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नज़र न आने वाला कैमरा: कहीं आप तो एआई स्मार्ट चश्मों से चोरी-छिपे रिकॉर्ड नहीं हो रहे हैं

Byadmin

Sep 20, 2026


अक्सर जिन लोगों का वीडियो बनाया जाता है, उन्हें इसकी जानकारी नहीं होती और न ही उनसे इजाज़त ली जाती है.

इमेज स्रोत, Joan Cros/NurPhoto via Getty Images

इमेज कैप्शन, अक्सर जिन लोगों का वीडियो बनाया जाता है, उन्हें इसकी जानकारी नहीं होती और न ही उनसे इजाज़त ली जाती है

दिल्ली में रहने वाले 29 साल के ट्रांसजेंडर स्काई को एआई स्मार्ट चश्मे से उनकी जानकारी के बिना रिकॉर्ड किया गया था.

इस अनुभव के बारे में स्काई कहते हैं, “ऐसा लगा जैसे मैं फिर से स्कूल में हूं और मुझे परेशान किया जा रहा है. लेकिन इस बार यह सब बहुत बड़े स्तर पर हो रहा था.”

यह घटना अप्रैल की है. स्काई दिल्ली के जंतर-मंतर पर ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन क़ानून, 2026 के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शन में शामिल होने गए थे.

स्काई के मुताबिक़, एक व्यक्ति उनके पास आया और उन्हें ‘अनिरुद्धाचार्य’ और ‘पूकी बाबा’ कहने लगा.

‘पूकी बाबा’ हिंदू धर्मगुरु अनिरुद्धाचार्य के लिए इंटरनेट पर इस्तेमाल होने वाला एक लोकप्रिय नाम है. स्काई को उस समय पता नहीं था कि उनकी रिकॉर्डिंग हो रही है.

वीडियो कैप्शन, द लेंस

‘सार्वजनिक जगहों पर मुझे हर समय डर लगने लगा’

बीबीसी ने ऐसे तीन लोगों से बात की, जिनका कहना है कि इस तरह की घटनाओं का उनकी मानसिक हालत पर गंभीर असर पड़ा.

इनमें कोलकाता की 35 साल की लेक्चरर बिदिशा भी शामिल हैं.

बिदिशा की शिकायत पर एक व्यक्ति को गिरफ़्तार भी किया गया है. माना जा रहा है कि भारत में इस तरह की घटना को लेकर दर्ज हुआ यह पहला पुलिस मामला हो सकता है.

11 जून की शाम बिदिशा शहर की एक कम रोशनी वाली गली से अपने घर जा रही थीं. उसी समय एक व्यक्ति ने उनका रास्ता रोक लिया.

उसने बिदिशा की तारीफ़ की, उनका इंस्टाग्राम अकाउंट मांगा और उनसे बात करने की ज़िद करने लगा.

बिदिशा ने दिलचस्पी नहीं दिखाई, लेकिन वह व्यक्ति लगातार उनके पीछे पड़ा रहा. आख़िरकार बिदिशा वहां से निकलने में सफल रहीं.

बिदिशा ने बीबीसी से कहा, “उसके हाथ में ऐसा कोई कैमरा या दूसरा उपकरण दिखाई नहीं दे रहा था, जिससे मुझे लगे कि वह रिकॉर्डिंग कर रहा है.”

अगले दिन बिदिशा के एक स्टूडेंट ने उन्हें बताया कि इस मुलाक़ात का वीडियो इंस्टाग्राम पर घूम रहा है.

बिदिशा को पता चला कि उस व्यक्ति ने पीछे से उनका पीछा करते हुए चोरी-छिपे रिकॉर्डिंग शुरू कर दी थी. उसने दोनों के बीच हुई पूरी बातचीत रिकॉर्ड की थी.

उसने बाद में वीडियो को एडिट कर दिया. वीडियो से वे हिस्से हटा दिए गए, जिनमें वह लगातार बिदिशा के पीछे पड़ रहा था और बिदिशा असहज दिखाई दे रही थीं.

एडिट किए गए वीडियो को देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे दोनों अपनी मर्ज़ी से आराम से बात कर रहे हों.

बीबीसी ने ऐसे तीन लोगों से बात की, जिनका कहना है कि इस तरह की घटनाओं का उनकी मानसिक हालत पर गंभीर असर पड़ा.

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इमेज कैप्शन, बीबीसी ने ऐसे तीन लोगों से बात की, जिनका कहना है कि इस तरह की घटनाओं का उनकी मानसिक हालत पर गंभीर असर पड़ा

वीडियो बनाने वाले व्यक्ति ने इसे “उम्र में बड़ी महिलाओं से कैसे बात शुरू करें” सिखाने वाले वीडियो के तौर पर पोस्ट किया था.

