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दिमागी नक्सल पर विवाद:आरएसएस से जुड़ी पत्रिका ने कांग्रेस को घेरा, सोनिया गांधी की एनएसी को लेकर क्या कहा? – Dimagi Naxal Controversy: What Did Rss-linked Magazine Claim About Sonia Gandhi Nac?

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Aug 28, 2026


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिमागी नक्सल वाले बयान के बाद यह शब्द अब राजनीतिक बहस के केंद्र में है। इसी बीच आरएसएस से जुड़ी पत्रिका ऑर्गनाइजर के ताजा अंक में प्रकाशित संपादकीय में कांग्रेस पर सीधा निशाना साधा गया है। संपादकीय में सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली तत्कालीन यूपीए सरकार की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद यानी एनएसी को शासन व्यवस्था पर ‘दिमागी नक्सलों’ के ‘क्लासिक टेकओवर’ का उदाहरण बताया गया है। यह टिप्पणी पत्रिका के संपादक प्रफुल्ल केतकर ने अपने लेख में की है।

दिमागी नक्सल से क्या मतलब बताया गया है?

दिमागी नक्सल ऐसे लोगों को बताया गया है, जो शहरों में गुप्त तरीके से काम करते हैं और छात्रों, महिलाओं, मजदूरों, किसानों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यकों के नाम पर अलग-अलग संगठन बनाते हैं। संपादकीय में माओवादी दस्तावेजों का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि जहां अपने संगठन के जरिए काम करने की जगह नहीं मिलती, वहां ऐसे लोग दूसरे संगठनों में प्रवेश कर उनके एजेंडे को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। संपादकीय में इस पूरी गतिविधि को बेहद गुप्त तरीके से किए जाने का आरोप लगाया गया है।

सोनिया गांधी की एनएसी पर क्या आरोप लगाया गया?

प्रफुल्ल केतकर ने कहा कि सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद शासन व्यवस्था पर दिमागी नक्सलों के कब्जे का ‘क्लासिक टेकओवर’ थी। उन्होंने आरोप लगाया कि नौकरशाही, नीति बनाने वाली व्यवस्था, कानूनी तंत्र, शिक्षा जगत, मीडिया और गैर सरकारी संगठनों में प्रभाव बनाने की कोशिश कथित ‘क्रांतिकारी रणनीति’ का हिस्सा है। ये आरोप संपादकीय में किए गए हैं और इसी आधार पर एनएसी को लेकर टिप्पणी की गई है।

बिना हथियार के कैसे काम करने का दावा किया गया?

संपादकीय में दावा किया गया कि ‘दिमागी नक्सल’ हथियार नहीं उठाते, बल्कि प्रतिष्ठित इतिहासकार, बुद्धिजीवी, साहित्यकार, कानून विशेषज्ञ, मानवाधिकार कार्यकर्ता, स्वतंत्र पत्रकार, अभिनेता-अभिनेत्री और पर्यावरणविद जैसे पहचान वाले वर्गों के नाम का इस्तेमाल करते हैं। केतकर ने आरोप लगाया कि ऐसे लोग नागरिक समाज को संवैधानिक लोकतंत्र के खिलाफ प्रतिरोध के साधन के रूप में इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बताया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त को क्या कहा था?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए ‘दिमागी नक्सलों’ को लेकर चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि देश जंगलों में सशस्त्र नक्सलवाद को खत्म करने में सफल रहा है, लेकिन उसकी विचारधारा से जुड़े लोग हिंसा और अराजकता को बढ़ावा देने के लिए नए अवसर तलाश सकते हैं। प्रधानमंत्री ने लोगों से ऐसे लोगों को पहचानने और अलग-थलग करने की अपील की थी। इसके बाद ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर राजनीतिक बहस तेज हुई।

चिदंबरम ने मोदी के बयान पर क्या जवाब दिया था?

प्रधानमंत्री के बयान के अगले दिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने मोदी की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया दी थी। चिदंबरम ने सोशल मीडिया पर कहा था कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है। ऑर्गनाइजर के संपादकीय में इसे प्रधानमंत्री के बयान के जवाब के तौर पर देखा गया है। प्रफुल्ल केतकर ने कहा कि कुछ लोगों ने दिमागी नक्सल शब्द पर सवाल उठाए और इसे बुद्धिजीवियों के खिलाफ बताया, जबकि कुछ लोगों ने इसे विरोध के एक तरीके के तौर पर स्वीकार किया।

अब इस मुद्दे को लेकर क्या अपील की गई है?

केतकर ने कहा कि दिमागी नक्सल से पैदा होने वाले खतरे को समझना और एजेंसियों तथा सुरक्षा बलों के साथ मिलकर ऐसे लोगों की पहचान करना और उन्हें सामने लाना राष्ट्रीय कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में नागरिकों को इसी जिम्मेदारी के प्रति जागरूक करने की कोशिश की। संपादकीय में दावा किया गया कि सशस्त्र विद्रोह के विफल होने के बाद उसका दिमागी रूप सक्रिय हो गया है। इस टिप्पणी के साथ दिमागी नक्सल को लेकर राजनीतिक टकराव और तेज होने के संकेत हैं।

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