दिलचस्प बात यह है कि 2024 लोकसभा चुनावों से पहले आरयूपीपी की फंडिंग में तेज़ उछाल आया. वित्त वर्ष 2022-23, जो चुनाव वर्ष से ठीक पहले था, में इन शीर्ष 10 दलों की आय पिछले समय की तुलना में अचानक बढ़ गई.
कुछ मामलों में चंदे की राशि कुछ लाख से बढ़कर आम चुनावों के दौरान सैकड़ों करोड़ तक पहुँच गई.
दिलचस्प बात यह भी रही कि ज़्यादातर आरयूपीपी ने एक ही साल में अपनी लगभग पूरी आय ख़र्च कर दी.
एडीआर में प्रोग्राम और रिसर्च मैनेजर शैली महाजन कहती हैं, “अगर आप हमारी रिपोर्ट में दिए गए शीर्ष 10 दलों को देखें तो इनमें से 10 आरयूपीपी ने वित्त वर्ष 2022-23 में कुल 1564.817 करोड़ रुपये ख़र्च किए, जो उनकी लगभग पूरी आय है. यह दिखाता है कि वे जितना जुटाते हैं, लगभग उतना ही ख़र्च कर देते हैं.”
महाजन ने यह भी बताया कि कुछ अमीर आरयूपीपी ने ऐसी आय दर्ज की जो क्षेत्रीय और यहाँ तक कि राष्ट्रीय दलों से भी ज़्यादा थी.
2022-23 में गुजरात स्थित भारतीय नेशनल जनता दल की आय, भारत की दूसरी सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, से भी ज़्यादा थी.
वह यह भी कहती हैं, “यह विश्लेषण दलों की दर्ज आय पर आधारित है, लेकिन दर्ज आय में कुछ हद तक अस्पष्टता भी हो सकती है.”
रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि इन दलों को मिलने वाला चंदा उनकी वास्तविक आय से कहीं ज़्यादा है.
एडीआर के अनुसार, जहाँ राष्ट्रीय दलों ने बड़े दानदाताओं (20,000 रुपये से अधिक के चंदे) से सिर्फ़ 33% चंदा मिलना बताया है, वहीं शीर्ष 10 गैर-मान्यता प्राप्त दलों को 93% चंदा बड़े दानदाताओं से मिला.
एनसीपीआई की स्थिति
इस पृष्ठभूमि में एनसीपीआई कहाँ खड़ी है? तो यह रहा पार्टी की फ़ंडिंग का विश्लेषण.
पार्टी की 2022-23 की ऑडिट रिपोर्ट बताती है कि उसे उस वित्त वर्ष में कुल 1.13 लाख रुपये का चंदा मिला.
पार्टी ने त्रिपुरा चुनाव पर लगभग 49,400 रुपये खर्च किए. इसके अलावा पार्टी ने पेशेवर शुल्क, विज्ञापन शुल्क और अन्य पंजीकरण संबंधी ख़र्चों पर 52,000 रुपये ख़र्च किए. सभी ख़र्चों के बाद वित्त वर्ष के अंत में पार्टी के पास सिर्फ़ 75 रुपये बचे.
इन सभी आरोपों के बावजूद, जियल वर्नियर यह भी कहते हैं कि ऐसा भी नहीं है कि आरयूपीपी बुरे ही हैं.
वह कहते हैं, “हमें यह ध्यान रखना होगा कि आरयूपीपी मूल रूप से नागरिकों के चुनावों में भाग लेने के अधिकार से उपजते हैं. कुछ दलों के अनुचित व्यवहार की वजह से उन सैकड़ों दलों को दबाना ठीक नहीं होगा जो भारत के लोकतांत्रिक जीवन में योगदान देते हैं.”
वैसे पंजीकरण के बाद से एनसीपीआई का संसद या किसी राज्य विधानसभा में कोई सदस्य नहीं रहा.
त्रिपुरा में उनकी शुरुआत भले ही फीकी रही, लेकिन सीधे लोकसभा के साथ वे भारतीय राजनीति में ‘वाइल्ड कार्ड एंट्री’ कर सकते हैं.
विडंबना यह है कि उनके 2023 के चुनावी पोस्टरों के शीर्ष पर लिखा था: “निजेर अधिकार रक्षा कोरते दोलबोदलुदेर साथ छारुन” (अपने अधिकारों की रक्षा के लिए दल-बदलुओं से दूर रहें).
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.