वीडियो के कमेंट सेक्शन में कई पुरुषों ने बिदिशा के शरीर और शक्ल-सूरत पर टिप्पणियां कीं.

कई लोगों ने वीडियो बनाने वाले व्यक्ति से पूछा कि सड़क पर महिलाओं से बात करने के लिए उससे “कोचिंग” कैसे ली जा सकती है.

बिदिशा को अपने दोस्तों के बताने के बाद पता चला कि उस व्यक्ति ने स्मार्ट चश्मा पहन रखा था.

बिदिशा सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं करतीं. इसलिए उन्होंने शुरुआत में न तो वीडियो देखा और न ही उस पर आए कमेंट पढ़े. पहले उन्हें मामला इतना गंभीर भी नहीं लगा.

लेकिन कई दोस्तों और स्टूडेंट ने उन्हें वीडियो पर आए परेशान करने वाले कमेंट के बारे में बताया.

उन्होंने यह भी बताया कि वीडियो बनाने वाला व्यक्ति इसे सोशल मीडिया पर डालकर पैसे कमा सकता है. इसके बाद बिदिशा को मामले की गंभीरता समझ आई.

उन्होंने कहा, “मुझे सबसे ज़्यादा परेशानी इस बात से हुई कि यह महिलाओं को एक चीज़ समझने वाले किसी महिला-विरोधी ‘पिक-अप आर्टिस्ट’ की योजना का हिस्सा था.”

अगस्त में एक सार्वजनिक जगह पर एक और युवक हाथ में फ़ोन लेकर बिदिशा के पास आया.

बिदिशा को डर लगा कि कहीं दोबारा उनकी चोरी-छिपे रिकॉर्डिंग तो नहीं की जा रही. वह वहां से भाग गईं.

इसके बाद उन्होंने पुलिस के पास जाने का फ़ैसला किया. लेकिन पुलिस में शिकायत दर्ज कराना भी आसान नहीं था.

बिदिशा के मुताबिक़, पुलिस शुरुआत में एफ़आईआर दर्ज करने को तैयार नहीं थी.

पुलिस ने उनसे पूछा कि क्या वह शादीशुदा हैं और क्या वह आरोपी को पहले से जानती थीं.

कई घंटे तक कोशिश करने के बाद आख़िरकार उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज हुई.

उस पर ग़लत तरीक़े से रास्ता रोकने, चोरी-छिपे देखने या रिकॉर्डिंग करने और पीछा करने के आरोप लगाए गए.

मामले की जांच कर रहे पुलिस अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि एफ़आईआर दर्ज होने के कुछ दिन बाद अभियुक्त को गिरफ़्तार कर लिया गया.

उसे एक दिन के लिए पुलिस हिरासत में रखा गया. इसके बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया और बाद में ज़मानत पर रिहा कर दिया गया.

चोरी-छिपे रिकॉर्डिंग पर कोई ख़ास क़ानून नहीं

नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाली मीशी चौधरी ने बीबीसी से कहा कि एआई चश्मों का ग़लत इस्तेमाल हो सकता है.

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इमेज कैप्शन, नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वालीं मीशी चौधरी ने बीबीसी से कहा कि एआई चश्मों का ग़लत इस्तेमाल हो सकता है

टेक्नोलॉजी से जुड़े मामलों की वकील और इंटरनेट पर नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वालीं मीशी चौधरी ने बीबीसी से कहा कि एआई चश्मों का ग़लत इस्तेमाल हो सकता है.

इसके बावजूद भारत के मौजूदा क़ानून ऐसी चोरी-छिपे रिकॉर्डिंग से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं.

उनके मुताबिक़, ऐसी रिकॉर्डिंग करना “अक्सर बहुत ग़लत होता है, लेकिन क़ानून में इसे साफ़ तौर पर अपराध नहीं माना गया है.”

उन्होंने कहा कि वीडियो में क्या दिखाया गया है, इसके आधार पर मानहानि, चोरी-छिपे देखने या रिकॉर्डिंग करने, पीछा करने और आपराधिक धमकी जैसे अपराधों का मामला बन सकता है.

लेकिन किसी सार्वजनिक जगह पर चोरी-छिपे रिकॉर्डिंग करने से साफ़ तौर पर रोकने वाला कोई ख़ास क़ानून नहीं है.

इसी वजह से निजता के उल्लंघन से जुड़े ऐसे मामले क़ानूनी रूप से ऐसी स्थिति में फंस जाते हैं, जहां यह साफ़ नहीं होता कि किस क़ानून के तहत कार्रवाई की जाए.

वहीं, ऐसी घटनाओं का सामना करने वाले लोगों पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है.

