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पाकिस्तान, चीन या फिर कोई और… सिर्फ 100 किमी. रेंज के लिए भारत 52 हजार करोड़ रुपये क्यों कर रहा खर्च?

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Jul 5, 2026


डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। जब डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) ने लगभग 52,000 करोड़ रुपये की सैन्य खरीद के प्रस्तावों को मंजूरी दी तो पहली नजर में यह कोई सामान्य बात लगी लेकिन अगर इसको बारीकी से देखा जाए तो एक साफ पैटर्न नजर आता है।

पहले महंगे फाइटर जेट, युद्धपोत या लंबी दूरी की मिसाइल सिस्टम खरीदने पर जोर दिया जाता था लेकिन अब जिन हथियारों को मंजूरी मिली है वे मुख्य रूप से भविष्य की लड़ाई के शुरुआती घंटों में इस्तेमाल होने वाले हथियार हैं।

ऑपरेशन सिंदूर के कुछ महीनों बाद ही दी गई मंजूरी

एंटी-ड्रोन इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और कंधे से दागी जाने वाली एंटी-टैंक मिसाइलों से लेकर बहुत कम दूरी वाले एयर डिफेंस सिस्टम, कामिकेज ड्रोन और हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट्स (HAPS) तक डीएसी द्वारा मंजूर किए गए लगभग हर सिस्टम को युद्ध के मैदान के पास काम करने के लिए डिजाइन किया गया है। ये मंजूरी ऑपरेशन सिंदूर के कुछ ही महीनों बाद मिली हैं।

क्यों हो रही इसकी चर्चा?

ये मंजूरियां ऐसे समय में भी मिली हैं जब सेना पाकिस्तान और चीन के साथ दो मोर्चों पर संभावित युद्ध की तैयारी कर रही है। ये दोनों ही तेजी से अपनी सेना को आधुनिक बना रहे परमाणु-हथियार वाले पड़ोसी देश हैं।

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आधिकारिक तौर पर रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि इन खरीद का मकसद सेना, नौसेना और वायु सेना की ऑपरेशनल क्षमता को बढ़ाना है लेकिन अगर इन सबको मिलाकर देखें तो खरीद की यह लिस्ट यह भी दिखाती है कि आधुनिक युद्ध के बारे में भारत की समझ कैसे बदल रही है।

मिलिट्री प्लानर्स का मानना है कि भविष्य की लड़ाई सिर्फ सैकड़ों किलोमीटर दूर उड़ने वाले फाइटर जेट या महाद्वीपों के बीच मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों से तय नहीं होगी। यह लड़ाई सैकड़ों सस्ते ड्रोन, सटीक निशाना लगाने वाली मिसाइलों, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, खुद से उड़ने वाले एयरक्राफ्ट और टैक्टिकल लेवल पर स्मार्ट हथियार लिए सैनिकों से भी तय होगी।

ऑपरेशन सिंदूर से लिया सबक

अगर कोई एक घटना थी जिसने 2026 में भारत के मिलिट्री मॉडर्नाइजेशन को तेज किया तो वह ऑपरेशन सिंदूर था। ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान ने एक साथ कई हवाई खतरों का इस्तेमाल किया, जिसमें छोटे ड्रोन से लेकर लंबी दूरी के हथियार शामिल थे, जिसमें फतह-II बैलिस्टिक मिसाइल भी शामिल थी।

सरकार के मुताबिक, भारत के लेयर्ड एयर डिफेंस नेटवर्क ने इन हमलों को मिलिट्री ठिकानों को बड़ा नुकसान पहुंचाने से पहले ही रोक दिया। ऑपरेशन में भारत के स्ट्रेटेजिक एसेट्स को निशाना बनाने की कोशिशें भी हुईं, जिसमें आदमपुर एयर फोर्स स्टेशन पर तैनात एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम भी शामिल था। खबर है कि भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम ने आने वाले खतरों को उनके टारगेट तक पहुंचने से पहले ही रोक दिया।

