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क्या अच्छी नींद का मतलब हर रात आठ घंटे सोना है? अगर कोई व्यक्ति पर्याप्त देर तक सोने के बाद भी दिन में थका हुआ महसूस करता है, तो उसे किन बातों पर ध्यान देना चाहिए?
बीबीसी न्यूज़ हिंदी के एडिटर नितिन श्रीवास्तव ने एक पॉडकास्ट में दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के स्लीप मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉ. संजय मनचंदा से नींद से जुड़े सवाल पूछे.
डॉ. संजय मनचंदा ने कहा कि नींद के घंटों के साथ-साथ उसका नियमित होना और नींद कैसी ली, ये भी अहम है.
बातचीत में अलग-अलग उम्र में नींद की ज़रूरत, खर्राटों के साथ सांस रुकने की समस्या, दिन की झपकी, मोबाइल फ़ोन और सोने से पहले की आदतों पर चर्चा हुई.

क्या हर व्यक्ति को आठ घंटे सोना चाहिए?
डॉ. मनचंदा कहते हैं कि आठ घंटे की नींद को हर व्यक्ति के लिए तय नियम नहीं मानना चाहिए. उनके मुताबिक हर व्यक्ति को अलग-अलग समय तक सोने की ज़रूरत हो सकती है.
डॉ. मनचंदा बड़े लोगों के लिए लगभग छह से नौ घंटे की नींद की बात करते हैं, लेकिन कहते हैं कि अच्छी नींद को सिर्फ़ घंटों से नहीं समझा जा सकता.
इसके लिए वह तीन बातें बताते हैं. आप कितनी देर सोए, रोज़ सोने और उठने का समय कितना एक जैसा रहा, और नींद के अलग-अलग हिस्से कैसे रहे.
वह उदाहरण देते हैं कि अगर कोई व्यक्ति एक दिन रात 11 बजे सोता है और अगले दिन रात दो बजे, तो यह भी देखना होगा कि उसके सोने का समय बार-बार क्यों बदल रहा है.
इंटरव्यू में डॉ. मनचंदा यह भी कहते हैं कि आठ घंटे वाली बात लोगों के बीच फैलाने में गद्दे बनाने वाली एक कंपनी की भूमिका थी. बातचीत में उन्होंने उस कंपनी या किसी अध्ययन का नाम नहीं बताया.
नींद के अलग-अलग हिस्से क्या हैं?
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डॉ. मनचंदा बताते हैं कि पूरी रात की नींद एक जैसी नहीं होती. कभी हल्की नींद आती है, कभी गहरी नींद और एक हिस्सा ऐसा होता है जिसमें आम तौर पर सपने आते हैं.
सपनों से जुड़े इस हिस्से को आरईएम स्लीप कहा जाता है. आरईएम का मतलब है रैपिड आई मूवमेंट, यानी इस दौरान आंखों में तेज़ हलचल होती है. डॉक्टर के मुताबिक यह हिस्सा याद रखने की प्रक्रिया में काम आता है. वहीं वह गहरी नींद को शरीर की मरम्मत और बच्चों के बढ़ने से जोड़ते हैं.
डॉ. मनचंदा बातचीत में कहते हैं कि आरईएम नींद आम तौर पर पूरी नींद का लगभग 20 प्रतिशत होती है. उनके मुताबिक अगर यह बहुत बढ़ जाए तो गहरी नींद का समय कम हो सकता है.
उम्र के साथ नींद कैसे बदलती है?
डॉ. मनचंदा के मुताबिक़, जन्म के बाद शुरुआती महीनों में बच्चा दिन और रात में कई बार सोता है और दूध पीने के लिए बीच में जागता है. जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसके सोने और जागने का एक क्रम बनने लगता है.
वह शुरुआती महीनों में लगभग 16 से 20 घंटे, उसके बाद छोटे बच्चों के लिए लगभग 12 से 14 घंटे और स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए क़रीब 10 से 11 घंटे की नींद की बात करते हैं.
किशोर उम्र की बात करते हुए वह कहते हैं कि स्कूल बहुत जल्दी शुरू होने पर कई बच्चों को पूरी नींद नहीं मिल पाती. अगर बच्चा सुबह जल्दी उठता है लेकिन रात को समय से नहीं सो पाता, तो उसके पास सोने के लिए कम वक्त बचता है.
बुज़ुर्गों के बारे में डॉ. मनचंदा कहते हैं कि उनकी नींद कभी-कभी एक बार में लंबी आने के बजाय अलग-अलग समय पर आती है. कुछ लोग रात को सोने के साथ-साथ दोपहर में भी सोते हैं.
उनके मुताबिक़, दिन में व्यक्ति कैसा महसूस करता है, यह भी उसकी नींद के बारे में बहुत कुछ बताता है. अगर दिन भर थकान बनी रहती है या बैठे-बैठे नींद के झटके आते हैं, तो रात की नींद पर ध्यान देना चाहिए.
कम या ज़्यादा सोने पर क्या असर होता है?
