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ट्रंप को चुनावी झटके से हमारे प्रति अमेरिका का रवैया यकायक बदल नहीं जाएगा: श्याम सरन

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Nov 8, 2026


रुमनी घोष। अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की करारी हार की चर्चा भारत में सत्ता के गलियारों से लेकर मोहल्ले के नुक्कड़ तक है। यह संभवत: पहली बार है, जब अमेरिका के चुनाव पर खास-ओ-आम को समान रूप से चर्चा करते देखा जा रहा है।

इस चर्चा के पीछे छिपा ‘उत्साह’ एक सामान्य मनोविज्ञान हो सकता है, लेकिन क्या यह हमारी-आपकी जिंदगी में कोई बड़ा बदलाव नहीं लाने जा रहा है?

भारत के विदेश सचिव रहे  श्याम सरन  की सलाह है कि अभी हमें इस उत्साह को थामकर रखना चाहिए। ट्रंप के हारने से हमारे प्रति अमेरिका का रवैया यकायक बदल नहीं जाएगा। न ही वीजा पालिसी में तत्काल कोई बदलाव आएगा और न ही फ्री ट्रेड फिर शुरू हो जाएगा।

भारत-अमेरिका परमाणु समझौते में अहम भूमिका निभाने वाले पद्मभूषण से सम्मानित पूर्व भारतीय राजनयिक सरन का मानना है कि हमने अभी तक जिस तरह से खामोशी से स्थिति को संभाला है, वैसे ही आगे बढ़ें और धैर्य के साथ अमेरिका के भीतर आ रहे बदलावों पर नजर रखें।

वर्ष 2006 में विदेश सचिव पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु मुद्दों पर प्रधानमंत्री का विशेष दूत नियुक्त किया गया। वह जलवायु परिवर्तन पर विशेष दूत और मुख्य वार्ताकार भी रहे। वर्ष 2015 तक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के अध्यक्ष भी थे।

उन्होंने विकासशील देशों के लिए अनुसंधान एवं सूचना प्रणाली के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया। आर्थिक और व्यापार-संबंधी मुद्दों पर उनकी विशेषज्ञता है। दैनिक जागरण की समाचार संपादक  रुमनी घोष  ने सरन से अमेरिका के मध्यावधि चुनाव परिणाम का भारत पर असर विषय पर विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

क्या अमेरिका के मध्यावधि चुनाव परिणाम के बाद मौजूदा भू-राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह से बदल जाएगा ?

पूरी तरह से तो नहीं बदल जाएगा, क्योंकि अमेरिका में विदेश नीति पर राष्ट्रपति का नियंत्रण बहुत मजबूत होता है। राष्ट्रपति ट्रंप के पास अभी दो साल का कार्यकाल बाकी है, इसलिए विदेश नीति के मामलों में उनके लिए कार्यकारी निर्णय लेना अब भी संभव है। फिलहाल तत्काल प्रभाव से कोई बदलाव होगा, ऐसा मुझे नहीं लगता है।  

तो क्या इस चुनाव परिणाम का कोई असर नहीं होगा?

नहीं, ऐसा नहीं है। इतनी बुरी तरह हार हुई है तो असर तो पड़ेगा ही, लेकिन वह अमेरिका की घरेलू नीति से जुड़ा होगा। जैसे ईरान पर हमले को लेकर कोई निर्णय हो सकता है। आमतौर पर डेमोक्रेट सहित अमेरिका की आम जनता इस हमले के पक्ष में नहीं है।

खासतौर पर इजरायल के गाजा के प्रति रवैये को लेकर। अब तो वेस्ट बैंक में भी यही स्थिति बन रही है। अब चूंकि पूरा राजनीतिक परिदृश्य बदल गया है, इसलिए नियंत्रण के बावजूद ट्रंप पर कुछ पाबंदियां होंगी। इस तरह के मामलों में एकतरफा निर्णय लेने में ट्रंप को बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।

Shyam Saran interview (2)

तो क्या अब अमेरिका ईरान पर हमला पूरी तरह बंद कर देगा?