शायद इस लड़ाई से सबसे बड़ी सीख यह मिली कि भविष्य के युद्ध किसी एक हथियार पर निर्भर नहीं होंगे। इसके बजाय सेनाएं दुश्मन के डिफेंस को कमजोर करने के लिए ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन, क्रूज मिसाइल, रॉकेट, इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग सिस्टम और साइबर हमलों के कॉम्बिनेशन का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करेंगी।

यूक्रेन दिखा चुका है ये बदलाव

पश्चिम एशिया में भी संघर्ष चल रहे हैं। ईरानी ड्रोन, रूसी मिसाइल हमलों और इजरायली सटीक हमलों के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल ने यह दिखा दिया है कि पारंपरिक और असममित युद्ध के बीच का अंतर खत्म हो रहा है।

कम दूरी वाले हथियार क्यों जरूरी हैं?

एयरक्राफ्ट कैरियर, फाइटर जेट और पनडुब्बी जैसे बड़े प्लेटफॉर्म देश की सुरक्षा के लिए जरूरी बने हुए हैं। हालांकि, कई मिलिट्री एनालिस्ट का मानना है कि भविष्य की टैक्टिकल लड़ाइयों का नतीजा तय करने वाले हथियार ज्यादा छोटे, सस्ते और आसानी से तैनात किए जा सकने वाले होंगे।

आधुनिक एंटी-टैंक मिसाइल से लैस एक सैनिक करोड़ों की कीमत वाली बख्तरबंद गाड़ी को नष्ट कर सकता है। सस्ते ड्रोन का झुंड एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम को महंगी इंटरसेप्टर मिसाइलें इस्तेमाल करने पर मजबूर कर सकता है।

इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर इक्विपमेंट बिना एक भी गोली चलाए ड्रोन को बेकार कर सकते हैं। पोर्टेबल एयर डिफेंस मिसाइलें दुश्मन के विमानों को युद्ध के मैदान में आजादी से काम करने से रोक सकती हैं।

इससे पता चलता है कि डीएसी की कई मंजूरी उन सिस्टम पर केंद्रित हैं जो सैकड़ों के बजाय कुछ दस किलोमीटर के दायरे में काम करते हैं। सिर्फ रणनीतिक क्षमताओं में निवेश करने के बजाय भारत उस चीज को भी मजबूत कर रहा है जिसे मिलिट्री प्लानर अक्सर ‘टैक्टिकल एज’ (सामरिक बढ़त) कहते हैं।

दो बहुत अलग दुश्मनों से निपटने की तैयारी

भारत की मिलिट्री प्लानिंग अनोखी है क्योंकि उसे दो बिल्कुल अलग तरह के ऑपरेशनल माहौल के लिए तैयारी करनी पड़ती है। पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान से निपटने के लिए तेज गति वाले युद्धक्षेत्र की तैयारी करनी होती है, जहां बख्तरबंद गाड़ियां, तोपखाने, ड्रोन और सीमा पार से घुसपैठ जैसी चुनौतियां होती हैं।

उत्तरी सीमा पर चीन से निपटने की चुनौती ऊंचाई वाले इलाकों में युद्ध, एडवांस्ड सर्विलांस क्षमताएं, लंबी दूरी तक मार करने वाले रॉकेट आर्टिलरी और लगातार बेहतर होते अनमैन्ड सिस्टम (बिना पायलट वाले सिस्टम) से जुड़ी है।

हालांकि दोनों जगहों का भूगोल बहुत अलग है फिर भी दोनों मोर्चों पर एक जरूरत समान है। लगातार निगरानी, तेजी से टारगेट की पहचान और हवाई खतरों से कई स्तरों पर सुरक्षा। यही वजह है कि डीएसी की मंजूरी में एक साथ कई क्षेत्रों से जुड़ी चीजें शामिल होती हैं।

सेना को ऐसे सिस्टम मिलेंगे जो ड्रोन, हेलीकॉप्टर, टैंक और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों से फ्रंटलाइन यूनिट्स की सुरक्षा कर सकें।

वायु सेना को लंबे समय तक निगरानी करने वाले ऐसे प्लेटफॉर्म मिलेंगे जो हफ्तों तक युद्ध के मैदान के ऊपर बने रह सकें।

