डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर हो रहे जज जस्टिस संजय करोल शनिवार को अपने विदाई समारोह के दौरान पूरी तरह भावुक नजर आए। अपने चार दशक लंबे कानूनी सफर को याद करते हुए उन्होंने कहा कि जज कोई भगवान नहीं होते, उनसे भी गलतियां हो सकती हैं, उनसे हर फैसला सही नहीं हो सकता। लेकिन, न्याय करने के लिए विनम्रता और मानवीय संवेदना का होना सबसे ज्यादा जरूरी है।
उन्होंने कहा कि संविधान हमसे सिर्फ कानून को सही ढंग से लागू करने के लिए नहीं कहता, बल्कि वह इसे न्यायपूर्ण ढंग से लागू करने के लिए कहता है। शायद इसीलिए, फैसला करने की जिम्मेदारी मुझे हमेशा महज यह तय करने से कहीं बड़ी लगी है कि कानूनी तौर पर कौन सही है।
अपने विदाई समारोह में इन बातों पर बोले जस्टिस करोल
अपने विदाई भाषण में जस्टिस करोल ने इस बात पर जोर दिया कि केवल कानूनी दस्तावेजों और बहसों तक सीमित न रहकर जजों को याचिकाकर्ता के दर्द को भी समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि “हम जज हैं, भगवान नहीं। हमसे भी हर फैसला सही नहीं हो सकता।
उन्होंने आगे कहा कि एक कोर्ट की फाइल या याचिका केवल मामले के तथ्य बता सकती है, लेकिन वह यह कभी नहीं बयां कर सकती कि उस इंसान ने क्या खोया है या वह कोर्ट से क्या उम्मीद लेकर आया है। न्याय केवल शब्दों या दलीलों का खेल नहीं है, बल्कि यह न्याय की उस पुकार को सुनने का नाम है जो अक्सर शब्दों के बीच की खामोशी में छिपी होती है।
कुछ हद तक विनम्रता जरूरी- जस्टिम करोल
जस्टिस करोल ने आगे कहा कि संभवत: इसीलिए मैंने हमेशा कहा है कि फैसला सुनाने के लिए कुछ हद तक विनम्रता की जरूरत होती है।’ चार दशक का लंबा और गौरवशाली सफर जस्टिस करोल ने अपने 40 साल के लंबे करियर को याद करते हुए बताया कि उन्होंने शुरुआत एक अधिवक्ता के रूप में की और पिछले 19 वर्षों तक एक जज की जिम्मेदारी निभाई।
इस दौरान उन्होंने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, त्रिपुरा और पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्य करने के बाद छह फरवरी 2023 को सुप्रीम कोर्ट में पदभार संभाला था।
समारोह के दौरान प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, सालिसिटर जनरल तुषार मेहता और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रदीप राय ने उनके उल्लेखनीय योगदान की सराहना की। अंत में भावुक होते हुए जस्टिस करोल ने कहा कि अब वे सबसे बड़े और प्रतिष्ठित संवैधानिक पद यानी ‘एक साधारण नागरिक’ के रूप में लौट रहे हैं।
सीजेआई सूर्यकांत ने जस्टिस करोल की सहानुभूति एवं नेतृत्व को सराहा
प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने जस्टिस संजय करोल की सहानुभूति एवं उनके नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा कि वह एक ऐसे जज रहे हैं जिनका करियर “कानून के प्रति गंभीरता, लोगों के प्रति संवेदनशीलता और अपने पद के प्रति अटूट सम्मान से भरा रहा।
जस्टिस करोल की बात सुनने की खूबी ही उनके न्यायिक काम को खास बनाती है। उनके प्रशासनिक कामकाज का भी जिक्र करते हुए सीजेआइ ने बताया कि त्रिपुरा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर उन्होंने अनुशासित तरीके से केस लिस्ट करने, लंबित मामलों पर लगातार ध्यान देने और खुद सबसे मुश्किल केसों की जिम्मेदारी लेने जैसे कदमों से 10 महीनों के अंदर लंबित मामलों की संख्या 60 हजार से घटाकर 27 हजार से कम कर दी थी।