नहीं…इस थ्योरी पर अभी तक पूरी तरह आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता है। चूंकि अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने माना कि उनकी पार्टी ईरान युद्ध की वजह से हारी है, इसलिए अनुमान लगाया जा रहा है कि संभवतः अमेरिका के जनमानस की भावना का सम्मान करते हुए ट्रंप सरकार ऐसा कोई निर्णय ले।

हालांकि इसको लेकर अभी आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता है। हो सकता है कि अमेरिका की साख का सवाल बनाते हुए अमेरिका हमला तेज कर दे या फिर निर्णायक हमला कर दे।

ट्रंप ने इंस्टाग्राम पर वीटो लिखी हुई एक टोपी की तस्वीर साझा की है। क्या यह माना जाए कि वह ‘वीटो’ की धमकी दे रहे हैं?

हां, वह वीटो तो कर ही सकते हैं। अमेरिका के बारे में यह बात करते हुए हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि यहां राष्ट्रपति को बहुत ज्यादा शक्तियां प्राप्त हैं, इसलिए यह वीटो कर सकते हैं, लेकिन चूंकि यहां दोनों सदनों पर डेमोक्रेट्स का कब्जा हो गया है, इसलिए यह हर मामले को वीटो कर उसे लागू करने से रोक पाए यह संभव नहीं होगा।

खासतौर पर उन मामलों में, जहां सीनेट की रजामंदी मायने रखती है। जैसे महत्वपूर्ण नियुक्तियां। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों और विदेशी राजदूतों जैसी अहम नियुक्तियों के लिए सीनेट की मंजूरी जरूरी है।

कई वरिष्ठ पदों पर नियुक्तियों को भी सीनेट मंजूरी देती है। चूंकि पहले दोनों सदनों पर अब तक रिपब्लिकन पार्टी का नियंत्रण था, इसलिए ट्रंप सरकार के निर्णयों को एक तरफा लागू करवाना आसान था, अब इन मामलों में डेमोक्रेट्स की राय भी शामिल होगी।

Shyam Saran interview (1)

तो क्या भारत को कोई राहत मिलने की कोई उम्मीद नही है?

देखिए, मुझे लगता है कि अभी इस पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। हमें इंतजार करना चाहिए और देखना चाहिए कि चुनाव के कारण अमेरिका में क्या बदलाव आते हैं। उसके बाद ही हम अंदाजा लगा सकते हैं कि उसका हम पर क्या असर होगा।

क्या वीजा और इमिग्रेशन नीति में बदलाव नहीं होगा?

(हंसते हुए…) ट्रंप के हारने से अमेरिका का हमारे प्रति रवैया यकायक नहीं बदल जाएगा। ट्रंप 1.0 यानी पहले कार्यकाल में जो फैसले लिए गए थे, बाइडन के शासनकाल में क्या उन्हें बदला गया? नहीं…उन्हें कमोबेश वही रखा गया। इसी तरह अब भी होगा। ट्रंप के पहले कार्यकाल में हमें काफी लाभ हुआ।

क्वाड को पुनर्जीवित किया गया। इंडो-पैसिफिक रणनीति की घोषणा की गई। विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ हमारे संबंध, आतंकवाद विरोधी अभियान और रक्षा प्रौद्योगिकी साझेदारी में सुधार हुआ। एक समय में भारतीय समुदाय को अल्पसंख्यकों का माडल कहा जाता था।

भारतीय उच्च पदों पर पदस्थ थे, लेकिन धीरे-धीरे इस विस्तार के प्रति गुस्सा पनपने लगा। हमें यह ध्यान रखना होगा कि ट्रंप ने मूल अमेरिकियों की भावना को देखते हुए ही वीजा पालिसी में बदलाव कर एच1बी1 वीजा पर पाबंदी लगाई है।

हमें इस पर यकीन करना होगा कि बीते कई सालों में अमेरिका में ‘भारत विरोधी’ भावना बढ़ी है। उन्हें लगता है कि उनके अवसरों पर भारत जैसे देश के लोग आकर कब्जा जमा रहे हैं। वे काम के नाम पर अमेरिका जाते हैं और वही रह जाते हैं। …और इस मामले में अमेरिका में एक तरह की द्विदलीय सहमति है।

संभव है कि रिपब्लिकन पार्टी के रुख में कुछ ज्यादा सख्ती हो, लेकिन डेमोक्रेट्स का नजरिया बहुत ज्यादा अलग नहीं होगा। यानी यह नहीं होगा कि अब सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा।

वीजा पॉलिसी को लेकर दोनों दलों के बीच सहमति है। ऐसे में कैसे सोचा जा सकता है कि डेमोक्रेट्स आते ही हमारे लिए एच1बी1 वीजा का दायरा खोल दिया जाएगा। इसी तरह इमिग्रेशन नीति पर दोनों दल एकमत है।

Shyam Saran interview (4)

और ट्रेड डील (व्यापार समझौता) का क्या होगा?