नौसेना बिना पायलट वाले सिस्टम का इस्तेमाल करके समुद्री रास्तों पर नजर रखने की अपनी क्षमता को मजबूत करेगी और साथ ही समुद्र में दुश्मन की आवाजाही रोकने की क्षमता को भी बेहतर बनाएगी।

सिर्फ एक सेना पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय इन खरीद का मकसद जमीन, समुद्र और हवा के बीच तालमेल को बेहतर बनाना है। ड्रोन के बढ़ते इस्तेमाल ने युद्ध के तरीके को बदल दिया है। खरीद की लिस्ट से जो सबसे साफ बात सामने आ रही है वह है ड्रोन का मुकाबला करने पर भारत का बढ़ता जोर।

एक दशक पहले ड्रोन को मुख्य रूप से खुफिया जानकारी इकट्ठा करने वाले साधन के तौर पर देखा जाता था। आज वे टोह लेने, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, सटीक हमले करने, टारगेट की पहचान करने और यहां तक कि आत्मघाती (कामिकेज) हमले करने का काम भी करते हैं।

आधुनिक लड़ाइयों ने यह दिखाया है कि कम कीमत वाले ड्रोन भी बख्तरबंद टुकड़ियों, लॉजिस्टिक्स हब, गोला-बारूद डिपो और एयर डिफेंस साइट्स के लिए खतरा बन सकते हैं। ड्रोन के झुंड (swarms) खास तौर पर चुनौतीपूर्ण हो गए हैं क्योंकि वे पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम पर भारी पड़ सकते हैं।

कुछ लाख रुपये की कीमत वाले ड्रोन को कई करोड़ रुपये की इंटरसेप्टर मिसाइल से नष्ट करना, लंबे समय तक चलने वाली लड़ाइयों में न तो किफायती है और न ही टिकाऊ। नतीजतन, दुनिया भर की सेनाएं ड्रोन को भौतिक रूप से नष्ट करने के बजाय उन्हें बाधित करने में सक्षम इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम में ज्यादा निवेश कर रही हैं।

‘आकाश तरंग’ एंटी-अनमैन्ड एरियल व्हीकल इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम खरीदने का भारत का फैसला इसी बदलाव को दर्शाता है। सिर्फ मिसाइलों या बंदूकों पर निर्भर रहने के बजाय, सशस्त्र बल एक ऐसी बहु-स्तरीय रणनीति बना रहे हैं जिसमें खतरे के आधार पर ड्रोन का पता लगाया जा सके, उन्हें जैम किया जा सके, इंटरसेप्ट किया जा सके या मार गिराया जा सके।

सुदर्शन चक्र का निर्माण

यह खरीद सरकार की उस व्यापक योजना के अनुरूप भी है जिसके तहत सुदर्शन चक्र नाम का एक एकीकृत राष्ट्रीय एयर डिफेंस आर्किटेक्चर विकसित किया जा रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद घोषित इस पहल का मकसद एक ऐसा राष्ट्रव्यापी सुरक्षा कवच बनाना है जो बैलिस्टिक मिसाइलों और क्रूज मिसाइलों से लेकर ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन तक हर तरह के खतरों का मुकाबला करने में सक्षम हो।

किसी एक मिसाइल सिस्टम पर आधारित पारंपरिक एयर डिफेंस नेटवर्क के विपरीत सुदर्शन चक्र में कई स्तरों को एकीकृत किए जाने की उम्मीद है। एस-400 जैसे लंबी दूरी के सिस्टम सैकड़ों किलोमीटर दूर से ही बड़े खतरों को इंटरसेप्ट करेंगे। मध्यम दूरी के सिस्टम ऑपरेशनल टुकड़ियों की सुरक्षा करेंगे।

कम दूरी की मिसाइलें और एंटी-ड्रोन सिस्टम महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे, एयर बेस और सैन्य टुकड़ियों की रक्षा करेंगे। इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम ड्रोन को उनके टारगेट तक पहुंचने से पहले ही बेअसर कर देंगे।