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डॉ. मनचंदा कहते हैं कि लगातार कम सोने पर किसी काम में ध्यान लगाना मुश्किल हो सकता है और काम भी पहले जैसा नहीं हो पाता. वह बताते हैं कि इसकी वजह सोने-जागने की आदतें भी हो सकती हैं और नींद से जुड़ी कोई बीमारी भी.
बातचीत में उन्होंने नींद से जुड़ी 80 से अधिक तरह की समस्याओं की बात की. उनके मुताबिक अगर कोई व्यक्ति सुबह उठकर तरोताज़ा महसूस नहीं करता या दिन में बार-बार नींद आती है, तो उसे यह देखना चाहिए कि वह कितना सो रहा है और कैसी नींद आ रही है.
वह नौ घंटे से अधिक सोने और सेहत से जुड़ी समस्याओं के बीच शोध में मिले संबंध की बात भी करते हैं. इंटरव्यू में उन्होंने इसके लिए किसी ख़ास अध्ययन का नाम नहीं बताया.
खर्राटे कब चिंता की बात हैं?
डॉ. मनचंदा कहते हैं कि खर्राटों की आवाज़ तब आती है जब सोते समय सांस के रास्ते में कंपन होता है. उनके मुताबिक तालू और ज़बान के पिछले हिस्से की बनावट, छोटा या पीछे की ओर स्थित निचला जबड़ा और गर्दन की बनावट इसमें भूमिका निभा सकते हैं.
वह कहते हैं कि यह परेशानी केवल अधिक वज़न वाले लोगों को नहीं होती. कम वज़न वाले व्यक्ति को भी खर्राटे आ सकते हैं.
डॉक्टर के मुताबिक़, केवल खर्राटे आना और खर्राटों के साथ सांस बार-बार रुकना, दोनों अलग बातें हैं. अगर सोते समय सांस रुकती है और दिन में थकान या नींद भी महसूस होती है, तो इसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए.
डॉ. मनचंदा एक बार में लगभग दस सेकंड तक सांस रुकने और एक घंटे में ऐसा कई बार होने की बात करते हैं. उनका कहना है कि नींद में सांस की समस्या का संबंध रक्तचाप, दिल की धड़कन की गड़बड़ी और सेहत की दूसरी समस्याओं से हो सकता है. ऐसे लक्षणों की जांच कराई जा सकती है.
गाड़ी चलाते समय नींद आए तो?
डॉ. मनचंदा बातचीत में नींद के झटके के साथ गाड़ी चलाने का ख़तरा बताते हैं. उनका कहना है कि व्यक्ति को लग सकता है कि वह जाग रहा है, लेकिन कुछ सेकंड के लिए नींद आना भी सड़क पर ख़तरनाक हो सकता है.
वह कहते हैं कि सड़क और कारख़ानों में होने वाली दुर्घटनाओं का एक हिस्सा नींद की कमी से जुड़ा है.
वह कहते हैं कि अगर गाड़ी चलाते समय नींद महसूस हो तो गाड़ी सुरक्षित जगह रोकें और थोड़ी देर आराम करें. उनके मुताबिक़, केवल आंखें खुली रखने या कॉफ़ी पीने के भरोसे गाड़ी चलाते रहना ठीक नहीं है.
क्या दिन की छोटी झपकी मदद करती है?
डॉ. मनचंदा के मुताबिक लगभग 20 से 25 मिनट की झपकी के बाद कुछ लोग तरोताज़ा महसूस करते हैं. वह कहते हैं कि झपकी बहुत लंबी हो जाए, तो जागने के बाद कुछ देर लोगों को सिर भारी लग सकता है या समझने में थोड़ा वक्त लग सकता है कि आसपास क्या हो रहा है.
उनके मुताबिक छोटी झपकी कुछ लोगों को दिन के अगले हिस्से में काम करने में मदद कर सकती है. हालांकि, वह इसे हर व्यक्ति की रात की नींद का विकल्प नहीं बताते.
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मोबाइल फ़ोन नींद में कैसे बाधा डालता है?
बिस्तर पर जाते समय मोबाइल फ़ोन हाथ में रखने के सवाल पर डॉ. मनचंदा कहते हैं कि फ़ोन की रोशनी के साथ संदेश और नोटिफ़िकेशन भी व्यक्ति को जगाए रख सकते हैं.
वह कहते हैं कि जिन लोगों के लिए रात में फ़ोन उठाना ज़रूरी नहीं है, वे सोते समय उसे अपने से दूर रख सकते हैं. बातचीत में वह टीवी देखते-देखते सोने की आदत पर भी सवाल उठाते हैं.
उनके मुताबिक कभी व्यक्ति को नींद आने लगती है, लेकिन वह कार्यक्रम का बचा हुआ हिस्सा देखने के लिए जागता रहता है, बाद में उसे फिर से नींद आने में मुश्किल महसूस हो सकती है.
नींद न आए तो बिस्तर पर पड़े रहें या उठ जाएं?
डॉ. मनचंदा कहते हैं कि बिस्तर पर तब जाना चाहिए जब नींद महसूस हो. उनके मुताबिक लगातार बिस्तर पर जागते हुए करवट बदलने से व्यक्ति के मन में यह बात बैठ सकती है कि उसे नींद नहीं आएगी.
