिया है और निधि को नोटिस थमा दिया गया। दूसरी तरफ, महिला उत्पीड़न प्रकोष्ठ की प्रदेश अध्यक्ष प्रियंका किरार को भी कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। आरोप है कि उन्होंने अपने जिला कांग्रेस अध्यक्ष के खिलाफ सोशल मीडिया पर पोस्ट की, जो पार्टी अनुशासन के खिलाफ माना गया। उनसे भी सात दिन के भीतर जवाब देने को कहा गया है। प्रदेश कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि यदि दोनों नेताओं का जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया तो संगठनात्मक अनुशासन के तहत आगे की कार्रवाई की जाएगी।
विधायक-पूर्व विधायक भी उतरे विरोध में
विधायक आरिफ मसूद ने कहा कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भूमि आवंटन का गंभीर मुद्दा उठाया, लेकिन दिग्विजय सिंह के बयान के बाद कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति बन गई है। उन्होंने कहा कि जब कांग्रेस जनता के बीच जाएगी तो लोग पूछेंगे कि आखिर सही कौन है, जीतू पटवारी या दिग्विजय सिंह। पहले पार्टी के भीतर एक राय बननी चाहिए, तभी आंदोलन प्रभावी होगा। पूर्व विधायक प्रवीण पाठक ने भी नाराजगी जताते हुए कहा कि मैदान में पार्टी कार्यकर्ता संघर्ष कर रहा है, लेकिन यदि वरिष्ठ नेता ही प्रदेश अध्यक्ष के रुख को कमजोर करेंगे तो जनता के सामने जवाब देना मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने कहा कि ऐसे बयान पार्टी की पूरी मुहिम को नुकसान पहुंचा सकते हैं और कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटेगा।
एमपी कांग्रेस : बीते दिनों पटवारी और दिग्विजय सिंह के अलग-अलग बयान भी पार्टी में चर्चा बना था।
– फोटो : अमर उजाला
दिग्विजय ने की डैमेज कंट्रोल की कोशिश
पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के हालिया बयान को लेकर कई नेताओं ने कड़ी आपत्ति जताई। नेताओं का कहना था कि यदि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बयान अलग-अलग होंगे तो कार्यकर्ताओं के लिए जनता के बीच इस मुद्दे को उठाना मुश्किल हो जाएगा। प्रेसवार्ता में दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस को पूरी तरह एकजुट बताते हुए कहा कि उनके तथा जीतू पटवारी के बीच मतभेद की बातें पूरी तरह भ्रामक हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने किसी कांग्रेस नेता के लिए ‘दलाल’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया था, बल्कि यह एक पत्रकार के नाम के संदर्भ में कहा गया था। जीतू पटवारी जी मध्यप्रदेश में हमारे नेता हैं, मेरे पुत्र के समान हैं। पार्टी मुख्यमंत्री मोहन यादव से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के मामलों को अंत तक उजागर करेगी। विवाद के बीच प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी ने कहा कि दिग्विजय सिंह के बयान की जानकारी पहले ही कांग्रेस आलाकमान को भेजी जा चुकी है। अब इस मामले में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के निर्णय के अनुसार आगे की रणनीति तय की जाएगी।
पहले भी सामने आ चुकी खींचतान
मध्य प्रदेश कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान पहले भी चर्चा में आ चुकी है। इसकी एक बानगी कांग्रेस की ओर राज्यसभा प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन के नामांकन रद्द होने के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखी थी। इसमें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी मंच पर सीटिंग अरेंजमेंट करने के दौरान भी दिग्विजय सिंह अपनी सीट छोड़कर दूसरी कुर्सी पर जाकर बैठ जाते हैं। इस दौरान पटवारी उन्हें रोकते हुए कहते हैं, आप इधर ही रुक जाओ सर। हालांकि दिग्विजय सिंह उनकी बात नहीं मानते और दूसरी कुर्सी पर जाकर बैठ जाते हैं। दिग्विजय सिंह के सीट बदलने के बाद कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी मंच पर आते हैं और उसी कुर्सी पर बैठ जाते हैं, जहां पहले दिग्विजय सिंह बैठे थे।
कांग्रेस की खींचतान का नुकसान भी हुआ है?
