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भारत के सबसे बड़े कारोबारी समूह टाटा सन्स के बोर्डरूम में जारी संघर्ष ख़त्म होता नहीं दिख रहा है. गुरुवार को यह टकराव और तेज़ हो गया, जब निदेशकों ने टाटा सन्स के कार्यकारी चेयरमैन के कार्यकाल को बढ़ाने के प्रस्ताव का समर्थन किया.
दूसरी तरफ़ ग्रुप के सबसे बड़े शेयरधारक ने इस मतदान को अवैध क़रार दिया है. विवादित बोर्ड बैठक में निदेशकों ने टाटा सन्स को शेयर बाज़ार में लिस्ट कराने की तैयारियों को मंज़ूरी दी. इस फ़ैसले का भी नोएल टाटा ने विरोध किया.
नोएल टाटा टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन हैं. टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी ‘टाटा सन्स’ में टाटा ट्रस्ट्स की लगभग 66% हिस्सेदारी है. टाटा के डेढ़ सौ साल से ज़्यादा पुराने इतिहास में एन चंद्रशेखरन के कार्यकाल बढ़ाए जाने को काफ़ी अहम माना जा रहा है.
जिस बैठक के बाद टाटा सन्स के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के कार्यकाल को पाँच साल बढ़ाने का फ़ैसला बोर्ड ने किया, उसे लेकर क़ानूनी लड़ाई शुरू हो सकती है.
चंद्रशेखरन ने नाटकीय रूप से अपनी योजना में बदलाव किया. वह नोएल टाटा के साथ जारी बोर्डरूम संघर्ष के बीच फ़रवरी में पद छोड़ने वाले थे.
नोएल टाटा ही एकमात्र निदेशक थे, जिन्होंने चंद्रशेखरन का कार्यकाल बढ़ाने के ख़िलाफ़ मतदान किया. चंद्रशेखरन ने अगस्त में इस असहमति को भी पद छोड़ने का एक कारण बताया था.
चंद्रशेखरन ने अगस्त महीने के बीच में अचानक घोषणा की थी कि वह दोबारा नियुक्ति की मांग नहीं करेंगे. यह फ़ैसला उनके कार्यकाल को बढ़ाने को लेकर कई महीनों से चल रहे बोर्ड गतिरोध के बाद आया था. लेकिन अचानक से चीज़ें बदल गईं.
टाटा का साम्राज्य
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टाटा सन्स सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग में अरबों डॉलर के निवेश की दिशा में आगे बढ़ रही है और इसके ब्रैंड्स में ताज होटल्स से लेकर चाय तक शामिल हैं.
टाटा ग्रुप के तहत आने वाली 32 कंपनियों में 26 शेयर बाजार में लिस्टेड हैं. टाटा सन्स के क़रीब 66% हिस्से पर 13 चैरिटेबल संस्थाओं के समूह टाटा ट्रस्ट्स का नियंत्रण है, जबकि ग्रुप की कंपनियों के पास टाटा सन्स के क़रीब 13% शेयर हैं.
टाटा ट्रस्ट्स की अगुआई नोएल टाटा करते हैं, जिन्होंने अक्टूबर 2024 में अपने सौतेले भाई रतन टाटा के निधन के बाद यह ज़िम्मेदारी संभाली थी. रतन टाटा समूह के मुखिया और भारत के सबसे प्रमुख कारोबारी में से एक थे.
नोएल टाटा की अध्यक्षता वाले चैरिटेबल संस्थाओं के समूह टाटा ट्रस्ट्स ने तुरंत चंद्रशेखरन का कार्यकाल बढ़ाने के मतदान को अवैध क़रार दिया.
नोएल टाटा ने बैठक के दौरान बोर्ड से कहा, “अभी चेयरमैन पद को लेकर किया गया कोई भी फ़ैसला, किसी भी ऐसे शेयरधारक की ओर से गंभीर क़ानूनी चुनौती के दायरे में आ सकता है, जो इसे चुनौती देना चाहे.”
ब्रिटिश अख़बार फ़ाइनैंशियल टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ”बैठक की जानकारी रखने वाले दो लोगों के मुताबिक़, भारतीय रिजर्व बैंक के उस निर्देश का पालन करने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ भी नोएल टाटा ही एकमात्र निदेशक थे. आरबीआई ने टाटा सन्स को शेयर बाज़ार में लिस्ट होने के लिए कहा है.”