वह ऐसी स्थिति में कुछ देर आराम से बैठने और नींद आने पर बिस्तर पर लौटने की बात करते हैं. वह यह सलाह भी देते हैं कि व्यक्ति रोज़ लगभग एक ही समय पर उठने की कोशिश करे, भले ही पिछली रात देर से सोया हो.
रात में बार-बार घड़ी देखने से भी बचने को कहते हैं. उनके मुताबिक समय देखते रहने से नींद न आने की चिंता और बढ़ सकती है.

चाय, कॉफ़ी और शराब के बारे में डॉक्टर क्या कहते हैं?
डॉ. मनचंदा कहते हैं कि जिन लोगों को सोने में परेशानी होती है, वे शाम के समय चाय और कॉफ़ी पीने पर ध्यान दें. बातचीत में वह निकोटीन को भी नींद में बाधा डालने वाली चीज़ बताते हैं.
शराब के बारे में उनका कहना है कि उससे शुरू में नींद महसूस हो सकती है, लेकिन रात भर नींद बनी रहने में परेशानी आ सकती है. इसलिए वह शराब को सोने के उपाय की तरह इस्तेमाल करने के ख़िलाफ़ हैं.
वह सोने के बहुत क़रीब तेज़ कसरत करने से भी बचने की सलाह देते हैं. उनके मुताबिक शरीर को सोने से पहले आराम की हालत में आने का समय मिलना चाहिए.
अंधेरे में सोना चाहिए या रोशनी में?
डॉ. मनचंदा कहते हैं कि सोने के कमरे का तापमान ऐसा हो जिसमें आपको आराम महसूस हो. कमरा बहुत ठंडा न हो, लेकिन हल्का ठंडा कमरा कुछ लोगों के लिए बेहतर हो सकता है.
वह अंधेरे और शरीर में बनने वाले मेलाटोनिन के बीच संबंध की बात करते हैं. साथ ही कहते हैं कि कुछ लोगों को पूरी तरह अंधेरे में सोना अच्छा नहीं लगता. अगर हल्की रोशनी से उनकी नींद ख़राब नहीं होती, तो उनके मुताबिक इसमें कोई परेशानी नहीं है.
बाज़ार में मिलने वाले मेलाटोनिन के बारे में डॉ. मनचंदा सलाह देते हैं कि नींद न आने पर उसे अपने आप रोज़ लेना शुरू न करें. वह लंबी हवाई यात्रा के बाद समय बदलने से होने वाली परेशानी और काम की शिफ़्ट बदलने जैसी स्थितियों में इसके इस्तेमाल की बात करते हैं.
बातचीत में वह यह भी कहते हैं कि बाहर से लगातार मेलाटोनिन लेने पर शरीर के अपने मेलाटोनिन बनाने और उसके असर पर फ़र्क पड़ सकता है. यह इंटरव्यू में कही गई उनकी बात है.
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महिलाओं में नींद की समस्या पर डॉक्टर ने क्या बताया?
इंटरव्यू में नितिन श्रीवास्तव ने महिलाओं में नींद न आने की समस्या अधिक होने के बारे में सवाल पूछा. जवाब में डॉ. मनचंदा ने किसी ख़ास प्रतिशत या इसकी एक वजह की पुष्टि नहीं की.
इसके बजाय उन्होंने कहा कि उनके पास आने वाले कई लोग कहते हैं कि वे बिल्कुल नहीं सोए, हालांकि इसकी जांच हो तो ही कुछ और पता चल सकता है. उनके मुताबिक किसी व्यक्ति को कितनी देर नींद आई और उसे अपनी नींद कैसी लगी, इन दोनों बातों को अलग-अलग समझना ज़रूरी है.
वह बताते हैं कि ज़रूरत पड़ने पर नींद की जांच में यह देखा जाता है कि व्यक्ति कितनी देर हल्की या गहरी नींद में रहा. साथ ही सांस, दिल की धड़कन और शरीर में ऑक्सीजन का स्तर भी दर्ज किया जाता है.

खाने का नींद से क्या संबंध है?
डॉ. मनचंदा कहते हैं कि अच्छी नींद के लिए ऐसा कोई एक खाना नहीं है जो सबके लिए काम करे. वह बातचीत में कीवी फल का उदाहरण देते हैं, लेकिन उनकी मुख्य बात रात के खाने की मात्रा और समय को लेकर है.
उनके मुताबिक सोने के बहुत क़रीब भारी भोजन करने से पेट में भारीपन या एसिडिटी हो सकती है. वह रात के खाने और बिस्तर पर जाने के बीच करीब ढाई से तीन घंटे रखने की सलाह देते हैं.
इस पूरी बातचीत में डॉ. मनचंदा बार-बार एक बात पर लौटते हैं, नींद को सिर्फ़ आठ घंटे के हिसाब से नहीं समझा जा सकता. आप रोज़ किस समय सोते हैं, रात में नींद बार-बार टूटती है या नहीं, और दिन में लगातार थकान रहती है या नहीं, इन सब पर ध्यान देना चाहिए.
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