बड़े और महंगे हथियारों से आगे बढ़कर आधुनिकीकरण

कई दशकों तक, भारत की रक्षा खरीद मुख्य रूप से लड़ाकू विमानों, तोपों, टैंकों और पनडुब्बियों जैसे बड़े हथियारों पर केंद्रित रही। ये निवेश अभी भी जारी हैं। हालांकि, हालिया मंजूरियों से पता चलता है कि सशस्त्र बल अब ऐसी तकनीकों में ज्यादा निवेश कर रहे हैं जो मुश्किल हालात में टिके रहने की क्षमता, युद्ध के मैदान की जानकारी और रणनीतिक लचीलेपन को बेहतर बनाती हैं।

अब ध्यान सिर्फ ताकतवर हथियार खरीदने से हटकर एक ऐसी नेटवर्क वाली सेना बनाने पर है जो एक साथ कई खतरों का सामना कर सके। हाल ही में मिली मंजूरी में आधुनिक युद्ध के लगभग हर पहलू को शामिल किया गया है।

भले ही इन सिस्टम की भूमिका और तकनीक अलग-अलग हों, लेकिन इनका मकसद एक ही है भारतीय सेना को तेजी से बदलते युद्ध के मैदान में दुश्मन का पता लगाने, खुद को बचाने और सबसे पहले हमला करने में सक्षम बनाना। ऐसे युद्ध के मैदान में ड्रोन, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर उतने ही जरूरी हो गए हैं जितने टैंक और फाइटर जेट।

आकाश तरंग: बिना मिसाइल चलाए ड्रोन से मुकाबला

हाल की लड़ाइयों से एक बड़ा सबक यह मिला है कि हवा से होने वाले हर खतरे को मिसाइल से ही खत्म नहीं किया जाना चाहिए। आज के युद्धक्षेत्र सस्ते कमर्शियल क्वाडकॉप्टर, सर्विलांस ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन और झुंड में चलने वाले ड्रोन (स्वार्म ड्रोन) से भरे हुए हैं।

हर ड्रोन के खिलाफ महंगी इंटरसेप्टर मिसाइलें दागना न तो प्रैक्टिकल है और न ही किफायती। यहीं पर आकाश तरंग एंटी-अनमैन्ड एरियल व्हीकल इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम काम आता है। पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम के उलट आकाश तरंग एक सॉफ्ट-किल सिस्टम है।

ड्रोन को फिजिकली नष्ट करने के बजाय यह उन रेडियो फ्रीक्वेंसी और नेविगेशन सिग्नल को जाम कर देता है जो ड्रोन को उसके ऑपरेटर से जोड़ते हैं।

  • एक बार कम्युनिकेशन टूटने पर ड्रोन का कंट्रोल खत्म हो सकता है।
  • वह एक ही जगह पर हवा में रुका रह सकता है।
  • अपने लॉन्च पॉइंट पर वापस आ सकता है या अपनी प्रोग्रामिंग के आधार पर पूरी तरह क्रैश हो सकता है।

आकाश तरंग जैसे इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम के और भी अहम होने की उम्मीद है, क्योंकि भविष्य के युद्धक्षेत्रों में एक साथ सैकड़ों ड्रोन काम करते हुए दिखाई दे सकते हैं। इसलिए, यह सिस्टम सुरक्षा की पहली पंक्ति के तौर पर काम करता है और ज्यादा महंगी इंटरसेप्टर मिसाइलों को एयरक्राफ्ट या क्रूज मिसाइल जैसे बड़े खतरों के लिए बचाकर रखता है।

MR-SAM: भारत का मीडियम-रेंज सुरक्षा कवच

मीडियम रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल (MR-SAM) भारत के लेयर्ड एयर डिफेंस सिस्टम की रीढ़ है। इसे डीआरडीओ और इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (IAI) ने मिलकर विकसित किया है और भारत में भारत डायनामिक्स लिमिटेड (BDL) ने बनाया है। यह मिसाइल बराक-8 एयर डिफेंस हथियारों की श्रेणी पर आधारित है।

