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डे-ड्रीमिंग: जब कल्पनाओं में डूबना लत बन जाए तो क्या करें

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Jun 7, 2026


जागते हुए गहरी कल्पनाओं में लंबे समय तक खो जाना और उससे बाहर न निकल पाना डिसऑर्डर की स्थिति हो सकती है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, जागते हुए गहरी कल्पनाओं में लंबे समय तक खो जाना और उससे बाहर न निकल पाना डिसऑर्डर की स्थिति हो सकती है (प्रतीकात्मक तस्वीर)

क्या आपने कभी खुद को ऐसी कल्पनाओं में खोया पाया है, जहाँ सब कुछ वैसा होता है, जैसा आप चाहते हैं? भले यह सफलता हो, पहचान या लोगों का प्यार.

खुली आंखों से देखे जाने वाले ऐसे सपने भावनात्मक संतुलन और नई सोच देते हैं.

मगर जब यही कल्पनाएँ हक़ीक़त से ज़्यादा आकर्षक लगने लगें और आप उससे बाहर ही न आ पाएं तो स्थिति जटिल बन जाती है.

यह उनके लिए सच्चाई के समानांतर एक नई दुनिया जीने जैसा बन जाता है, जिससे वे बाहर नहीं निकल पाते. इसी स्थिति को मनोविज्ञान की भाषा में मैलएडैप्टिव डे-ड्रीमिंग कहा जाता है.

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