अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध के बावजूद ट्रम्प प्रशासन ईरानी नागरिकों को उनके देश वापस भेजने की तैयारी कर रहा था। इसके लिए अमेरिकी अधिकारी ईरान की सरकार के संपर्क में भी थे। अदालत में पेश दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि दोनों देशों के बीच ईरानी नागरिकों की वापसी और इसके तरीकों को लेकर बातचीत चल रही थी। खास बात यह है कि यह सब दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव के दौरान हुआ।
तीसरे देश के रास्ते भेजने की थी तैयारी
गुरुवार को सार्वजनिक हुए अदालती दस्तावेजों के मुताबिक, अमेरिकी प्रशासन ने अक्टूबर के मध्य में ईरानियों को किसी तीसरे देश के रास्ते वापस भेजने की योजना बताई थी। हालांकि, यह साफ नहीं था कि इस पर कब अमल किया जाएगा। मामले की सुनवाई कर रहीं जज एना रेयेस ने सरकार को निर्देश दिया कि किसी भी ईरानी नागरिक को वापस भेजने से पहले अदालत को 24 घंटे के भीतर जानकारी देनी होगी। साथ ही, ऐसी कार्रवाई से पांच दिन पहले लिखित नोटिस देना भी जरूरी होगा।
जज ने सरकार के फैसले पर उठाए सवाल
15 अक्टूबर की सुनवाई में जज एना रेयेस ने अमेरिकी सरकार से पूछा कि जब ईरान में लोगों की जान को खतरा हो सकता है, तो उन्हें वहां वापस क्यों भेजा जा रहा है? उन्होंने कहा कि खुद राष्ट्रपति ट्रम्प ईरान को अमेरिका का दुश्मन बता चुके हैं और वहां हजारों प्रदर्शनकारियों की हत्या का जिक्र कर चुके हैं। इस पर न्याय विभाग के वकील दिमितार जॉर्जिएव-रेमेल ने कहा कि सरकार निर्वासन से जुड़े कानूनी आदेशों का पालन कर रही है।
ईरानी अधिकारियों के संपर्क में थे अमेरिकी अधिकारी
अदालत के दस्तावेजों के मुताबिक, युद्ध के दौरान भी अमेरिकी अधिकारी ईरानी अधिकारियों से संपर्क में थे। दोनों पक्षों के बीच यात्रा दस्तावेज जुटाने और लोगों को वापस भेजने के संभावित तरीकों पर बातचीत हुई थी। यह मामला एक मुकदमे से जुड़ा है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि अमेरिकी आव्रजन एजेंसियां ईरान से शरण मांगने वाले लोगों की गोपनीय जानकारी वहां की सरकार के साथ साझा कर रही थीं। याचिका में कहा गया है कि इससे इन लोगों की जान खतरे में पड़ सकती है। हालांकि, अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) ने शरण आवेदनों की जानकारी ईरान के साथ साझा करने के आरोपों से इनकार किया है।
तीन उड़ानों से 100 से ज्यादा ईरानी वापस भेजे
अमेरिकी आव्रजन अधिकारियों के सैकड़ों ईमेल से पता चला है कि सितंबर और दिसंबर 2025 तथा जनवरी 2026 में तीन विशेष उड़ानों के जरिए 100 से ज्यादा ईरानियों को वापस भेजा गया। आरोप है कि दोनों देशों के अधिकारियों ने मिलकर ICE की हिरासत में मौजूद ईरानी नागरिकों की पहचान की और उन पर लौटने का दबाव बनाया।
दूसरे देशों में भी भेजे जा रहे प्रवासी
ईरानियों को वापस भेजना पहले बेहद मुश्किल था, क्योंकि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध नहीं हैं। लेकिन ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका ने निर्वासन की कार्रवाई तेज कर दी है। अब ऐसे लोगों को भी तीसरे देशों में भेजा जा रहा है, जिनका उन देशों से कोई संबंध नहीं है। अल सल्वाडोर, कोस्टा रिका और पनामा ऐसे लोगों को स्वीकार कर चुके हैं। जून में अमेरिका ने करीब दो दर्जन प्रवासियों को सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक भेजा था। इनमें एक ईरानी महिला भी शामिल थी।
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ईरान लौटने पर जान का खतरा
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने ईरानी नागरिकों को वापस भेजने पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि ईरान में धार्मिक शासन है और सरकार विरोध करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करती है। ऐसे में वापस लौटने वाले लोगों को उत्पीड़न, गिरफ्तारी और जान का खतरा हो सकता है। इस मामले ने ट्रम्प प्रशासन की निर्वासन नीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।