जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अधिकारियों ने आज भी इस बात का दावा किया है कि दो महीने से भी ज्यादा लंबे समय से चल रहे पश्चिम एशिया संघर्ष की वजह से देश की ऊर्जा आपूर्ति पर कोई खास संकट नहीं पैदा हुआ है लेकिन दूसरी एजेंसियों की रिपोर्ट बताती है कि इनका असर पड़ना तय है।
FY2027 में भारत की GDP वृद्धि 6.6% रहने का अनुमान
एसएंडपी ग्लोबल की तरफ से भारत की इकोनमी पर पश्चिम एशिया संघर्ष के असर पर व्यापक रिपोर्ट जारी किया गया है जिसमें कहा गया है कि वर्ष 2026-27 में भारत की आर्थिक विकास दर घट कर 6.6 फीसद रह सकती है। पहले विकास दर के अनुमान 7.1 फीसद रखा गया था।
विकास दर में इस गिरावट के लिए ऊर्जा आपूर्ति की समस्या को ही प्रमुख कारण बताया गया है। साथ ही इसने भारत सरकार को यह भी कहा है कि वर्ष 2047 तक विकसित देश बनने के लक्ष्य के लिए ऊर्जा आपूर्ति की चुनौती का समाधान करना होगा।
रिपोर्ट के अनुसार, मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध के कारण ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान, तेल-गैस की आसमान छूती कीमतें और मुद्रा की अस्थिरता से देश को बड़ा बाहरी आर्थिक झटका लगने का खतरा है।
पश्चिम एशिया संघर्ष से ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान
रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि मध्य पूर्व युद्ध हाल के वर्षों में भारत की आर्थिक मजबूती की सबसे बड़ी परीक्षा बन गया है। इससे जो ऊर्जा संकट पैदा हुआ है उसका असर सिर्फ तेल और गैस तक सीमित नहीं है, बल्कि माल ढुलाई लागत, बीमा प्रीमियम, सप्लाई चेन और उर्वरक क्षेत्र तक फैल गया है।
भारत की मध्य पूर्व पर भारी निर्भरता इन जोखिमों को और बढ़ा रही है। इस क्षेत्र से भारत 45 से 50 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। इसके अलावा गैस, उर्वरक और कई औद्योगिक कच्चे माल की आपूर्ति भी मुख्य रूप से यहीं से होती है। मध्य पूर्व भारत के कुल माल आयात का 22 प्रतिशत और निर्यात का 13 प्रतिशत हिस्सा रखता है।
बासमती चावल, मांस, सिरेमिक, पेट्रोलियम उत्पाद और आभूषण क्षेत्रों में निर्भरता और भी अधिक है। गल्फ देशों से आने वाला 38 प्रतिशत रेमिटेंस लाखों भारतीय परिवारों की आजीविका का आधार है।विकसित भारत-2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एसएंडपी ग्लोबल ने भारत सरकार को तीन प्रमुख क्षेत्रों में तत्काल नीतिगत प्राथमिकताएं तय करने की सलाह दी है।
विकसित भारत 2047 लक्ष्य हेतु ऊर्जा सुरक्षा पर ध्यान दें
रिपोर्ट के अनुसार, ऊर्जा सुरक्षा के लिए भारत को भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच ऐसे कदम उठाने की जरूरत है जिससे ऊर्जा आपूर्ति को लेकर जारी अनिश्चितता के खतरे को कम किया जा सके। इसके तहत रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को बढ़ाना, सौर और पवन ऊर्जा में निवेश जारी रखने, 2030 तक 20 गीगावॉट न्यूक्लियर क्षमता हासिल करना और बैटरी स्टोरेज के साथ इलेक्टि्रक वाहन अपनाने को तेज करना चाहिए।
खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में घरेलू उर्वरक सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया है, क्योंकि भारत विश्व में उर्वरक उत्पादन में दूसरे स्थान पर है, लेकिन मांग आपूर्ति से तेजी से आगे निकल रही है। यह सुरक्षा देश की बड़ी आबादी, मुफ्त खाद्यान्न कार्यक्रमों और कृषि आय की स्थिरता के लिए अत्यंत जरूरी है। आर्थिक सुधारों के तहत निरंतर संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता बताई गई है ताकि व्यापार सुगम हो और भारत प्रतिस्पर्धी निवेश गंतव्य बने।
हाल ही में यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के साथ हुए व्यापार समझौतों का लाभ उठाने के लिए विनिर्माण क्षेत्र में उत्पादकता, सप्लाई चेन दक्षता और अनुसंधान व विकास को मजबूत करना होगा। यदि इस संकट का सही उपयोग किया जाए तो भारत अपनी पुरानी समस्याओं को हल कर विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की दिशा में और मजबूती से आगे बढ़ सकता है।