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‘मैं, वडास्सेरी दामोदर मेनन सतीशन…’: केरल के नए मुख्यमंत्री के नाम पर क्यों छिड़ा विवाद?

Byadmin

May 21, 2026


डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। केरल के नए मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने पद संभालने के महज चार दिनों के भीतर खुद को एक ऐसे विवाद के केंद्र में पाया है, जिसका संबंध न तो किसी सरकारी फैसले से है और न ही प्रशासनिक नीति से। विवाद उनके नाम को लेकर खड़ा हुआ है।

दरअसल, मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते समय कांग्रेस नेता वीडी सतीशन ने अपने पूरे आधिकारिक नाम- ‘वडास्सेरी दामोदर मेनन सतीशन’ का इस्तेमाल किया। इसके बाद 16वीं केरल विधानसभा के सदस्य के रूप में शपथ के दौरान भी उन्होंने यही नाम दोहराया।

यहीं से कांग्रेस के भीतर बहस शुरू हो गई। पार्टी के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाया कि आखिर सतीशन ने अपने नाम के साथ ‘मेनन’ उपनाम क्यों जोड़ा, जबकि अब तक उनकी सार्वजनिक राजनीतिक पहचान सिर्फ ‘वीडी सतीशन’ के रूप में रही है।

अब पूरा नाम क्यों?

साल 2021 में विधायक पद की शपथ लेते समय सतीशन ने खुद को केवल ‘वीडी सतीशन’ बताया था। लेकिन इस बार उन्होंने अपने पूरे नाम का इस्तेमाल किया, जिसमें ‘मेनन’ शब्द भी शामिल है।

केरल में ‘मेनन’ उपनाम को परंपरागत रूप से ऊंची जाति माने जाने वाले नायर समुदाय से जोड़ा जाता है।

ऐसे में कांग्रेस के कुछ नेताओं का मानना है कि मुख्यमंत्री का यह कदम पार्टी की धर्मनिरपेक्ष और समावेशी छवि के विपरीत संदेश दे सकता है।

कांग्रेस के भीतर क्यों बढ़ी बेचैनी?

कांग्रेस के अंदरूनी हलकों में इस कदम को लेकर अलग-अलग तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। कुछ नेताओं का मानना है कि इसके पीछे एक राजनीतिक संदेश भी हो सकता है।

दरअसल, हाल के वर्षों में केरल की राजनीति में पहचान आधारित राजनीति तेज हुई है। कांग्रेस नीत यूडीएफ गठबंधन के IUML और जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों के साथ संबंधों को लेकर बीजेपी और CPM लगातार सवाल उठाते रहे हैं।

ऐसे में कुछ कांग्रेस नेताओं को लगता है कि सतीशन का ‘मेनन’ उपनाम इस्तेमाल करना हिंदू समुदाय, खासकर नायर वोटरों को संदेश देने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है।

कांग्रेस नेताओं ने उठाए सवाल

कांग्रेस नेता जिंटो जॉन ने फेसबुक पोस्ट में लिखा कि कांग्रेस की ताकत उसकी समावेशी राजनीति रही है, जहां नेता जातिसूचक उपनामों से दूरी रखते हैं।

उन्होंने लिखा, ‘मैं ‘जिंटो जॉन’ ही रहूंगा, ‘थेक्कुमकट्टिल जॉन रोमन कैथोलिक जिंटो’ नहीं। मेरी राजनीति मेरे विचारों से तय होती है।’

वहीं कांग्रेस नेता वीआर अनूप ने भी सोशल मीडिया पर टिप्पणी करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री को डॉ. भीमराव आंबेडकर को और गंभीरता से पढ़ने की जरूरत है।

उन्होंने लिखा, ‘केरल में जाति आज भी सामाजिक शक्ति और सामाजिक पूंजी का स्रोत है। ऐसे में सार्वजनिक जीवन में जातिसूचक पहचान का इस्तेमाल संवेदनशील मुद्दा है।’

NSS और SNDP की नाराजगी

रिपोर्ट्स के मुताबिक, केरल के दो प्रभावशाली हिंदू सामाजिक संगठन- नायर सर्विस सोसाइटी (NSS) और SNDP योगम- सतीशन को मुख्यमंत्री बनाए जाने को लेकर बहुत उत्साहित नहीं थे।

इसी वजह से राजनीतिक हलकों में यह चर्चा और तेज हो गई कि कहीं पूरा नाम इस्तेमाल करना इन समुदायों के प्रति राजनीतिक संदेश देने की रणनीति तो नहीं।

सतीशन ने क्या कहा?

विवाद बढ़ने के बाद मुख्यमंत्री सतीशन ने सफाई देते हुए कहा कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है। मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘अगर मैं अपने पिता का नाम लेता हूं तो इसमें गलत क्या है? क्या मुझे उन्हें याद नहीं करना चाहिए?’

उन्होंने आगे कहा, ‘मेरे माता-पिता दोनों का निधन मेरे विधायक बनने से पहले हो गया था। मैंने अपने पिता का नाम लिया। यह आम बात है। मेरे पासपोर्ट में भी यही नाम दर्ज है।’

सतीशन ने भावुक अंदाज में कहा, मुझे दुख है कि मैं अपनी मां का नाम नहीं जोड़ सका। मैं उन्हें मन ही मन याद कर रहा था। अपने माता-पिता का नाम लेना गर्व की बात है।’

‘वंदे मातरम’ को लेकर भी उठा विवाद

नाम विवाद के बीच मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में ‘वंदे मातरम्’ के पूरे संस्करण के गायन ने भी नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया।

दरअसल, समारोह में गीत का पूरा संस्करण गाया गया, जबकि परंपरागत तौर पर केवल चुनिंदा अंश ही प्रस्तुत किए जाते रहे हैं। मुख्यमंत्री सतीशन ने बाद में सफाई दी कि सरकार को पहले से इसकी जानकारी नहीं थी।

उन्होंने कहा, ‘हमें नहीं पता था कि ‘वंदे मातरम्’ का पूरा संस्करण गाया जाएगा। यह निर्देश राजभवन की ओर से आया था। जब गीत शुरू हुआ, तब हमें इसका एहसास हुआ।’ उन्होंने कहा कि कार्यक्रम के बीच में इसे रोकना संभव नहीं था।

CPM ने भी साधा निशाना

सीपीएम ने इस मुद्दे पर सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि ‘वंदे मातरम्’ के उन हिस्सों को गाना उचित नहीं था, जिन्हें 1937 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने बहुलतावादी समाज के लिहाज से सार्वजनिक आयोजनों के लिए उपयुक्त नहीं माना था।

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