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छत्तीसगढ़ की लोक कला पंडवानी को देश
और दुनिया में पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का रविवार तड़के निधन
हो गया. वह 70 वर्ष की थीं.
लंबे समय से बीमार तीजन बाई ने
रायपुर एम्स में अंतिम सांस ली.
एम्स रायपुर के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर
डॉक्टर लक्ष्मीनारायण चौधरी ने बीबीसी से पुष्टि करते हुए बताया, “तीजन बाई को 27 मई को यहां लाया गया था. उन्हें
पार्किंसन से लेकर कई तरह की बीमारियां थीं जिनका इलाज़ चल रहा था.”
उन्होंने बताया, “4-5 जुलाई की दरम्यानी रात उन्हें 2:45 बजे दिल
का दौरा पड़ा और लगभग 3:15 बजे उन्होंने अंतिम साँस ली”.
तीजन बाई ने अपनी बुलंद आवाज,
प्रभावी अभिनय और अनोखी प्रस्तुति शैली से
पंडवानी को देश ही नहीं, बल्कि
विदेशों तक नई पहचान दिलाई.
महाभारत की कथाओं को मंच पर जीवंत
करने की उनकी कला ने उन्हें देश और दुनिया भर में मशहूर कर दिया था. उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था.
छत्तीसगढ़ के भिलाई के गनियारी गांव
में जन्मीं तीजन बाई ने कम उम्र में ही पंडवानी गायन शुरू कर दिया था. सिर्फ़ 13 साल की उम्र में उन्होंने मंच पर अपना पहला प्रदर्शन किया था.
महाभारत की
कथाओं को अपनी दमदार आवाज़, अभिनय और
अनूठी प्रस्तुति के साथ मंच पर जीवंत करने की उनकी शैली ने इस लोक कला को
अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई.
उन्होंने महाभारत के आख्यानों को
पंडवानी गायन के ज़रिये दुनिया भर में पहुंचाने का काम किया.
अपने लंबे कलात्मक सफर में उन्होंने
देश और विदेश में अनेक प्रस्तुतियां दीं. भारतीय लोक कला में उनके योगदान के लिए
उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और देश के दूसरे सर्वोच्च
नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया.