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क्या आपने कभी खुद को ऐसी कल्पनाओं में खोया पाया है, जहाँ सब कुछ वैसा होता है, जैसा आप चाहते हैं? भले यह सफलता हो, पहचान या लोगों का प्यार.
खुली आंखों से देखे जाने वाले ऐसे सपने भावनात्मक संतुलन और नई सोच देते हैं.
मगर जब यही कल्पनाएँ हक़ीक़त से ज़्यादा आकर्षक लगने लगें और आप उससे बाहर ही न आ पाएं तो स्थिति जटिल बन जाती है.
यह उनके लिए सच्चाई के समानांतर एक नई दुनिया जीने जैसा बन जाता है, जिससे वे बाहर नहीं निकल पाते. इसी स्थिति को मनोविज्ञान की भाषा में मैलएडैप्टिव डे-ड्रीमिंग कहा जाता है.
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मेरी भी सपनों की काल्पनिक दुनिया इतनी जीवंत और गहराई भरी है कि ये सपने देखते हुए मैं रोने लग सकती हूं या ये ख्याल मुझे ज़ोरों से हंसाने पर मजबूर कर देते हैं.
मगर ख़ास बात यह है कि मैं जब चाहूं तो खुली आंखों वाले इन सपनों से खुद को बाहर निकाल पाती हूं और जब चाहूं इन कल्पनाओं में गहरे डूब जाती हूं. मुझे यह पसंद है.
अपने दिवास्वप्न (डे-ड्रीम) के बारे में जब मैंने अमेरिका के एक मनोचिकित्सक और शोधकर्ता कॉलिन रॉस को बताया तो वो इस क्षमता से प्रभावित हो गए. और मुझे एक्टिंग में करियर बनाने की सलाह दे डाली.
मैं इस बारे में इतनी आश्वस्त तो नहीं हूं, लेकिन उनकी तारीफ़ से ख़ुश ज़रूर हो गई.
जब डे-ड्रीमिंग बन जाए समस्या
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लेकिन अगर आप कल्पनाओं की दुनिया से बाहर ही न आ पाएं तो क्या होगा?
यही समस्या उन लोगों के सामने आती है, जिन्हें मैलएडैप्टिव डे-ड्रीमिंग (एमडी) नाम की स्थिति से गुज़रना पड़ता है.
ऐसे लोग अपने जागते समय का आधे से भी ज़्यादा हिस्सा कल्पनाओं में बिताते हैं.
वो अपने मन में बहुत ही जटिल और विस्तृत कहानियां और किरदार बना लेते हैं.
मनोचिकित्सक रॉस बताते हैं कि गंभीर मामलों में लोग दिन में 12 घंटे तक भी सपनों में खोए रह सकते हैं.
उनकी कहानियाँ कई सालों तक चलती रहती हैं. यह सुनने में अच्छा और आकर्षक लग सकता है, लेकिन ये लोग अपनी कल्पनाओं में इतने खो जाते हैं कि उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी प्रभावित होने लगती है और उन्हें बहुत तकलीफ़ होती है.
मनोचिकित्सक और शोधकर्ता कॉलिन रॉस कहते हैं, “पर, ये जितना दुर्लभ लगता है, उतना नहीं है. करीब 2 से 4 प्रतिशत वयस्क इसकी ज़द में हो सकते हैं.”
ऐसे में सवाल है कि दिन में सपने देखने की आदत वाले किसी व्यक्ति को कैसे पता लगेगा कि यह समस्या बन रही है? और इसका इलाज कैसे किया जा सकता है?
डे-ड्रीमिंग: एक सामान्य प्रक्रिया
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मनोचिकित्सक रॉस कहते हैं कि डे-ड्रीमिंग अपने आप में बुरी नहीं है. बल्कि इसके उलट अगर कोई दिन में बिल्कुल भी कल्पनाओं में नहीं खोता तो मैं उसके लिए बुरा महसूस करूंगा.
डे-ड्रीमिंग को एक सामान्य मानसिक गतिविधि माना जाता है, जिसमें लगभग हर व्यक्ति शामिल होता है.
शोध के अनुसार, जब हम जाग रहे होते हैं तो हमारी 30 से 50 फ़ीसदी मानसिक गतिविधि ऐसे विचारों में जाती है, जो उस समय किए जा रहे काम से जुड़ी नहीं होती.
रॉस कहते हैं कि डे-ड्रीमिंग के कई फ़ायदे भी होते हैं. यह भावनाओं को संतुलित करने में मदद करता है, दूसरों को समझने की क्षमता बढ़ाता है. और रचनात्मकता को भी बढ़ावा देता है.
साथ ही यह बोरियत दूर करने और जीवन के अनुभवों में अर्थ खोजने में भी मदद करता है.
ख्यालों में खोना कब बन जाता डिसऑर्डर
मनोचिकित्सक रॉस डे-ड्रीमिंग और मैलएडैप्टिव डिसऑर्डर में अंतर बताते हुए कहते हैं, “लेकिन मैलएडैप्टिव डे-ड्रीमिंग पूरी तरह से व्यक्ति को अपनी दुनिया में खींच लेती है.”
वह दिवास्वप्न में गहराई तक उतर जाने और उससे बाहर न निकल पाने की स्थिति को परेशानी भरा बताते हैं.
वह कहते हैं, “इससे आपके रोज़मर्रा के काम करने की क्षमता में ख़लल पड़ता है. फिर भी इसे आप करते रहते हैं क्योंकि इसमें एक मजबूरी (लत) जैसी भावना होती है.”
यह इसे मैलएडैप्टिव डिसऑर्डर बनाता है. जब ऐसे लोग आख़िरकार अपने सपनों की दुनिया से बाहर आते हैं, तो उन्हें महसूस होता है कि उनकी कल्पनाएँ बेकार थीं और उनका समय बर्बाद हुआ.
फिर भी, इसकी आदत इतनी गहरी होती है कि वे दोबारा उसी चक्र में फँस जाते हैं. और इससे बाहर निकलना आसान नहीं होता.
कैसे शुरू होती है यह आदत
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मैलएडैप्टिव डिसऑर्डर की स्थिति को समझने के लिए मनोचिकित्सक रॉस, कायला बोरचर्ड्स के अनुभवों का उदाहरण देती हैं.
कायला ने लगभग चार साल की उम्र से ही अपने दिमाग में “दूसरी दुनिया” बनाना शुरू कर दिया था.
बाद में जब वह एक नए स्कूल में गईं और अन्य बच्चों ने उनकी बोली का मज़ाक उड़ाया, तो यह आदत और बढ़ गई.
उनके लिए उनकी कल्पनाओं में चलती ये कहानियाँ ऐसी “सुरक्षित जगह” बन गईं, जहाँ “कोई उनका मज़ाक नहीं उड़ाता था और लोग उन्हें पसंद करते थे.” वो कई-कई घंटों तक डे-ड्रीम्स में खोई रहती थीं.
वह इस आदत को समझाने के लिए ज़्यादा चॉकलेट खाने या बार-बार सोशल मीडिया देखने की आदत से जोड़कर बताती हैं कि जैसे ये काम बार-बार करने का मन करता है.
वह कहती हैं कि यहीं पर एक सामान्य और अच्छी आदत नुक़सानदायक बन सकती है.
इसराइल के हाइफ़ा विश्वविद्यालय के क्लिनिकल मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर एली सोमर ने इसी मामले पर कहा, “समस्या तब शुरू होती है जब व्यक्ति अपनी कल्पनाओं को नियंत्रित नहीं करता, बल्कि कल्पनाएँ ही उस व्यक्ति को नियंत्रित करने लगती हैं.”
गहरी कल्पनाओं से पैदा होती अनजानी आदतें
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उन्होंने ही इस स्थिति को “मैलएडैप्टिव डे-ड्रीमिंग” नाम दिया और वे पिछले 20 सालों से इस पर रिसर्च कर रहे हैं.
प्रोफ़ेसर एली सोमर ने कहा कि मैलएडैप्टिव डे-ड्रीमिंग में करीब 80 फीसदी लोग अक्सर बार-बार अनजाने में कुछ ऐसी शारीरिक गतिविधियां करने लगते हैं जो उन्हें कल्पनाओं में डूबे रहने में मदद करती हैं. जैसे- म्यूज़िक सुनना या इधर-उधर टहलना.
वह बोरचर्ड्स की आदतों का उदाहरण देते हैं कि “वो अपने घर के बाहर ड्राइव-वे पर घंटों रोलर-स्केट्स पहनकर आगे-पीछे घूमती थीं या दीवार पर गेंद मार-मारकर खेलती रहती थीं.”
वह आगे बताते हैं कि डे-ड्रीमिंग में बोरचर्ड्स इतना समय अपनी कल्पनाओं में बिताती थीं कि धीरे-धीरे उन्होंने लोगों से मिलना-जुलना कम कर दिया. और रिश्तों से भी दूरी बना ली. इससे अकेलापन बढ़ा और फिर शर्म और पछतावे का एक चक्र शुरू हो गया.
बोरचर्ड्स कहती हैं, “मैंने कभी प्रमोशन पाने की कोशिश ही नहीं की.”
अपने करियर के शुरुआती समय में ही बोरचर्ड्स को महसूस होने लगा कि उनकी यह आदत उन्हें आगे बढ़ने से रोक रही है.
वह कहती हैं, “मुझे कोई मोटिवेशन ही नहीं था. मैं मेहनत करके प्रमोशन क्यों पाने की कोशिश करूँ, जब मैं अपनी कल्पना में बिना किसी मेहनत के वही सब पा सकती हूँ. और वह असली दुनिया जितना ही अच्छी लगती है.”
“मैं 40 साल की उम्र में भी एंट्री-लेवल का काम कर रही थी, क्योंकि मैंने कभी प्रमोशन पाने की कोशिश ही नहीं की.”
क्लिनिकल साइकॉलजिस्ट वांडा फिशेरा कहती हैं कि बोरचर्ड्स का लॉजिक समझ में आता है. वे इसे स्पष्ट करते हुए कहती हैं, “सोचिए आपके पसंदीदा टीवी शो में अगर मुख्य किरदार आप खुद हैं और अगर आपकी असल ज़िंदगी उतनी रोमांचक नहीं है, तो आप इसे कैसे छोड़ सकते हैं?”
उनका कहना है कि अगर किसी व्यक्ति की भावनात्मक ज़रूरतें पूरी नहीं हो रही होतीं, तो मैलएडैप्टिव डे-ड्रीमिंग उन्हें ऐसा महसूस कराती है कि उनकी ये ज़रूरतें पूरी हो रही हैं.
जैसे, ऐसे लोग अपने सपनों में खुद को बहुत वास्तविक तरीके से मौजूद महसूस करते हैं और अक्सर उन्हें वहाँ प्यार मिलता है या वे किसी हीरो की तरह होते हैं.
ऐसी ही स्थिति मारिया की भी है जो अपना अनुभव साझा करती हैं मगर पूरा नाम ज़ाहिर नहीं करना चाहतीं.
मारिया अक्सर खुद को ऐसे ख्याल में पाती हैं जिसमें वे स्टेज पर खड़ी हैं और लोग उन्हें देख रहे हैं. वे सफल हैं और सब उन्हें पहचानते हैं.
क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट वांडा फिशेरा कहती हैं कि ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि ऐसे लोगों के मन में एक तरह की शर्म या कमी की भावना होती है.
जैसे वे सोच सकते हैं कि “शायद मैं जैसा हूँ, उतना अच्छा नहीं हूँ,” या “लोग मुझे वैसे प्यार नहीं करते, जैसा मैं हूँ,” या “मैं अपना असली रूप दिखा नहीं सकता.”
वह आगे कहती हैं, “इन कल्पनाओं में हमेशा रिश्ते और जुड़ाव होते हैं. यह दिखाता है कि उनके अंदर अकेलेपन को कम करने की बहुत गहरी चाह है.”
मारिया की कहानी
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मारिया ने स्वीकारा है कि उन्हें बचपन में बहुत अकेलापन महसूस होता था. वह संगीत सुनते हुए घंटों तक आगे-पीछे झूलती रहती थीं, ताकि वह अपनी कल्पनाओं में और गहराई से खो सकें.
वह कहती हैं, “ये ध्यान को पूरी तरह खींच लेता है और एक तरह की अलग (समानांतर) दुनिया होती है.”
उनके माता-पिता और शिक्षक उनकी इस परेशानी को समझ नहीं पाए.
मारिया कहती हैं, “ये बहुत बाधा डालता था इसलिए मैं पढ़ाई नहीं कर पाती थी. लोग अपने-आप सोच लेते थे कि मैं पढ़ना ही नहीं चाहती, या कि मैं आलसी हूँ.”
मारिया अपने मन में अलग-अलग कहानियाँ और किरदार बनाती थीं. इनमें कुछ पूरी तरह काल्पनिक और कुछ किरदार असल लोगों से प्रेरित थे.
वह एक कहानी या किरदार पर पूरे एक साल तक ध्यान लगाकर रहती थीं. अब वह कहती हैं कि उनके पास “दस फिल्मों के लिए काफी कहानियाँ” हैं.
हालांकि वह यह भी बताती हैं कि जब उनका कोई डे-ड्रीम ख़त्म होता तो वह उन कहानियों की सामग्री को लिखती भी नहीं थीं
उन्हें इस बात का भरपूर अहसास था कि इससे उनका बहुत समय बर्बाद हो गया.
