इमेज स्रोत, SARTAJ ALAM
झारखंड की राजधानी रांची में युवा मुखर आदिवासी नेता और सामाजिक कार्यकर्ता निशा कुमारी भगत की मौत का मामला सुर्ख़ियों में है.
निशा के पिता ने दावा किया है उनकी बेटी ने आत्महत्या की है. उनके पिता ने जांच के लिए एक आवेदन दिया है.
इस संबंध में रांची (रूरल) के एसपी गौरव गोस्वामी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, “देखिए ये आवेदन रिम्स में दिया गया था. रिम्स बरियातू थाना के तहत आता है. बरियातू थाना ने ये आवेदन ले लिया है. जैसे ही ये पिठौरिया थाना में भी रिसीव होगा, हम उस पर विधि सम्मत कार्रवाई करेंगे.”
बताया जा रहा है कि अपनी मौत से ठीक पहले निशा ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म फेसबुक पर लाइव आकर कुछ गंभीर आरोप लगाए थे. हालांकि अब ये पोस्ट उनके प्लेटफ़ॉर्म पर नहीं है. बीबीसी इस वीडियो की होने की पुष्टि नहीं कर पाया है.
घटना शुक्रवार शाम की है. स्थानीय पुलिस ने निशा भगत का शव उनके रांची स्थित आवास से बरामद कर पोस्टमार्टम के लिए रांची के रिम्स अस्पताल भेजा.
निशा भगत के पिता हन्दू भगत बताते हैं, “रात आठ बजे पोस्टमार्टम के बाद शव लेकर हम गुमला स्थित अपने आवास ले आए. लेकिन शनिवार दोपहर दो बजे उनका अंतिम संस्कार हमारे पैतृक गांव उरु में किया जाएगा.”
लेकिन बेटी की मौत पर हन्दू भगत ने झारखंड सरकार को ज़िम्मेदार ठहराते हुए बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, “समय रहते अगर सरकार सचेत हो जाती और कार्रवाई करती तो मेरी बेटी जिंदा होती.”
इन आरोपों पर रांची के सीनियर एसपी राकेश रंजन ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, “अभी जांच चल रही है, जांच की रिपोर्ट आने के बाद ही कुछ कह पाएंगे, जो भी दोषी हैं उनके ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई होगी.”
इमेज स्रोत, SARTAJ ALAM
निशा भगत मौत के बाद झारखंड के राजनीतिक गलियारों में आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है.
झारखंड विधानसभा में विपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, “निशा भगत आदिवासी समाज के अधिकारों की बात करती थीं, क्या यही उनका अपराध था? जिस बेटी ने दूसरों के हक़ के लिए आवाज़ उठाई, जब उसे खुद मदद की ज़रूरत पड़ी, तब हेमंत सरकार का प्रशासन कहां था?”
”आज सवाल निशा की लड़ने की क्षमता पर कौन उठा सकता है? सवाल तो उस प्रशासन से है, जिसका फ़र्ज़ था उनकी गुहार सुनना. निशा अपनी बात कह गईं. अब जवाब देने की बारी सत्ता की है.”
मामले की जानकारी मिलने के बाद छात्र नेता देवेंद्र महतो ने बीबीसी से कहा “निशा की मौत से संबंधित पूरे मामले की सीबीआई जांच होनी चाहिए ताकि कोई भी दोषी बचने न पाए.”
लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता अगुस्टीना सोरेंग मानती हैं कि निशा भगत एक राजनीतिज्ञ से कहीं अधिक मज़बूत आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता थीं.
अगुस्टीना सोरेंग कहती हैं, “निशा भगत का जाना आदिवासी समाज के लिए एक अपूरणीय क्षति है जिसकी भरपाई नहीं हो सकती है.”
अगुस्टीना सोरेंग का मानना है, “निशा भगत की आकस्मिक मृत्यु झारखंड में यह बताने के लिए काफ़ी है कि आज भी आदिवासी महिला के लिए सत्ता के ख़िलाफ़ सामाजिक राजनैतिक लड़ाई विशेषकर नेतृत्व करना कितना चुनौतीपूर्ण है.”
झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायक ने क्या कहा
इमेज स्रोत, SARTAJ ALAM
वहीं झारखंड मुक्ति मोर्चा विधायक भूषण तिर्की कहते हैं, “हेमंत सरकार निशा भगत के साथ है, उन्हें इंसाफ़ जरूर मिलेगा.”