70 किलोमीटर से ज्यादा रेंज वाली MR-SAM एक साथ कई टारगेट को निशाना बना सकती है, जिनमें फाइटर जेट, हेलीकॉप्टर, अनमैन्ड एरियल व्हीकल (UAV) और क्रूज मिसाइलें शामिल हैं।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद आई रिपोर्टों से पता चला कि इस सिस्टम ने सिरसा के ऊपर पाकिस्तान की फतह-II बैलिस्टिक मिसाइल को भी इंटरसेप्ट किया था, जो जटिल हवाई खतरों से निपटने की इसकी क्षमता को दिखाता है।

छोटी दूरी के सिस्टम के उलट, जो अलग-अलग मिलिट्री यूनिट्स की सुरक्षा करते हैं MR-SAM पूरे इलाके की सुरक्षा करती है। यह एयर बेस, लॉजिस्टिक्स हब, कमांड सेंटर और रणनीतिक इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा करती है। यह भारत के विकसित हो रहे मल्टी-टियर एयर डिफेंस नेटवर्क की बीच की परत (मिडल लेयर) है।

V-SHORADS: हमले से पहले की ढाल

अगर MR-SAM बड़े इलाकों की सुरक्षा करता है तो वेरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम (V-SHORADS) आखिरी कुछ किलोमीटर की सुरक्षा करता है। अक्सर सुरक्षा की आखिरी पंक्ति कहे जाने वाले ये मैन-पोर्टेबल (आसानी से ले जाए जा सकने वाले) मिसाइल सिस्टम मिलिट्री कैंप, गोला-बारूद डिपो, रडार स्टेशन और दूसरी अहम जगहों के आस-पास तैनात किए जाते हैं।

इनका मुख्य काम कम ऊंचाई पर उड़ने वाले हेलीकॉप्टर, ड्रोन, अटैक एयरक्राफ्ट और क्रूज मिसाइलों को नष्ट करना है, जो एयर डिफेंस की बाहरी परतों से बचकर निकल आते हैं। कंधे से दागे जाने वाले मिसाइलों के उलट नई पीढ़ी के V-SHORADS में मल्टी-स्पेक्ट्रल सीकर का इस्तेमाल होता है, जो फ्लेयर्स जैसे काउंटरमेजर (बचाव के तरीकों) का सामना करने में सक्षम होते हैं।

इससे मुश्किल हालात में तेजी से चलने वाले टारगेट को नष्ट करने की संभावना काफी बढ़ जाती है। यह सिस्टम टैक्टिकल फ्लेक्सिबिलिटी (रणनीतिक लचीलापन) भी देता है क्योंकि इसे एक जगह फिक्स रखने के बजाय इन्फेंट्री यूनिट्स के साथ तेजी से कहीं भी ले जाया जा सकता है।

MPATGM: दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों का इन्फेंट्री से जवाब

मैन पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (MPATGM) हाल की लड़ाइयों से मिले एक और अहम सबक को दिखाती है। जमीनी लड़ाई में भारी टैंक अहम बने हुए हैं लेकिन छोटी इन्फेंट्री टीमों के पास मौजूद प्रिसिजन-गाइडेड हथियारों (सटीक निशाना लगाने वाले हथियारों) से उन्हें खतरा बढ़ गया है।

डीआरडीओ द्वारा डिजाइन और विकसित की गई तीसरी पीढ़ी की MPATGM सैनिकों को बिना किसी गाड़ी पर लगे लॉन्चर के दुश्मन के टैंकों पर हमला करने की सुविधा देती है। इस मिसाइल की रेंज लगभग चार किलोमीटर है और यह टॉप-अटैक प्रोफाइल का इस्तेमाल करती है।

टैंक के मजबूत बख्तरबंद सामने वाले हिस्से पर हमला करने के बजाय यह लॉन्च होने के बाद ऊपर उठती है और फिर पतली छत वाले बख्तरबंद हिस्से पर नीचे की ओर हमला करती है, जो आम तौर पर गाड़ी का सबसे कमजोर हिस्सा होता है।

यह हथियार पहाड़ी इलाकों, शहरी लड़ाई और बचाव वाले ऑपरेशन्स में खास तौर पर काम आता है, जहां पैदल सेना की टुकड़ियों का सामना दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों (आर्मर) से हो सकता है, जबकि उनके पास अपने टैंकों का सपोर्ट नहीं होता। इसके शामिल होने से पश्चिमी और उत्तरी दोनों सीमाओं पर भारत की एंटी-आर्मर क्षमता और मजबूत होगी।

एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम

आधुनिक टैंकों को न केवल दुश्मन के टैंकों से बल्कि एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलों, रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड और लॉइटरिंग म्यूनिशन से भी खतरा होता है। एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम (APS) इस समस्या का समाधान करता है। सिर्फ मोटे आर्मर पर निर्भर रहने के बजाय, एपीएस रडार और सेंसर का इस्तेमाल करके लगातार आसपास के इलाके को स्कैन करता रहता है।

जब कोई मिसाइल या रॉकेट आता हुआ दिखाई देता है तो सिस्टम अपने-आप एक काउंटरमेजर (बचाव का तरीका) लॉन्च करता है जो हमले से पहले ही खतरे को रोक देता है या नष्ट कर देता है। इजरायल जैसे देशों ने लड़ाई में ऐसे सिस्टम की असरदार क्षमता दिखाई है।

भारत के लिए एपीएस खरीदना सिर्फ आर्मर (सुरक्षा कवच) की मोटाई बढ़ाने के बजाय युद्ध के मैदान में बचने की क्षमता को बेहतर बनाने की दिशा में एक अहम बदलाव है। जैसे-जैसे एंटी-टैंक हथियार ज्यादा एडवांस्ड होते जा रहे हैं, एक्टिव प्रोटेक्शन आधुनिक आर्मर्ड फोर्स (बख्तरबंद सेना) के लिए एक जरूरी इक्विपमेंट बनता जा रहा है।

जेट-पावर्ड कामिकेज ड्रोन: कम लागत में सटीक हमला

लोइटरिंग म्यूनिशन ने यूक्रेन से लेकर पश्चिम एशिया तक युद्ध के मैदानों का स्वरूप बदल दिया है। ये सिस्टम ड्रोन की निगरानी क्षमता और गाइडेड मिसाइलों की विनाशकारी शक्ति का मेल हैं। पारंपरिक ड्रोन के विपरीत कामिकेज ड्रोन लक्ष्य की तलाश में हवा में ही बने रहते हैं और फिर उन पर गोता लगाकर फट जाते हैं।

डीएसी ने जेट-पावर्ड कामिकेज ड्रोन खरीदने की मंजूरी दे दी है। इससे पता चलता है कि प्रोपेलर वाले ड्रोन की तुलना में लंबी रेंज, ज्यादा स्पीड और ज्यादा घातक क्षमता वाले ड्रोन पर जोर दिया जा रहा है।

ये ड्रोन पायलटों को दुश्मन की गोलीबारी के जोखिम में डाले बिना कमांड पोस्ट, आर्टिलरी पोजिशन, रडार स्टेशन, एयर डिफेंस सिस्टम और बख्तरबंद गाड़ियों को निशाना बना सकते हैं।

क्रूज मिसाइलों की तुलना में ये काफी सस्ते होते हैं और ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी देते हैं क्योंकि इन्हें लॉन्च करने के बाद भी इनके टारगेट को बदला जा सकता है। जैसे-जैसे सेनाएं कम लागत वाली सटीक हमले की क्षमता को प्राथमिकता दे रही हैं, उम्मीद है कि लोइटरिंग म्यूनिशन युद्ध के मैदान में इस्तेमाल होने वाले आम उपकरण बन जाएंगे।

HAPS: ऐसे सैटेलाइट जो एयरक्राफ्ट की तरह उड़ते हैं

तकनीकी रूप से सबसे महत्वाकांक्षी मंजूरियों में से एक है भारतीय वायु सेना के लिए फिक्स्ड-विंग हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट्स (FW-HAPS) की खरीद। समुद्र तल से लगभग 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर काम करने वाले ये सोलर-पावर्ड एयरक्राफ्ट कमर्शियल एयर ट्रैफिक और लगभग सभी मौसम प्रणालियों के ऊपर उड़ते हैं।

