सरकार ने गुरुवार को साफ कहा है कि पासपोर्ट कभी भी नागरिकता का प्रमाण नहीं रहा है। साथ ही ये भी साफ कर दिया कि इस फैसले में बीते 12 वर्षों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। इसके लिए सरकार ने पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 20 और बॉम्बे हाईकोर्ट के 2013 के फैसले का भी हवाला दिया है।
सरकार ने अपने स्पष्टीकरण में क्या कहा?
पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 20 के अनुसार, ‘अगर सरकार को लगता है कि ऐसा करना जनहित में जरूरी है, तो केंद्र सरकार किसी भी ऐसे व्यक्ति को पासपोर्ट जारी कर सकती हैं, या जारी करवा सकती हैं, जो भारत का नागरिक नहीं हैं।’ सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट के एक फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें साफ किया गया था कि पासपोर्ट होने से ही कोई भारतीय नागरिक नहीं माना जा सकता।
सरकार को क्यों देनी पड़ी सफाई?
दरअसल राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने बुधवार को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया था, जिसमें उन्होंने विदेश मंत्रालय के एक बयान का जिक्र किया था। कपिल सिब्बल ने लिखा, ‘विदेश मंत्रालय के 24 जून 2026 के बयान के अनुसार, पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है और यह नागरिकता का प्रमाण नहीं है। तो फिर नागरिकता का प्रमाण कौन सा दस्तावेज है? ऐसे तो बीएलओ मेरी भी नागरिकता पर शक कर सकता है और मुझे वोट देने से वंचित कर सकता है। इसका नतीजा ये होगा कि भाजपा चुनाव जीत जाएगी। अब सुप्रीम कोर्ट ही इस पर कुछ कहे।’

अमित मालवीय ने सिब्बल के बयान पर साधा निशाना
अमित मालवीय ने पोस्ट में लिखा, ‘विदेश मंत्रालय के इस बयान पर कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, नाराजगी जाहिर करने वाले कागज नहीं दिखाएंगे समूह के लिए यहां स्पष्टीकरण दिया गया है। विदेश मंत्रालय ने अब कोई नई नीति नहीं बनाई है बल्कि एक स्थापित कानूनी स्थिति को सिर्फ दोहराया है। बॉम्बे उच्च न्यायालय ने 2013 में इसे साफ किया था कि नागरिकता का निर्धारण नागरिकता अधिनियम, 1955 के आधार पर किया जाता है। भारत में नागरिकता जन्म प्रमाण पत्र, माता-पिता के नागरिकता रिकॉर्ड, स्कूल रिकॉर्ड, मतदाता सूची में नाम, सरकारी सेवा रिकॉर्ड, भूमि और निवास रिकॉर्ड, पासपोर्ट और अन्य दस्तावेजों के माध्यम से स्थापित की जाती है। यह कानूनी तौर पर स्पष्ट है।’