जेएनएन, रायपुर। छत्तीसगढ़ में जनगणना से पूर्व आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड की मांग ने राजनीतिक और सामाजिक विमर्श को नया मोड़ दिया है। भाजपा के वरिष्ठ नेता नंद कुमार साय ने सर्व आदिवासी समाज की बैठक में यह मांग उठाई, जिसके बाद विभिन्न जनजातीय संगठनों के बीच मतभेद उभर आए हैं।
अखिल भारतीय जनजाति सुरक्षा मंच ने नंद कुमार की मांग को ईसाई मिशनरियों का सुनियोजित षड्यंत्र बताते हुए आरोप लगाया है कि यह आदिवासियों को उनकी सांस्कृतिक जड़ों से काटने और मतांतरण की दिशा में एक कदम है।
इस मुद्दे पर राजनीति भी गरमा गई है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने सवाल उठाया है कि भाजपा के नेता होने के नाते साय के बयान पर भाजपा सरकार का क्या रुख है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इसे नंद कुमार का व्यक्तिगत विचार बताया।
नंद कुमार साय और अरविंद नेताम जैसे नेता इसे आदिवासियों की मौलिक पहचान और परंपराओं के संरक्षण से जोड़ते हैं, जबकि जनजाति सुरक्षा मंच इसे अलगाववाद का संकेत मानता है।
जनजाति सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय संयोजक गणेशराम भगत ने इस मांग पर तीखा हमला किया है। उनका कहना है कि राज्य सरकार द्वारा धर्म स्वातंर्त्य विधेयक लाने के बाद मिशनरी नेटवर्क आदिवासियों को भ्रमित करने में जुट गया है।
विवाद में नया मोड़ अनुसूचित जनजाति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष विकास मरकाम के बयान से आया है। उन्होंने धर्म कोड की मांग करने वालों को उनके पूर्वजों के जाति प्रमाण पत्र सार्वजनिक करने की चुनौती दी है।
उनके अनुसार, वर्ष 1958 से पहले आदिवासी लोग अपने प्रमाण पत्रों में हिंदू धर्म ही दर्ज कराते थे। बता दें कि नंद कुमार ने वर्ष 2023 में कुछ महीनों के लिए कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की थी। हालांकि वह फिर से भाजपा में वापस लौट आए थे।
इस बैठक में उन्होंने आदिवासियों से पांच बच्चे पैदा करने की भी अपील की है। उन्होंने कहा कि परिवार नियोजन का सबसे अधिक पालन आदिवासियों ने किया है, जिसका नतीजा यह है कि आदिवासियों की आबादी तेजी से घट रही है।