वह कहते हैं, “जो आरोप वो लगा रही हैं, उसकी जांच से हम पीछे नहीं हटेंगे. जांच की मांग उनके परिवार के लोग भी कर रहे हैं, तो हम एकदम परिवार के साथ हैं.”
भूषण तिर्की कहते हैं, “निशा समाज की बेटी थी, जो आदिवासी के हित में अच्छा सोचती थीं. आदिवासी का हित कैसे हो, आदिवासी का विकास कैसे हो, आदिवासी के लिए कैसा कल्याण किया जाए, ये बातें वो हमेशा सोचती थीं. ऐसी संघर्षशील महिला का जाना समाज ही नहीं राज्य के लिए बड़ी क्षति है.”
भूषण तिर्की गुमला विधानसभा सीट से 84974 मत पाकर विधायक बने हैं.
इनके ख़िलाफ़ जेकेएलएम से निशा भगत भी प्रत्याशी थीं लेकिन उन्हें 1535 वोट आए थे.
होटल मैनेजमेंट से लेकर राजनीति तक का सफ़र
इमेज स्रोत, SARTAJ ALAM
निशा भगत के साथ काम कर चुके सन्नी टोप्पो बताते हैं कि निशा भगत ने उर्सलाइन कॉन्वेंट स्कूल से हाईस्कूल करने के बाद गुमला के कार्तिक उरांव कॉलेज से इंटर किया.
निशा ने दुर्गापुर से होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई की उसके बाद पत्रकारिता की पढ़ाई की और बेंगलुरु में नौकरी करने लगीं.
सन्नी टोप्पो कहते हैं, ”निशा ने बेहतर नौकरी का रास्ता छोड़कर आदिवासी समाज के मुद्दों पर काम करने का फैसला किया.”
वह कहते हैं, “साल 2018 में निशा ने अपना जीवन आदिवासी समाज की संस्कृति, पहचान और अधिकारों की लड़ाई के लिए समर्पित कर दिया.”
सन्नी मानते हैं कि निशा के इस फैसले के पीछे उनके पिता हन्दू भगत के संघर्ष की भी अहम भूमिका है.
हन्दू भगत ने अलग झारखंड राज्य आंदोलन में शिबू सोरेन के साथ सक्रिय भूमिका निभाई थी.
हन्दू भगत बेटी के संघर्षों को याद करते हुए बताते हैं, “मेरी बेटी बेहद हिम्मती थी जो किसी भी परिस्थिति का सामना करने में सक्षम थी.”
दरअसल, हन्दू भगत के आंदोलनकारी जीवन से प्रभावित होकर हो निशा भगत ने आदिवासी सामाज के मुद्दों पर अपनी सक्रियता बढ़ाई.
सरना कोड से लेकर पेसा क़ानून तक के लिए संघर्ष
इमेज स्रोत, SARTAJ ALAM
सरना धर्म कोड की मांग, पेसा कानून को अमलीजामा पहनाने और जल-जंगल-ज़मीन से जुड़े मुद्दों पर निशा भगत सक्रिय रही थीं.
उन्होंने आदिवासी समाज की अलग धार्मिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों को लेकर विभिन्न आंदोलनों में हिस्सा लिया.
पेसा कानून के लिए निशा की ओर से आंदोलन को याद करते हुए हन्दू भगत कहते हैं.
“पेसा एक्ट लागू करवाने के लिए निशा ने गुमला से राँची राजभवन तक पैदल मार्च किया था.”
वह आगे कहते हैं, ” निशा साल 2024 में चुनाव से काफी पहले सरना धर्म कोड की मांग को लेकर राजभवन के समक्ष मुंडन कराकर अपना मांग रखी थी.”
सन्नी टोप्पो कहते हैं, “निशा भगत ने आदिवासी धर्म छोड़ कर ईसाई धर्म अपनाने वालों के विरुद्ध भी संघर्ष कड़ा किया. इस पर हम लोगों को भाजपा और आरएसएस का एजेंट कहा जाने लगा. जिससे वह बहुत आहत थीं.”
(आत्महत्या एक गंभीर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्या है. अगर आप भी तनाव से गुज़र रहे हैं तो भारत सरकार की ‘जीवन आस्था’ हेल्पलाइन 18002333330 से मदद ले सकते हैं. आपको अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी बात करनी चाहिए.)
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट… सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.