कई लोगों की तरह मारिया को भी इस समस्या के बारे में बड़े होने पर पता चला.
उन्हें यह जानकर बहुत राहत मिली कि वे अकेली नहीं हैं जो इस तरह से सोच रही थीं.
वह कहती हैं, “मैं हमेशा सोचती थी कि शायद मैं अजीब हूँ.”
मैलएडैप्टिव डे-ड्रीमिंग के क्या कारण हैं
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कुछ शोधों में पाया गया है कि यह समस्या बचपन के किसी ट्रॉमा से जुड़ी हो सकती है, जैसे कि उपेक्षा, भावनात्मक शोषण, या संबंधों में असुरक्षा.
ऐसे लोग अपनी दर्दनाक यादों और भावनाओं से बचने के लिए कल्पनाओं की दुनिया में चले जाते हैं.
इसके अलावा, गहरी कल्पनाओं में डूब जाना ऐसे लोगों के लिए भी मदद का तरीका बनता है जिनके मस्तिष्क के कार्य करने के तरीके भिन्न (जैसे न्यूरोडायवर्सिटी) होते हैं.
एक अध्ययन में ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर वाले 235 वयस्क शामिल थे, उनमें से 43 फ़ीसदी लोगों ने मैलएडैप्टिव डे-ड्रीमिंग का अनुभव बताया.
इन अनुभवों का संबंध अकेलेपन और भावनाओं को संभालने में कठिनाई से जुड़ा हुआ था.
अन्य शोधों में यह भी पाया गया है कि इस समस्या का संबंध कुछ और मानसिक स्थितियों से भी हो सकता है, जैसे- डिसोसिएटिव (वास्तविकता से अलग महसूस करना) और कम्पल्सिव (बार-बार करने वाली आदतें) विकार, एडीएचडी, ओसीडी, डिप्रेशन और एंग्ज़ायटी.
बोरचर्ड्स को 18 साल की उम्र में डिप्रेशन का पता चला था.
वह कहती हैं, “असल समस्या डिप्रेशन थी, और मैं उससे बचने के लिए असली ज़िंदगी से दूर भाग जाती थी.”
जब वह 40 की उम्र में थीं, तब उन्होंने एक महीने तक मानसिक स्वास्थ्य केंद्र में रहकर इलाज कराया.
उन्हें तब महसूस हुआ कि आखिरकार उन्हें सही मदद मिल गई है.
यह उनके लिए एक ऐसा मोड़ साबित हुआ जहां से उन्होंने अपनी इन कल्पनाओं पर काबू पाना शुरू किया.
वो कहती हैं कि उनकी कल्पनाएँ फिर से रचनात्मक और मज़ेदार हो गई हैं और अब उन्हें पहले जैसी परेशानी महसूस नहीं होती.
हालांकि, मारिया की किसी मानसिक बीमारी का आधिकारिक निदान नहीं हुआ है, लेकिन वह एक विशेष थैरेपिस्ट से मदद ले रही हैं.
प्रोफ़ेसर एली सोमर ने कहा, “एडीएचडी के साथ इसका संबंध ख़ासतौर पर ज़रूरी है क्योंकि बाहर से देखने पर बहुत ज़्यादा कल्पनाएँ करना, ध्यान न देने जैसा लग सकता है. साथ ही ओसीडी में भी कुछ समानताएँ होती हैं, जैसे बार-बार आने वाले विचार, मजबूरी वाली आदतें, और उनसे अलग हो पाने में कठिनाई होना.”
हालांकि वह स्पष्ट करते हैं कि “समानता का मतलब यह नहीं है कि दोनों एक ही चीज़ हैं.” वह आगे बताते हैं कि अब तक के प्रमाण बताते हैं कि मैलएडैप्टिव डे-ड्रीमिंग को पूरी तरह एडीएचडी या ओसीडी में नहीं रखा जा सकता.
“यह एक अलग तरह का अनुभव है, जिसमें गहरी कल्पनाएँ, वास्तविकता से कुछ हद तक अलग हो जाना, और अपनी अंदर की दुनिया से भावनात्मक जुड़ाव शामिल होता है.”
क्या यह असली पहचान से दूर ले जाता है?
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तो आख़िर सवाल यह है- क्या मैलएडैप्टिव डे-ड्रीमिंग एक ऐसा तरीका है जो आपको असली ज़िंदगी की मुश्किलों से निपटने में मदद करता है?
या फिर यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है जो आपको असली दुनिया और आपकी असली पहचान से दूर कर देती है?
