सरकारी सूत्रों ने सोमवार को कहा कि सिंधु जल संधि (आईडब्ल्यूटी) अपने मौजूदा स्वरूप में दोबारा लागू नहीं होगी। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने अब तक भारत के खिलाफ सीमा पार आतंकवाद समाप्त करने का कोई संकेत नहीं दिया है, जबकि संधि के तहत सहयोग बहाल करने के लिए यह पहली शर्त है।
सूत्रों के अनुसार, अगर भविष्य में इससे जुड़े प्रावधानों को फिर से लागू किया जाता है, तो इसके लिए संधि पर नए स्वरूप में बातचीत करनी होगी। यह तभी संभव होगा, जब पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकवाद को स्थायी रूप से समर्थन देना बंद करे।
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क्या भारत तोड़ देगा सिंधु जल संधि?
सूत्रों ने कहा कि पाकिस्तान यह गलत धारणा बनाने की कोशिश कर रहा है कि भारत द्वारा संधि को स्थगित किए जाने से वहां पानी की कमी हो रही है। जबकि वास्तविकता यह है कि पाकिस्तान को मिलने वाले पानी का बड़ा हिस्सा पर्याप्त भंडारण व्यवस्था के अभाव, भारी रिसाव और प्रांतों के बीच जल बंटवारे के विवादों के कारण नष्ट हो जाता है।
उन्होंने कहा कि भारत फिलहाल सिंधु जल संधि से अलग होने की दिशा में सक्रिय रूप से विचार नहीं कर रहा है, लेकिन एक संप्रभु देश होने के नाते उसके पास अपने हितों के खिलाफ जाने वाली किसी भी संधि को समाप्त करने का अधिकार सुरक्षित है। एक सूत्र ने कहा, “यह (संधि से बाहर निकलना) इस बात पर निर्भर करेगा कि आगे पाकिस्तान क्या कदम उठाता है।”
जल संधि को नए अवतार में पेश करेगा भारत
पिछले वर्ष अप्रैल में पहलगाम आतंकी हमले में 26 नागरिकों की मौत के बाद भारत ने कई कूटनीतिक और आर्थिक कदम उठाए थे। इन्हीं के तहत सिंधु जल संधि को भी स्थगित करने का फैसला लिया गया था। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि इस हमले को पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा के सहयोगी संगठन ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ (टीआरएफ) ने अंजाम दिया था। इसके जवाब में भारत ने मई में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाकर पाकिस्तान में आतंकी ढांचे को निशाना बनाया था।
एक अन्य सूत्र ने कहा, “यह कहना सही होगा कि सिंधु जल संधि अपने मौजूदा स्वरूप में दोबारा लागू नहीं होगी। अगर इससे जुड़े प्रावधानों को फिर से लागू करना है, तो वह मौजूदा स्वरूप में नहीं बल्कि नए ढांचे में होगा और तभी होगा, जब पाकिस्तान आतंकवाद का त्याग करेगा।”
पाकिस्तान की भड़काऊ बयानबाजी बनीं विलेन
सूत्रों ने बताया कि पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व ने भारत के खिलाफ बयानबाजी तेज कर दी है। इनमें परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से लेकर सिंधु जल संधि स्थगित होने के बाद सीमा पार बहने वाले पानी को रोके जाने की स्थिति में युद्ध जैसी चेतावनियां भी शामिल हैं।
क्या है सिंधु जल समझौता?
विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई सिंधु जल संधि के तहत भारत को रावी, ब्यास और सतलुज नदियों पर अधिकार प्राप्त हैं, जबकि पाकिस्तान के हिस्से में सिंधु, झेलम और चिनाब नदियां आती हैं। संधि के तहत दोनों देशों को एक-दूसरे की नदियों के सीमित उपयोग का अधिकार है। साथ ही भारत को पश्चिमी नदियों पर, पाकिस्तान में प्रवेश करने से पहले, किशनगंगा और रतले जैसी रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाएं बनाने की अनुमति भी है।
भारत और पाकिस्तान ने 19 सितंबर 1960 को नौ वर्षों की बातचीत के बाद सीमा पार बहने वाली नदियों के प्रबंधन के उद्देश्य से इस संधि पर हस्ताक्षर किए थे। संधि को स्थगित करने से पहले भारत ने विभिन्न विवादों पर पाकिस्तान के अड़ियल रवैये का हवाला देते हुए इसमें संशोधन की मांग भी उठाई थी। भारत लगातार यह भी कहता रहा है कि विवादों के समाधान के लिए संधि में तय क्रमबद्ध प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए और एक ही मुद्दे पर दो अलग-अलग प्रक्रियाएं साथ-साथ नहीं चल सकतीं।
पाकिस्तान ने संधि पर क्यों जताई आपत्ति?
सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तान ने 2015 में किशनगंगा और रतले परियोजनाओं पर अपनी आपत्तियों के समाधान के लिए पहले एक तटस्थ विशेषज्ञ की नियुक्ति की मांग की थी, लेकिन 2016 में उसने अपना रुख बदलते हुए मध्यस्थता न्यायालय (कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन) की मांग कर दी। वर्ष 2016 में विश्व बैंक ने एक साथ तटस्थ विशेषज्ञ और मध्यस्थता न्यायालय, दोनों की नियुक्ति कर दी थी, जिसे भारत ने स्वीकार नहीं किया।
भारत तटस्थ विशेषज्ञ की बैठकों में शामिल हुआ, लेकिन मध्यस्थता न्यायालय की कार्यवाही से दूर रहा। सूत्रों ने कहा कि भारत सिंधु जल संधि को दोबारा लागू करेगा या नहीं, यह पूरी तरह पाकिस्तान के व्यवहार पर निर्भर करेगा, खासकर इस बात पर कि वह सीमा पार आतंकवाद रोकने के लिए क्या कदम उठाता है। एक सूत्र ने कहा, “हमें ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला है कि पाकिस्तान उस दिशा में (सीमा पार आतंकवाद समाप्त करने के लिए) कोई प्रयास कर रहा है।”
आतंकवाद से पाकिस्तान नहीं बना रहा दूरी
उन्होंने कहा, “इसके उलट हमें लगातार ऐसी जानकारी मिल रही है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1267 प्रतिबंध समिति द्वारा प्रतिबंधित व्यक्ति और संगठन पाकिस्तान में सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल हो रहे हैं और उन्हें अपने संदेश फैलाने के लिए मंच भी मिल रहे हैं।” सूत्रों ने कहा, “नियंत्रण रेखा के उस पार उनकी गतिविधियों को लेकर हमारी एजेंसियों के पास जो जानकारी है, उससे भी यही संकेत मिलता है कि आतंकवादी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।”
सूत्रों ने यह भी कहा कि सिंधु जल संधि के तहत पाकिस्तान का रवैया सहयोग के बजाय लगातार बाधाएं खड़ी करने वाला रहा है। उन्होंने कहा कि संधि लागू होने के शुरुआती वर्षों से ही पाकिस्तान ने पश्चिमी नदियों पर भारत की लगभग हर परियोजना पर आपत्ति जताई है, चाहे वह परियोजना कितनी भी छोटी हो या उसकी तकनीकी संरचना कैसी भी हो।
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भारत के विकास कार्यों के खिलाफ पाकिस्तानी साजिश
सूत्रों के अनुसार, दूरदराज के आदिवासी इलाके को बिजली उपलब्ध कराने के लिए बनाई गई 200 किलोवाट की छोटी जलविद्युत परियोजना पर भी पाकिस्तान ने लंबे समय तक आपत्ति जताई। इसके अलावा सलाल, तुलबुल, बगलिहार, किशनगंगा, रतले और पाकल दुल जैसी प्रमुख परियोजनाओं का भी उसने विरोध किया।
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने संधि के प्रावधानों का उपयोग सहयोग सुनिश्चित करने के बजाय भारत की वैध विकास परियोजनाओं में देरी कराने और उन्हें बाधित करने के लिए किया। सूत्रों के अनुसार, संधि में विवाद समाधान के लिए बनाई गई व्यवस्था, जिसका उद्देश्य वास्तविक मतभेदों का समाधान करना था, उसे धीरे-धीरे भारत की परियोजनाओं को लटकाने का माध्यम बना दिया गया।
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने तकनीकी मुद्दों को बार-बार तीसरे पक्ष के मंचों तक पहुंचाया, द्विपक्षीय वार्ता को लंबे समय तक बिना नतीजे के खींचा और हाल के वर्षों में संधि की निर्धारित विवाद समाधान प्रक्रिया के विपरीत तटस्थ विशेषज्ञ और मध्यस्थता न्यायालय, दोनों के समक्ष समानांतर कार्यवाही की मांग की।