सैटेलाइट की तरह ये हफ्तों तक एक ही इलाके पर नजर रख सकते हैं। आम एयरक्राफ्ट के उलट ये बहुत कम ईंधन इस्तेमाल करते हैं और इन्हें लगातार क्रू की जरूरत नहीं होती। एक अकेला HAPS लगभग 500 किलोमीटर के दायरे वाले इलाके पर नजर रख सकता है। यह ऑप्टिकल, इन्फ्रारेड और इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस इकट्ठा करने के साथ-साथ टेलीकम्युनिकेशन और रिमोट सेंसिंग में भी मदद करता है।

इसलिए, यह एयरक्राफ्ट सैटेलाइट और इंसानों द्वारा चलाए जाने वाले सर्विलांस प्लेटफॉर्म के बीच की कमी को पूरा करता है। ऐसी सेना के लिए जिसे पहाड़ी सीमाओं और समुद्री रास्तों के लंबे हिस्सों पर एक साथ नजर रखनी होती है, लगातार निगरानी बहुत बड़ा बदलाव ला सकती है।

भारत ने DRDO और CSIR-NAL के जरिए अपनी शुरुआती स्वदेशी क्षमता पहले ही दिखा दी है। आने वाले सालों में 20 किलोमीटर की पूरी उड़ान का लक्ष्य रखा गया है।

नौसेना को भी किया गया मजबूत

हालांकि सेना और वायु सेना पर ज्यादा ध्यान दिया गया है, लेकिन नौसेना को भी जरूरी मंजूरी मिली है। मल्टी इन्फ्लुएंस ग्राउंड माइन (MIGM) अहम समुद्री इलाकों में दुश्मन की नौसेना की आवाजाही को रोककर भारत की सी-डिनायल (समुद्र में दुश्मन को रोकने की) क्षमता को मजबूत करेगी।

पुराने नेवल माइन सिर्फ एक ट्रिगर पर काम करते थे, जबकि आधुनिक इन्फ्लुएंस माइन मैग्नेटिक, एकोस्टिक और प्रेशर सिग्नेचर में बदलाव को पहचान सकते हैं, जिससे उनसे बचना बहुत मुश्किल हो जाता है। नौसेना नेवल शिपबोर्न अनमैन्ड एरियल सिस्टम (NSUAS) भी खरीदेगी।

ये जहाज से लॉन्च होने वाले ड्रोन, इंसानों वाले हेलीकॉप्टरों को बिना किसी गैर-जरूरी जोखिम में डाले, समुद्री निगरानी, टारगेट की पहचान और हालात की जानकारी (सिचुएशनल अवेयरनेस) को बेहतर बनाएंगे। आखिर में, इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन सिस्टम के लिए लैंड-बेस्ड टेस्टिंग फैसिलिटी (LBTF) को मंजूरी मिलना भविष्य के नेवल प्लेटफॉर्म्स में एक लंबे समय के निवेश जैसा है।

इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन से युद्धपोत कम आवाज वाले होंगे, फ्यूल की बचत बेहतर होगी और एडवांस्ड सेंसर, डायरेक्टेड-एनर्जी हथियारों और अगली पीढ़ी के कॉम्बैट सिस्टम के लिए ज्यादा पावर मिलेगी।

आपस में जुड़ा हुआ युद्ध का मैदान 

अलग-अलग देखने पर इनमें से हर सिस्टम एक अलग ऑपरेशनल प्रॉब्लम सॉल्व करता है लेकिन साथ में ये कुछ बहुत बड़ी बात दिखाते हैं। भारत धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म-सेंट्रिक युद्ध से नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध की ओर बढ़ रहा है।

कुछ ताकतवर हथियारों पर निर्भर रहने के बजाय भविष्य के ऑपरेशन सैकड़ों आपस में जुड़े सेंसर, ड्रोन, मिसाइल, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध सिस्टम और सर्विलांस प्लेटफॉर्म पर निर्भर होंगे जो रियल टाइम में जानकारी शेयर करेंगे। यह बदलाव आखिरकार डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल की नई मंजूरियों का सबसे अहम नतीजा साबित हो सकता है।

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