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भारत की कार्बन योजना को ब्रिटेन की मंजूरी:निर्यातकों को दोहरे टैक्स से मिलेगी राहत; फैसले से और क्या बदलेगा? – Uk Recognises India’s Carbon Credit Scheme Under Its Carbon Tax Mechanism: Official

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Sep 8, 2026


ब्रिटेन ने भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (सीसीटीएस) को मान्यता दे दी है। यह ब्रिटेन के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (सीबीएएम) के तहत मिली है। इससे ब्रिटेन को सामान भेजने वाले भारतीय निर्यातकों पर कर (टैक्स) का बोझ कम हो सकता है। एक अधिकारी ने सोमवार को यह जानकारी दी।

मान्यता कैसे मिली?

अधिकारी के अनुसार, ब्रिटेन के वित्त विभाग ने भारत के ऊर्जा दक्षता ब्यूरो को इसकी जानकारी दी है। ब्रिटेन ने दूसरे देशों की कार्बन कीमत तय करने वाली योजनाओं की एक सूची जारी की है। इसमें भारत की योजना को भी शामिल किया गया है। इसका मतलब है कि भारत की योजना को ब्रिटेन में कार्बन टैक्स से राहत देने के लिए मान्य माना गया है।

भारत लंबे समय से क्या कर रहा था?

यह कदम अहम है। वाणिज्य मंत्रालय लंबे समय से ब्रिटेन के साथ इस मुद्दे को उठा रहा था। दोनों देशों के बीच इस मामले पर लगातार बातचीत चल रही थी।

भारत की सीसीटीएस क्या है?

भारत ने कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम लागू की है। इसका मकसद देश की अर्थव्यवस्था से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करना है। इसमें उत्सर्जन की कीमत तय की जाती है। इसके लिए कार्बन क्रेडिट सर्टिफिकेट की खरीद-बिक्री होती है।

योजना का खर्च कौन उठाएगा?

सीसीटीएस को लागू करने का खर्च ऊर्जा दक्षता ब्यूरो उठाएगा। इसके लिए योजना के तहत कंपनियों और दूसरी संस्थाओं से मिलने वाली फीस और शुल्क का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके अलावा ब्यूरो अपने संसाधनों से भी खर्च करेगा।

भारतीय निर्यातकों को क्या फायदा होगा?

अधिकारी ने कहा कि ब्रिटेन ने सीसीटीएस को अपने सीबीएएम के तहत मान्य कार्बन प्राइसिंग व्यवस्था माना है। इससे ब्रिटेन में भारतीय सामान आयात करने वालों को राहत मिल सकती है।

सीबीएएम के दायरे में आने वाले पात्र भारतीय सामान पर भारत में सीसीटीएस के तहत जो प्रभावी कार्बन कीमत चुकाई गई होगी, उसके बराबर राहत मांगी जा सकेगी। हालांकि, इसके लिए ब्रिटेन के नियमों के तहत जरूरी सबूत और जांच की शर्तें पूरी करनी होंगी।

टैक्स का बोझ कितना घटेगा?

अधिकारी के मुताबिक, इससे भारतीय सामान पर लगने वाली प्रभावी सीबीएएम देनदारी कम होगी। इसका सीधा फायदा ब्रिटेन को सामान भेजने वाले भारतीय निर्यातकों को मिलेगा।

यह फैसला क्यों अहम है?

यह मान्यता दोनों देशों के बीच लंबे समय से चली आ रही तकनीकी स्तर की बातचीत के बाद मिली है। इसका एक अहम मकसद दो बार टैक्स लगने से बचना है। अगर किसी सामान पर उसके मूल देश यानी भारत में पहले ही मान्य कार्बन कीमत चुकाई जा चुकी है, तो उसी सामान पर ब्रिटेन में फिर उतनी ही कार्बन कीमत नहीं लगनी चाहिए।

आगे क्या होगा?

भारत और ब्रिटेन कार्बन बाजार से जुड़े नियमों पर मिलकर काम करते रहेंगे। दोनों देश ऊर्जा से जुड़े समझौते के तहत सहयोग जारी रखेंगे। बाजार व्यवस्था लागू करने के लिए बनी साझेदारी के तहत भी काम होगा। दोनों देश कार्बन की कीमत तय करने पर बातचीत जारी रखेंगे। इसमें भारत की कार्बन क्रेडिट योजना और ब्रिटेन के कार्बन टैक्स के नियमों के बीच तालमेल पर भी बात होगी।

कितनी राहत मिलेगी?

राहत की रकम तय नहीं है। यह इस बात पर निर्भर करेगी कि संबंधित सामान पर प्रभावी कार्बन कीमत कितनी लगी है। ब्रिटेन के सीबीएएम के तहत जिम्मेदार व्यक्ति को सबूत और जांच से जुड़ी सभी जरूरी शर्तें पूरी करनी होंगी।

भारत-ब्रिटेन व्यापार कितना है?

भारत और ब्रिटेन ने 15 जुलाई को व्यापक आर्थिक और व्यापार साझेदारी लागू की है। 2025-26 में दोनों देशों के बीच सामान का व्यापार 25.1 अरब अमेरिकी डॉलर रहा। वहीं, 2024 में दोनों देशों के बीच सेवाओं का व्यापार 35.4 अरब अमेरिकी डॉलर रहा।

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ब्रिटेन ने कार्बन टैक्स कब शुरू किया?

ब्रिटेन की सरकार ने दिसंबर 2023 में सीबीएएम लागू करने का फैसला किया था। इसे 2027 से लागू किया जाना है। इसके तहत कुछ ऐसे सामानों के आयात पर शुल्क लगेगा, जिनके उत्पादन में ज्यादा कार्बन उत्सर्जन होता है। इनमें लोहा और स्टील जैसे उत्पाद शामिल हैं।

भारत के किन सामानों पर असर पड़ सकता है?

विशेषज्ञों के अनुसार, ब्रिटेन के इस फैसले से भारत के कुछ निर्यात प्रभावित हो सकते हैं। इनमें लोहा, स्टील, एल्युमीनियम, उर्वरक, हाइड्रोजन, सिरेमिक, कांच और सीमेंट जैसे सामान शामिल हैं।

भारत की सीसीटीएस से क्या बदलेगा?

भारत ने सीसीटीएस लागू की है। इसके तहत देश की कंपनियों पर कार्बन से जुड़ी लागत आ सकती है। अब ब्रिटेन ने इस योजना को मान्यता दे दी है। इससे एक ही सामान पर दो बार कार्बन टैक्स लगने से बचने में मदद मिल सकती है। यानी अगर भारत में चुकाई गई कार्बन कीमत ब्रिटेन के नियमों के तहत मान्य होती है, तो ब्रिटेन सीबीएएम की देनदारी तय करते समय उतनी रकम की राहत दे सकता है।

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