आरबीआई ने पिछले हफ़्ते टाटा की उस अपील को ख़ारिज कर दिया था, जिसमें होल्डिंग कंपनी को लिस्ट करने के नियमों से छूट देने की मांग की गई थी.

नोएल टाटा का विरोध
एफ़टी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ”विश्लेषकों के अनुमान के मुताबिक़ शेयर बाज़ार में लिस्ट होने पर टाटा सन्स का मूल्यांकन 120 अरब डॉलर से ज़्यादा हो सकता है, जिससे यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा आईपीओ बन जाएगा. इससे टाटा समूह के स्वामित्व और संचालन व्यवस्था में बड़ा बदलाव आएगा, जो एक सदी से भी ज़्यादा समय से कुछ चुनिंदा हाथों में रही है.”
कंपनी ने एक बयान में कहा कि बोर्ड ने टाटा सन्स को लिस्ट करने के आरबीआई के आदेश का पालन करने के लिए क़दम उठाने की प्रक्रिया शुरू करने का फ़ैसला किया है.
एफ़टी की रिपोर्ट के मुताबिक़, ”ग्रुप के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि बोर्ड के फ़ैसलों को अदालत में चुनौती दिए जाने की उम्मीद है. कंपनी के संविधान के मुताबिक, किसी भी रणनीतिक प्रस्ताव के लिए चैरिटेबल ट्रस्टों के नामित निदेशकों के बहुमत की सहमति ज़रूरी है. लेकिन फ़िलहाल टाटा सन्स के बोर्ड में ट्रस्टों के सिर्फ़ दो नामित निदेशक हैं, नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन. श्रीनिवासन ने गुरुवार के प्रस्तावों के पक्ष में बाक़ी बोर्ड के साथ मतदान किया.”
टाटा ट्रस्ट्स ने कहा कि चंद्रशेखरन को दोबारा नियुक्त करने का प्रस्ताव टाटा के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के प्रावधानों को देखते हुए वैध नहीं था. बोर्ड के छह में से चार निदेशकों ने इसके पक्ष में मतदान किया, जबकि नोएल टाटा ने विरोध में वोट दिया. चंद्रशेखरन ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया.
टाटा ट्र्स्ट्स ने अपने बयान में कहा है, ”हमने टाटा सन्स को शेयर बाज़ार में लिस्ट करने पर सहमति नहीं दी है. 11 सितंबर, 2026 को भारतीय रिज़र्व बैंक से मिले पत्र पर आज बोर्ड की बैठक में चर्चा हुई. बोर्ड ने सहमति जताई कि केवल शेयर बाज़ार में लिस्ट होने के विकल्प तक सीमित रहने के बजाय अन्य विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए. टाटा सन्स के बोर्ड ने पब्लिक लिस्टिंग के मुद्दे पर पहले ही विचार किया था और दिवंगत रतन टाटा के मार्गदर्शन में मार्च 2024 में सर्वसम्मति से यह निष्कर्ष निकाला था कि कंपनी को अनलिस्टेड ही रहना चाहिए.”
”जुलाई 2025 में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट ने भी सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किए थे कि कंपनी अनलिस्टेड ही रहनी चाहिए. यह भावना का सवाल नहीं है. यह इस ग्रुप के काम करने का तरीक़ा है और यह एक सदी से भी ज़्यादा समय की कसौटी पर खरा उतरा है. लिस्टिंग इसके कैरेक्टर को नष्ट कर देगी और इस सिद्धांत की बुनियाद पर चोट करेगी.”
दिग्गज कंपनी टीवीएस के अरबपति चेयरमैन एमेरिटस, श्रीनिवासन लंबे समय से चंद्रशेखरन के कार्यकाल को बढ़ाने के समर्थक रहे हैं और उन्होंने इस साल सार्वजनिक रूप से कहा था कि वह टाटा सन्स की लिस्टिंग के पक्ष में हैं.
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नटराजन चंद्रशेखरन कौन हैं?
चंद्रशेखरन टाटा सन्स का नेतृत्व करने वाले टाटा परिवार से बाहर के पहले व्यक्ति हैं. रतन टाटा ने ख़ुद उन्हें इस ज़िम्मेदारी के लिए चुना था. उन्होंने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज में 30 साल बिताए, जिनमें आठ साल मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में रहे.