बिदिशा कहती हैं कि इस घटना के बाद उन्हें हर समय डर और शक रहने लगा. अब सार्वजनिक जगहों पर जाने से भी उन्हें घबराहट होती है.

वीडियो कैप्शन, ऐसे हो रही है एआई रोबोट्स की ट्रेनिंग

वीडियो हटवाने की मुश्किल

चोरी-छिपे रिकॉर्डिंग का सामना करने वाले तीनों लोगों ने बीबीसी से कहा कि सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म से ऐसे वीडियो हटवाना बेहद मुश्किल था.

मेटा के नियम उत्पीड़न की इजाज़त नहीं देते.

लेकिन इंस्टाग्राम पर किसी पोस्ट की शिकायत करते समय निजता के उल्लंघन या स्मार्ट चश्मे से बिना सहमति रिकॉर्डिंग की कोई अलग कैटेगरी नहीं है.

इस वजह से लोगों को अपनी शिकायत “बुलीइंग और उत्पीड़न” की कैटेगरी में दर्ज करनी पड़ती है.

स्काई और शुबनम ने इंस्टाग्राम पर शिकायत दर्ज की थी कि उनके वीडियो प्लेटफ़ॉर्म के नियमों का उल्लंघन करते हैं.

इसके बावजूद दोनों वीडियो करीब एक महीने तक ऑनलाइन रहे.

मुंबई की राती फ़ाउंडेशन के दख़ल के बाद ही मूल अकाउंट से दोनों वीडियो हटाए गए.

राती फ़ाउंडेशन महिलाओं, बच्चों और कमज़ोर समझे जाने वाले लैंगिक समुदायों के लिए सुरक्षित जगह बनाने का काम करता है.

मेटा का सुरक्षा साझेदार होने के कारण इस संस्था के पास शिकायत करने का एक अलग तरीक़ा मौजूद है. इसी के ज़रिए वीडियो हटवाए जा सके.

हालांकि, इन वीडियो के एडिट किए गए कई रूप अब भी सोशल मीडिया पर मौजूद हैं.

बिदिशा वाला वीडियो दो महीने से ज़्यादा समय तक ऑनलाइन रहा. इस दौरान उसे 25 लाख बार देखा गया.

उनके दोस्तों ने इंस्टाग्राम पर शिकायत की थी कि वीडियो उसके नियमों का उल्लंघन करता है. इसके बाद भी वीडियो नहीं हटाया गया.

जब बिदिशा पुलिस के पास गईं और एक पुलिस अधिकारी ने वीडियो बनाने वाले व्यक्ति को सीधे फ़ोन किया, तब उसने वीडियो हटाया.

पुणे में एक नाबालिग की रिकॉर्डिंग

वीडियो पोस्ट करने वाले अकाउंट अब भी सक्रिय हैं, ऐसे में कार्रवाई मुश्किल हो जाती है.

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इमेज कैप्शन, वीडियो पोस्ट करने वाले अकाउंट अब भी सक्रिय हैं, ऐसे में कार्रवाई मुश्किल हो जाती है

पुणे में हुई एक दूसरी घटना में दो किशोर लड़कियों की एआई चश्मे से उनकी सहमति के बिना रिकॉर्डिंग की गई थी. इनमें एक नाबालिग थी.

राती फ़ाउंडेशन ने तीन दिन के भीतर यह वीडियो हटवा दिया.

हालांकि, ऐसे वीडियो पोस्ट करने वाले अकाउंट अब भी सक्रिय हैं.

वे आसपास मौजूद लोगों की सहमति के बिना स्मार्ट चश्मे से रिकॉर्ड किए गए लगने वाले वीडियो लगातार अपलोड कर रहे हैं. इन वीडियो को लाखों बार देखा जा रहा है.

इनमें से दो अकाउंट के इंस्टाग्राम पर इस समय 3.9 लाख से 4.4 लाख तक फ़ॉलोअर हैं.

इनमें एक अकाउंट ने ट्रांसजेंडर लोगों का वीडियो पोस्ट किया था. दूसरे अकाउंट ने पुणे की किशोर लड़कियों का वीडियो डाला था.

बिदिशा का वीडियो पोस्ट करने वाले अकाउंट के भी 10 हज़ार से ज़्यादा फ़ॉलोअर हैं.

छाया राजपूत मुंबई की संस्था पॉइंट ऑफ़ व्यू की डिजिटल अधिकार हेल्पलाइन की सह-प्रबंधक हैं. यह संस्था इंटरनेट पर लैंगिक बराबरी और न्याय के लिए काम करती है.

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पोस्ट की अपने आप जांच करने वाले सिस्टम अक्सर भारत में निजता के उल्लंघन के सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ को नहीं समझ पाते.

ये सिस्टम आमतौर पर यौन सामग्री या नग्नता जैसे गंभीर उल्लंघन को ही पहचानकर हटाते हैं.