ट्रेड डील को लेकर भी दोनों के बीच एक आम सहमति बनी हुई है। ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में फ्री ट्रेड पर सवाल उठाते हुए नीतियों में कुछ बदलाव किया था। बाइडन ने आकर उसमें कोई बदलाव नहीं किया था। मुझे लगता है कि भले ही कांग्रेस (अमेरिकी संसद) में बदलाव आया हो, लेकिन यह नहीं सोचना चाहिए कि ‘फ्री ट्रेड’ (मुक्त व्यापार) या उदार व्यापार व्यवस्था वापस आ जाएगी।

बल्कि मुझे यकीन है कि अब किसी भी स्थिति में ऐसा नहीं होने वाला है। अगर डेमोक्रेट्स ऐसा करते हैं, तो उन्हें अपने ही देश में भारी आलोचना का सामना करना पड़ सकता है।

अगर हम पिछले कई वर्षों में अमेरिका की विदेश नीति में आए बदलावों पर नजर डालें, तो हम पाएंगे कि रिपब्लिकन पार्टी मुक्त व्यापार, उदार व्यापार और पूंजी के मुक्त प्रवाह की समर्थक रही है, जबकि डेमोक्रेट्स हमेशा से ही संरक्षणवादी (प्रोटेक्शनिस्ट) रहे हैं।

खासतौर पर भारत के बारे में उनकी धारणा यह रही है कि हम फ्री ट्रेड करना चाहते हैं, लेकिन बदले में अपना बाजार अमेरिका के लिए नहीं खोलते हैं। और यह धारणा धीरे-धीरे और ज्यादा दृढ़ होती जा रही है।

और रूस से तेल खरीद मामले में टैरिफ जैसे प्रतिबंधों पर रोक लगेगी क्या?  

व्यापार को लेकर अनिश्चितता और अप्रत्याशितता कम हो सकती है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लिंडसे ग्राहम कानून द्विदलीय सहमति के साथ भारी बहुमत से पारित हुआ था।

इस कानून का मुख्य उद्देश्य रूस के ऊर्जा व रक्षा क्षेत्रों पर कड़े प्रतिबंध लगाना और रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल व गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक दंडात्मक आयात शुल्क (टैरिफ) लगाने का अधिकार राष्ट्रपति को देना है।

एआइ, सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग व स्वच्छ ऊर्जा में संयुक्त सहयोग को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई भारत-अमेरिका संयुक्त पहल यानी आइसीईटी (इंडिया-अमेरिका इनिशिएटिव आन क्रिटिकल इमरजिंग टेक्नोलाजी) की गति पर क्या असर पड़ेगा?

भारत को अमेरिका में होने वाले अंदरूनी बदलावों पर नजर रखना चाहिए। लोगों में इस बात का गुस्सा था कि एंथ्रोपिक, माइक्रोसाफ्ट जैसी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अपनी इच्छानुसार बढ़ाने की स्वतंत्रता दे दी गई। इसके जोखिमों पर ध्यान नहीं दिया गया। इसी तरह डाटा सेंटर के निर्माण के कारण बिजली की मांग में काफी वृद्धि हुई है।

इसकी वजह से बिजली की मांग बढ़ी और लोगों को महंगाई का सामना करना पड़ा। पहले जीवाश्म ईंधन से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव हुआ था, इस नीति से उसे भी झटका लगा।

इन सभी चीजों को लेकर अमेरिका की जनता में सरकार के खिलाफ गुस्सा था। अब जब दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स बहुमत में हैं, तो इनमें बदलाव हो सकता है। इस पर नजर रखनी होगी।

ट्रंप अगले दो साल और रहेंगे। उधर, इस परिणाम ने अगले राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेट्स के भीतर सत्ता में वापसी की उम्मीद जगा दी है। दोनों दलों के बीच संतुलन बनाकर भारत कैसे स्थितियों को पहले जैसा कर सकता है?  