इस दिग्गज आईटी कंपनी को भारत की सबसे अहम कंपनियों में बदलने का श्रेय चंद्रशेखरन को दिया जाता है. चंद्रेशेखरन ने एक टेक्नोक्रेट के साथ भरोसेमंद लीडर के तौर पर अपनी पहचान बनाई थी.
अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि पिछले एक दशक में चंद्रशेखरन की सबसे बड़ी सफलता टाटा ग्रुप को आईफोन और इलेक्ट्रिक वाहनों के निर्माण समेत उन्नत तकनीकों के क्षेत्र में आगे ले जाना रही.
ब्लूमबर्ग ने लिखा है, ”उनके कार्यकाल के दौरान टाटा ग्रुप की 15 सबसे बड़ी लिस्टेड कंपनियों का कुल राजस्व मार्च 2026 तक के साल में दोगुने से भी ज़्यादा बढ़कर 12.3 ट्रिलियन रुपये हो गया, जो मार्च 2017 तक के साल में छह ट्रिलियन रुपये था. इन टाटा कंपनियों के इस समूह का मुनाफ़ा भी इन दोनों अवधियों के बीच 360% से ज़्यादा बढ़कर 1.66 ट्रिलियन रुपये हो गया.”
”पिछले एक साल में कारोबार की स्थिति सुधारने के लिए चंद्रा पर दबाव बढ़ रहा था. ग्रुप को एयर इंडिया के एक घातक विमान हादसे, जगुआर लैंड रोवर पर हुए ऐसे साइबर हमले का सामना करना पड़ा, जिसका असर ब्रिटेन की जीडीपी पर भी पड़ा और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज के कारोबार के लिए एआई से बढ़ते ख़तरे से भी जूझना पड़ा. उन पर अपनी सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक को पूरा करने का भी दबाव था, भारत की पहली स्वदेशी सेमीकंडक्टर चिप तैयार करना.”
चंद्रशेखरन ने 12 अगस्त को घोषणा की थी कि उनका कार्यकाल फ़रवरी में ख़त्म होने के बाद वह टाटा सन्स के चेयरमैन पद से हट जाएंगे. उनका यह फ़ैसला दोबारा नियुक्ति को लेकर कई महीनों से चले आ रहे गतिरोध के बाद आया था.
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नोएल टाटा को लेकर विवाद
निक्केई एशिया ने पिछले साल नवंबर में टाटा फैमिली में कलह पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इस रिपोर्ट में लिखा था, ”टाटा ट्र्स्ट्स के भीतर भी नोएल टाटा के ख़िलाफ़ आवाज़ें उठ रही हैं. टाटा ट्र्स्ट, टाटा ग्रुप का सबसे बड़ा शेयरधारक है. टाटा ट्रस्ट्स के बोर्ड सदस्य मेहली मिस्त्री ने पिछले साल नवंबर में नोएल टाटा को भेजे एक संदेश में संगठन से अलग होने की घोषणा की थी. उन्होंने कहा था कि मामलों में जल्दबाज़ी करने से टाटा ग्रुप को अपूरणीय नुक़सान हो सकता है.”
निक्केई एशिया ने लिखा है, ”मिस्त्री को प्रभावी रूप से उस समय बाहर कर दिया गया, जब उन्होंने और बोर्ड के कई अन्य सदस्यों ने टाटा सन्स के बोर्ड के एक सदस्य को दोबारा नियुक्त करने के नोएल टाटा के प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया. मिस्त्री ख़ुद निदेशक बनना चाहते थे, लेकिन ऐसा लगता है कि नोएल टाटा ने उन्हें रोक दिया.”
”टाटा ग्रुप में जारी उथल-पुथल को नज़रअंदाज करने में असमर्थ सरकार ने मध्यस्थता के लिए क़दम उठाया है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और अन्य अधिकारियों ने पिछले साल अक्टूबर की शुरुआत में नोएल टाटा और ग्रुप के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाक़ात कर जल्द समाधान निकालने का अनुरोध किया.”
टाटा ग्रुप पर रिसर्च करने वाले टोक्यो की तकुशोकु यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर एमेरिटस मकोतो कोजिमा ने निक्केई एशिया से कहा, “अगर समूह शेयर बाजार में लिस्ट होता है, तो यह जोखिम है कि बाज़ार का दबाव मुनाफ़े को प्राथमिकता देने वाली सोच को बढ़ावा देगा. सार्वजनिक रूप से लिस्ट होने के लिए मैनेजमेंट के फलसफे और नैतिकता से समझौता करना मुश्किल हो सकता है.”
टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा को लिखे एक पत्र में रतन टाटा के क़रीबी सहयोगी मेहली मिस्त्री ने कहा था, “रतन एन टाटा के विजन के प्रति मेरी प्रतिबद्धता में यह ज़िम्मेदारी भी शामिल है कि टाटा ट्रस्ट्स किसी विवाद में न फँसे.”
अपने पत्र में मिस्त्री ने कहा था, “मैं रतन टाटा की कही एक बात के साथ अलग हो रहा हूँ, जो वह अक्सर मुझसे कहा करते थे, ‘जिस संस्था की वह सेवा करते हैं, उससे बड़ा कोई नहीं होता.”
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नोएल टाटा सन्स की लिस्टिंग क्यों नहीं चाहते हैं?
ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि आपसी प्रतिद्वंद्विता और रेग्युलेटरी असमंजस ने टाटा सन्स की लिस्टिंग के फ़ायदे और नुक़सान के किसी तर्कसंगत, कारोबारी आकलन को धुंधला कर दिया है.
लिस्टिंग होने के बाद कंपनी को ज़्यादा पारदर्शी होना पड़ेगा. नए कारोबारों के लिए फंड जुटाने के विकल्पों का विस्तार हो सकता है. बड़े और प्रतिष्ठित वैश्विक निवेशकों के लिए भी मौक़ा होगा.
मुंबई स्थित गवर्नेंस एडवाइजरी फर्म आईआईएएस की अध्यक्ष और चीफ़ ऑपरेटिंग ऑफिसर हेतल दलाल ने ब्लूमबर्ग से कहा, ”एयर इंडिया की ख़रीद और सेमीकंडक्टर फैसिलिटी में निवेश जैसे सौदों को शायद सार्वजनिक शेयरधारकों के एक समूह का समर्थन नहीं मिला होता. टाटा सन्स की लिस्टिंग को लेकर बहस किसी ठोस लाभ के बजाय रेग्युलेटरी निर्देश से संचालित हो रही है.”
भारत के अन्य चैरिटेबल ट्रस्टों के उलट, टाटा ट्रस्ट्स को अपने टाटा सन्स के शेयरों पर वोटिंग अधिकार इस्तेमाल करने का एक दुर्लभ विशेषाधिकार हासिल है. इस अधिकार को वापस लिया जाना असंभव नहीं है.
ब्लूमबर्ग ने लिखा है, इन सभी कमज़ोरियों के बावजूद, 10 साल पहले टाटा ग्रुप में जो दरारें खुली थीं, वे अब और गहरी होती जा रही हैं.
फ़ाइनैंशियल टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि टाटा सन्स की लिस्टिंग ग्रुप को नियंत्रित करने वाले चैरिटेबल ट्रस्टों के चेयरमैन और संस्थापक परिवार के सदस्य नोएल टाटा के लिए बड़ा झटका होगा.
इंडियन स्कूल ऑफ बिज़नेस के विजिटिंग प्रोफ़ेसर और टाटा के पूर्व अधिकारी निर्मल्य कुमार ने एफ़टी से कहा, “आरबीआई सरकार की ओर से अप्रत्यक्ष और अनौपचारिक मंज़ूरी मिले बिना इतना बड़ा फ़ैसला नहीं ले सकता.”
लिस्टिंग की जाए या नहीं, इस मुद्दे पर मतभेद इस साल बोर्डरूम में हुए विवाद का एक अहम कारण था. यह विवाद पिछले महीने उस समय चरम पर पहुँचा, जब लंबे समय से टाटा सन्स के चेयरमैन रहे एन चंद्रशेखरन ने घोषणा की कि वह अगले साल फ़रवरी में अपना कार्यकाल ख़त्म होने के बाद पद छोड़ देंगे.
एफ़टी से टाटा सन्स के क़रीबी एक व्यक्ति ने कहा, “जो कंपनी पब्लिक लिस्टिंग होना नहीं चाहती, उसे सरकार ऐसा करने के लिए मजबूर कर रही है. इस प्रक्रिया को लेकर नियामकीय अनिश्चितता विदेशी निवेश को गंभीर नुक़सान पहुंचाने वाली है.”
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