लेकिन सामान्य दिखाई देने वाली किसी पोस्ट के कारण भी किसी महिला या किसी व्यक्ति को बड़े स्तर पर उत्पीड़न का सामना करना पड़ सकता है.

वीडियो कैप्शन, क्या एआई इंसानों के हाथ से निकल सकता है? एआई स्लोडाउन क्या है और इसमें चीन का क्या कनेक्शन है?

‘सिर्फ़ दिखावे की खानापूर्ति’

इंस्टाग्राम और फ़ेसबुक की मालिक कंपनी मेटा का कहना है कि उसके एआई चश्मों को बनाते समय शुरू से ही निजता का ध्यान रखा गया है.

मेटा के एक प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया, “हर चश्मे में रिकॉर्डिंग बताने वाली एक एलईडी लाइट लगी है. फ़ोटो या वीडियो बनाते समय यह लाइट जलती-बुझती है.”

“फ़ोटो या वीडियो को बाद में सेव या शेयर किया जा सकता है. इस लाइट को बंद नहीं किया जा सकता. अगर कोई इसे ढकता है या ख़राब करता है, तो कैमरा काम करना बंद कर देता है.”

जुलाई में इंस्टाग्राम के प्रमुख एडम मोसेरी ने कहा, “अगर आप लोगों का फ़ायदा उठाने और उन्हें परेशान करने वाला वीडियो पोस्ट करते हैं, तो हम उसे हटा देंगे.”

“हम नहीं चाहते कि लोग चोरी-छिपे दूसरों के वीडियो बनाएं, उन्हें परेशान करें और फिर ऐसे वीडियो हमारे प्लेटफ़ॉर्म पर पोस्ट करें.”

मेटा ने बीबीसी को दिए बयान में दावा किया कि उसने “नियमों का उल्लंघन करने वाले हज़ारों वीडियो और पोस्ट हटाए हैं.”

कंपनी ने यह भी कहा कि उसने इस तरह के वीडियो से जुड़े सर्च शब्दों और हैशटैग को ब्लॉक किया है. इनमें ‘रिज़’, ‘पिक-अप आर्टिस्ट’ और ‘कोल्ड अप्रोच’ जैसे शब्द शामिल हैं.

हालांकि, शुबनम ने एलईडी लाइट को कंपनियों की ज़िम्मेदारी से बचने के लिए की गई “सिर्फ़ दिखावे की खानापूर्ति” बताया.

उन्होंने कहा, “चश्मे के एक कोने में लगी छोटी-सी सफ़ेद लाइट को पहचानने के लिए अब आपसे यह उम्मीद की जा रही है कि आप अपना पूरा ध्यान हर व्यक्ति के चश्मे को देखने और समझने में लगा दें.”

मेटा के चश्मे में लगी एलईडी लाइट को लेकर किए गए दावों पर पिछले महीने द गार्डियन में छपी एक रिपोर्ट ने भी सवाल उठाए हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक़, अमेरिका में कई ऑनलाइन सर्विस देने वाले पैसे लेकर मेटा के चश्मे की एलईडी लाइट को बंद कर देते हैं.

मेटा ने कहा कि वह एक नया “टैम्पर डिटेक्शन अपडेट” जारी कर रही है. इसकी घोषणा अगस्त में की गई थी.

कंपनी के मुताबिक़, यह अपडेट उन कोशिशों को रोकने के लिए है, जिनमें लोग पहले रिकॉर्डिंग शुरू करते हैं और फिर रिकॉर्डिंग बताने वाली एलईडी लाइट को ढक देते हैं.

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि मेटा के अलावा दूसरी कंपनियों के एआई चश्मों में वह सफ़ेद लाइट न हो, जिसे मेटा सुरक्षा का ज़रिया बताती है.

इस समय मेटा के अलावा दूसरी कंपनियों के सबसे सस्ते एआई चश्मे की क़ीमत करीब 11 हज़ार रुपये है.

मेटा के सबसे सस्ते एआई चश्मे की क़ीमत करीब 22 हज़ार रुपये है. इससे यह तकनीक लगातार अधिक लोगों की पहुंच में आ रही है.

भारत में कितने लोगों के पास स्मार्ट चश्मे हैं, इसकी सही संख्या अभी पता नहीं है.

हालांकि, रिसर्च और कंसल्टिंग संस्था साइबरमीडिया रिसर्च की इंडिया स्मार्ट ग्लासेज़ मार्केट रिव्यू फ़ॉर सीवाई 2025 रिपोर्ट का अनुमान है कि 2030 तक भारत में स्मार्ट चश्मों का बाज़ार 32 लाख से ज़्यादा यूनिट का हो जाएगा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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