सोमर कहते हैं, “अभी तक के सबूत बताते हैं कि मैलएडैप्टिव डे-ड्रीमिंग को पूरी तरह एडीएचडी या ओसीडी में नहीं रखा जा सकता.”
तो क्या यह मदद करती है या नुक़सान पहुंचाती है?
सोमर के मुताबिक़ अक्सर यह दोनों ही होती है.
वो कहते हैं, “कई लोगों के लिए यह शुरुआत में एक सहारा होती है, जैसे अकेलापन, तनाव, ट्रॉमा या भावनात्मक कमी से निपटने के लिए.”
”लेकिन कुछ लोगों में यह धीरे-धीरे एक आदत बन जाती है, जो लंबे समय तक चलती है, मजबूरी जैसी हो जाती है और व्यक्ति को असली दुनिया से अलग कर देती है.”
“इसलिए मैं इसे एक ऐसी रणनीति कहूँगा जो शुरुआत में मदद करती है, लेकिन बाद में खुद एक समस्या (डिसऑर्डर) बन सकती है.”
क्या इससे बाहर निकला जा सकता है?
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ध्यान रखने वाली बात यह है कि भले ही कुछ विशेषज्ञ इसे एक क्लिनिकल समस्या मानते हैं, लेकिन अभी तक इसे आधिकारिक तौर पर डीएसएम (मानसिक रोगों की किताब) या आईसीडी में शामिल नहीं किया गया है.
इस पर बड़े स्तर पर ज़्यादा रिसर्च भी नहीं हुई है, ज़्यादातर छोटे-छोटे अध्ययन ही हैं.
इसी वजह से इसका कोई स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट अभी तक नहीं बना है.
सोमर कहते हैं कि फिर भी शुरुआती क्लिनिकल सुबूत उम्मीद देने वाले हैं. कुछ केस स्टडी और शुरुआती इलाज बताते हैं कि सही तरह की थेरेपी मदद कर सकती है.
खासतौर पर जब उसमें इन चीज़ों पर काम किया जाए:
- ट्रिगर (किस वजह से शुरू होता है)
- बार-बार उसी में डूब जाना
- ध्यान को नियंत्रित करना
- भावनाओं को संभालना
- वास्तविकता से बचने की आदत
- शर्म या हीनभावना
वह कहते हैं कि इलाज का लक्ष्य यह नहीं है कि आपकी कल्पनाएँ खत्म कर दी जाएँ, बल्कि यह है कि आप उन पर काबू पा सकें. ताकि कल्पनाएँ आपकी ज़िंदगी को बेहतर बनाएं, उसे बदल न दें.
आख़िर में, एक बड़ी समस्या यह भी है कि ऐसा थेरेपिस्ट ढूंढना, जिसे इस समस्या की सही समझ हो. ये अभी भी थोड़ा मुश्किल है.
ट्रीटमेंट से जीवन में क्या बदला
फिशेरा कहती हैं कि भले ही मैलएडैप्टिव डे-ड्रीमिंग (एमडी) से बाहर निकलना थोड़ा मुश्किल और मेहनत भरा सफर हो, लेकिन इसे ठीक किया जा सकता है.
वह मारिया का उदाहरण देते हुए कहती हैं, “उन्होंने पाया कि उन्हें लिखना पसंद है, इसलिए अब वो अपनी कहानियाँ अपने दिमाग में ही खोने देने के बजाय लिख लेती हैं.”
बोरचर्ड्स का भी अब अपनी डे-ड्रीमिंग के साथ एक अच्छा रिश्ता बन गया है.
वह तो अब एमडी से जूझ रहे लोगों के लिए एक रेडिट कम्युनिटी भी संभालती हैं, जहाँ हर हफ्ते करीब 18,000 लोग आते हैं.
और धीरे-धीरे ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है जिन्हें लगता है कि उन्हें भी यह समस्या हो सकती है.
बोरचर्ड्स कहती हैं कि जो लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं, उनसे वह कहती हैं कि यह हमेशा के लिए नहीं रहता.
वह अपने दिमाग की कहानियों को अब अपनाना चाहती हैं, क्योंकि उनके किरदारों ने “मुझ पर तब भरोसा किया, जब मुझे खुद पर भरोसा नहीं था.”
वह एक बात साफ करती हैं, “आपके दिमाग में कहानियां होना समस्या नहीं है. समस्या तब है जब आप उन कहानियों के आदी (लती) हो जाते हैं. और यही फ़र्क है, जो सोशल मीडिया पर ज़्यादातर लोग समझ नहीं पाते.”
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