प्रदेश कांग्रेस की खींचतान के कारण कांग्रेस को नुकसान हुआ है। इसके कारण जीतू पटवारी कमजोर साबित होते रहे हैं। जीतू पटवारी के प्रदेशाध्यक्ष बनने के बाद ही लोकसभा चुनाव उनकी परीक्षा थी, लेकिन कांग्रेस प्रदेश में एक भी सीट नहीं जीत पाई। पटवारी के गृह नगर इंदौर लोकसभा क्षेत्र से उन्होंने जिस अक्षय बम को उम्मीदवार बनाया था, उन्होंने नाम वापसी के अंतिम दिन नामांकन वापस लेकर भाजपा का दामन थाम लिया। इंदौर लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस का कोई उम्मीदवार नहीं रहा। मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त होने की रणनीति भी पटवारी भांप नहीं पाए। अब अगला विधानसभा चुनाव पटवारी की असली परीक्षा होगी। प्रदेश में टिकट के ज्यादातर दावेदार नाथ और सिंह गुट से जुड़े हैं। दोनों गुटों को साधकर उम्मीदवार तय करना पटवारी के लिए आसान नहीं होगा।
कांग्रेस में दिग्गजों से छात्र संगठनों तक बढ़ी कलह
ऐसा नहीं कि दिग्विजय सिंह और पटवारी या कमलनाथ ही बंटे नजर आ रहे हैं, छात्र संगठन भी एकजुट नहीं दिख रहा। इसके भी कई उदाहरण देखने को मिले हैं। कुछ दिनों पहले हुई संगठनात्मक मजबूती के दावों के बीच भोपाल में आयोजित यूथ कांग्रेस की प्रदेश कार्यकारिणी बैठक विवादों में घिर गई। संगठनात्मक समीक्षा के दौरान मऊगंज विधानसभा अध्यक्ष आशुतोष ने कार्यों के मूल्यांकन वाले ऐप को फर्जी बताया। इसके बाद प्रदेश सचिव सलमान गौरी और आशुतोष के बीच तीखी बहस शुरू हो गई, जो देखते ही देखते धक्का-मुक्की तक पहुंच गई। स्थिति बिगड़ने पर प्रदेश अध्यक्ष यश घनघोरिया ने हस्तक्षेप कर दोनों पक्षों को शांत कराया। बाद में वरिष्ठ नेताओं ने दोनों पदाधिकारियों को बैठक कक्ष से बाहर भेजा, जिसके बाद समीक्षा बैठक दोबारा शुरू हुई।
कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई में भी अनुशासनहीनता की तस्वीर सामने आ चुके हैं। मीनाक्षी नटराजन के राज्यसभा चुनाव नामांकन निरस्त होने के विरोध में मुख्य चुनाव आयुक्त का पुतला दहन करने का निर्देश सभी जिला अध्यक्षों को दिया गया था, लेकिन कई जिलों में कार्यक्रम ही आयोजित नहीं किया गया। इस पर संगठन ने संबंधित जिला अध्यक्षों को कारण बताओ नोटिस जारी किए, लेकिन कई पदाधिकारियों ने जवाब तक नहीं दिया। इसके बाद भोपाल में बुलाई गई प्रदेश स्तरीय बैठक में भी आधे से ज्यादा जिला अध्यक्ष और कई पदाधिकारी अनुपस्थित रहे, जबकि प्रदेश अध्यक्ष आशुतोष चौकसे ने बैठक में सभी की उपस्थिति अनिवार्य बताई थी। हालांकि प्रदेश प्रभारी रविंद्र दांगी ने संगठन में किसी भी तरह के मतभेद से इनकार करते हुए कहा कि कुछ पदाधिकारी व्यक्तिगत कारणों से बैठक में नहीं पहुंच सके।
क्या दतिया उपचुनाव भी बना वजह?
यह भी चर्चा है कि दतिया विधानसभा उपचुनाव और आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस किसी भी तरह का गलत राजनीतिक संदेश नहीं देना चाहती। पार्टी जानती है कि यदि उसके वरिष्ठ नेताओं के अलग-अलग बयान सामने आते रहे तो भाजपा इसे चुनावी मुद्दा बना सकती है। यही वजह है कि वरिष्ठ और नए नेतृत्व के बीच लगातार संवाद बढ़ाने की कोशिशें भी दिखाई दे रही हैं। वहीं, इस मामले में बोलने वालों को पार्टी की तरफ से कारण बताओ नोटिश थमा का चुप कराया जा रहा हैं। हालांकि पार्टी के बीच से आरोप लग रहे हैं कि चिन्हित लोगों को ही नोटिस दिए जा रहे हैं, जबकि सज्जन वर्मा और विधायक आरिफ मसूद के दिग्विजय सिंह के खिलाफ बोलने पर उनको नोटिस नहीं दिया गया। अब इसको लेकर भी पार्टी के अंदर आवाज उठ रही हैं।
चुनाव से पहले बड़ी चुनौती
लगातार सामने आ रहे इन घटनाक्रमों ने कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे और अनुशासन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर पार्टी प्रदेश सरकार को घेरने की रणनीति बना रही है, वहीं दूसरी ओर नेताओं और छात्र संगठनों के भीतर बढ़ती खींचतान संगठन की एकजुटता पर असर डालती दिख रही है। ऐसे में 2028 के विधानसभा और 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने संगठन को एकजुट और अनुशासित बनाए रखने की होगी।