मेरा आकलन है कि पुरानी स्थितियां फिर लौटकर नहीं आएंगी। हमें इस बात को समझना होगा कि ट्रंप ने निजी तौर पर कोई नीति नहीं थोपी है, बल्कि वह अमेरिकी समाज में आ रहे बदलावों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इमिग्रेशन (प्रवास नीति), वीजा या ट्रेड डील को लेकर जो नीतियां बनाईं, वे सिर्फ भारत के लिए नहीं, बल्कि सभी देशों के लिए भी हैं। अब आते हैं, भारत पर…यह सही है कि बीते 20-25 सालों में अमेरिका-भारत के रिश्ते मजबूत हुए थे। इसका फायदा भारत को मिल रहा था।

एशिया में अमेरिका सबसे ज्यादा हमें तवज्जो दे रहा था, क्योंकि उसे लगता था कि भारत, चीन के मुकाबले ‘शक्ति’ बनकर उभर सकता है। उनका अनुमान था कि एशिया में संतुलन के लिए भारत की भूमिका आवश्यक है। इसके बिना यह संभव नहीं लेकिन भारत वह भूमिका नहीं निभा पाया।

बीते कई सालों में कुछ (खासतौर पर वर्ष 2007-08 में वैश्विक मंदी के बाद से) सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बदलाव आए।  चीन और भारत के बीच शक्ति का अंतर बहुत बढ़ गया।

खासतौर पर रक्षा और आर्थिक क्षमताओं के मामले में अंतर बहुत बढ़ गया है। अब इसे भर पाना थोड़ा मुश्किल है। अब जब हम विकल्प नहीं बन पा रहे हैं, तो अमेरिका हमें वह तवज्जो क्यों देगा?  

और पाकिस्तान को लेकर अमेरिका का रवैया कैसा रहेगा?        

हमारा दिल भले ही यह न मानना चाहे, लेकिन ईरान युद्ध रुकवाने में पाकिस्तान ने जो पहल की, उससे भू-राजनीतिक स्तर पर उसका कद बढ़ा है। भले ही युद्ध नहीं थमा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी सराहना हुई। इसके अलावा मक्का समझौता भी उसके पक्ष में रहा है।  इन परिस्थितियों में अमेरिका निश्चित रूप से तरजीह देगा।  

तो भारत के पास क्या विकल्प है?  

मेरा मानना है कि वर्ष 1947 से लेकर अब तक भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता पर ही कायम रही है। गुटनिरपेक्षता की नीति सामरिक स्वायत्तता और बहुसंरेखण (मल्टी अलाइंमेंट) की है। हर सरकार इसे भले ही अलग-अलग नाम दे, लेकिन इसका मूल सिद्धांत एक ही है।

हम अपने निर्णय खुद लेंगे। जैसे अभी ‘खामोश’ रहकर हमने ट्रंप द्वारा बनाए जा रहे दबाव को दरकिनार किया, व्यापार के क्षेत्र में नेटवर्क को विकसित किया। यह एक बेहतर और सुलझा हुआ कदम है। अभी भी हमें यही रणनीति अपनानी चाहिए। स्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहेंगी। आने वाले 20 वर्षों में बदलेंगी  

आपके कार्यकाल में हुए परमाणु समझौता हुआ था। उस समय भी बहुत गतिरोध था। क्या वर्तमान स्थिति से इसकी तुलना हो सकती है?  

वर्तमान स्थिति से उसकी तुलना नहीं हो सकती है। उस समय की परिस्थितियां अलग थीं। समझौते में जब-जब हमारे स्तर पर (दोनों देशों के राजनयिकों के बीच बातचीत के दौरान) बाधाएं उत्पन्न हुईं, तब-तब तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह और अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश ने मिलकर उसे सुलझाया था।    

डेमोक्रेटिक पार्टी के नियंत्रण वाली कांग्रेस नई दिल्ली में मानवाधिकार मामलों और घरेलू राजनीति पर लगातार टिप्पणियां करती रही है। क्या आने वाले समय में यह भारत के लिए चुनौती पैदा कर सकती है?

वर्तमान सरकार को इसके लिए तैयार रहना चाहिए। डेमोक्रेटिक में से कुछ भारत के कुछ मामलों को लेकर बहुत ज्यादा क्रिटिकल हैं। वे निश्चित रूप से उन मामलों को उठाएंगे। ट्रंप और उनकी सरकार मानवाधिकार या नीतियों को लेकर बिलकुल भी नहीं सोचती थी।

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