झारखंड उच्च न्यायालय में चारा घोटाले से जुड़े देवघर कोषागार से अवैध निकासी के मामले में पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद और अन्य अभियुक्तों की अपीलों पर सुनवाई के दौरान अपीलकर्ताओं की ओर से देवघर जिले में तैनात रहे पूर्व उपायुक्तों के बयानों और गवाहियों के मुख्य अंश प्रस्तुत किए गए। इन गवाहों ने वर्ष 1990 से 1995 के बीच कोषागार से हुई अनियमितताओं और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का ब्योरा प्रस्तुत किया।
पूर्व उपायुक्त सुखदेव सिंह की गवाही
अदालत के समक्ष रखी गई गवाही के अनुसार वर्ष 1993-94 में देवघर के उपायुक्त रहे सुखदेव सिंह को जुलाई 1993 में एक शिकायत मिली थी। बिहार भ्रष्टाचार निरोध अभियान संघ के महासचिव की इस शिकायत में पशुपालन विभाग के अधिकारियों पर कोषागार से अवैध रूप से बिल पास कराने के आरोप लगे थे। शिकायत मिलने के बाद उपायुक्त ने कोषागार पदाधिकारी से विचार-विमर्श किया और जिला पशुपालन अधिकारी से आवंटन पत्र मांगे। बार-बार स्मारक पत्र भेजने के बावजूद दस्तावेज न मिलने पर 16 मई 1994 को दुमका के आयुक्त को पत्र लिखकर पूरे मामले की जानकारी दी गई और आवश्यकता पड़ने पर दंडाधिकारी नियुक्त करने का अनुरोध किया गया। इसके कुछ ही समय बाद उपायुक्त का तबादला हो गया। जिरह के दौरान गवाह ने माना कि शिकायत मिलने से पहले उन्होंने अतिरिक्त निकासी की कोई जांच नहीं की थी तथा देवघर में उपायुक्त के रूप में उनकी यह पहली तैनाती थी।
बचाव पक्ष के अधिवक्ता की दलीलें
अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत में तर्क दिया कि सुखदेव सिंह की गवाही में जिन पत्रों का उल्लेख है, वे कभी भी अदालत में प्रदर्शित नहीं किए गए। गवाह ने हालांकि दावा किया था कि इन पत्रों का विवरण प्रदर्श-28 में दर्ज है। गवाह ने यह भी कहा कि उन्हें जानकारी नहीं है कि उनके द्वारा भेजी गई दंडाधिकारी की जांच रिपोर्ट पर बाद में क्या कार्रवाई हुई। अदालत ने अन्य अभियुक्तों की ओर से की गई जिरह के विवरण भी रिकॉर्ड पर लिए, जबकि कुछ अभियुक्तों की ओर से जिरह नहीं की गई थी।
जांच समिति और वित्तीय प्रक्रियाएं
मामले के दूसरे गवाह आरके खंडेलवाल 5 नवंबर 1995 से 11 जून 1996 तक देवघर के उपायुक्त रहे। उन्होंने अदालत को बताया कि फरवरी 1996 में वित्त विभाग के फैक्स के बाद गठित जांच समिति ने वर्ष 1980-81 से 1995-96 तक की निकासियों की जांच की थी। जिरह में उन्होंने माना कि उपायुक्त कोषागार का प्रमुख होता है, पर रोजाना का कार्य कोषागार पदाधिकारी देखता है। उन्होंने कहा कि जांच रिपोर्ट में केवल चार वर्षों के आवंटन का ब्योरा था और बिलों की जांच का अंतिम सक्षम प्राधिकारी महालेखाकार होता है।