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बांग्लादेश में शेख़ हसीना के सत्ता से बेदखल होने के बाद प्रोफ़ेसर मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार ने लगभग डेढ़ साल तक काम किया था.
लेकिन भारत और बांग्लादेश के द्विपक्षीय संबंधों में डेढ़ साल का ये दौर तनाव और असहजता का रहा.
इसके बाद बांग्लादेश में तारिक़ रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की सरकार बनी और उम्मीद थी कि रिश्ते अच्छे होंगे.
लेकिन भारत में रह रहीं शेख़ हसीना को वापस बांग्लादेश भेजने का मुद्दा दोनों देश के रिश्तों को असहज करता रहा.
भारत ने तारिक़ रहमान को न्योता भी भेजा लेकिन बांग्लादेश के प्रधानमंत्री ने पहले विदेशी दौरे के लिए मलेशिया और चीन को चुना. अभी तक उनका भारत दौरा नहीं हो पाया है.
इसके बावजूद तारिक़ रहमान की सरकार ने भारत के ख़िलाफ़ यूनुस सरकार जैसा आक्रामक रुख़ नहीं अपनाया.
हालांकि पाँच अगस्त को नई दिल्ली के एक कार्यक्रम में शेख़ हसीना की वर्चुअल मौजूदगी के बाद बांग्लादेश में भारत के प्रति एक बार फिर नाराज़गी दिखी.
यूनुस सरकार के विदेश मंत्री ने किए कई दावे
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इस बीच, बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार में विदेश मंत्री का काम देख रहे मोहम्मद तौहीद हुसैन ने देश के प्रमुख अख़बार ‘प्रथम आलो’ को इंटरव्यू में कहा है कि उस दौर में बांग्लादेश ने भारत से रिश्ते सुधारने की काफ़ी कोशिश की लेकिन भारत की ओर से निराशा मिली.
मोहम्मद यूनुस के शासन में भारत की शिकायत थी है कि यह सरकार वहाँ के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पा रही है. भारत ने ये शिकायत कई बार की और मोहम्मद यूनूस की अंतरिम सरकार भारत के इन आरोपों को ख़ारिज करती रही है.
मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार में बांग्लादेश की पाकिस्तान से भी गर्मजोशी बढ़ी और नई दिल्ली में इसे कई पर्यवेक्षकों ने भारत के ख़िलाफ़ देखा.
तौहीद हुसैन ने प्रथम आलो से कहा कि प्रोफ़ेसर यूनुस भारत को एक ‘जियोपॉलिटिकल रियलिटी’ मानते थे और उसके साथ काम करने का कोई तरीक़ा तय करना चाहते थे.
तौहीद हुसैन ने कहा, ”शुरुआत में हमारा मुख्य काम अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने बांग्लादेश का पक्ष स्पष्ट रूप से रखना था. लेकिन मैं यह कह सकता हूँ कि प्रोफ़ेसर यूनुस का यह भी मानना था कि भारत के साथ कामकाज़ का एक व्यावहारिक तरीक़ा विकसित करना ज़रूरी है. भारत एक भू-राजनीतिक वास्तविकता है. हमारे उसके साथ बहुआयामी संबंध हैं और वह तीन ओर से हमारी सीमाओं से लगा हुआ है.”
तौहीद हुसैन के मुताबिक़ चीन और कई दूसरे देशों के उलट भारत ने प्रोफ़ेसर यूनुस का स्वागत करते हुए कोई औपचारिक संदेश नहीं भेजा. इसमें काफ़ी देर की गई.
उन्होंने कहा, ”उल्टे हमने अपनी ओर से पहल करते हुए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से टेलीफ़ोन से बातचीत की व्यवस्था की. प्रोफ़ेसर यूनुस ने प्रधानमंत्री मोदी को फ़ोन किया. हमने समय मांगा और जब समय तय हो गया तो उन्होंने स्टेट गेस्ट हाउस ‘जमुना’ से प्रधानमंत्री मोदी से बात की.”
तौहीद हुसैन ने कहा, ”भारत से रिश्ते सुधारना यूनुस सरकार की एक बड़ी प्राथमिकता थी. शुरुआत में हमने इसके लिए गंभीर कोशिशें कीं, लेकिन बाद में साफ़ हो गया कि उन कोशिशों का कोई नतीजा नहीं निकल रहा है.”

तौहीद हुसैन ने बताया, ”नवंबर या दिसंबर 2024 में तीन-चार देशों की यात्रा के दौरान प्रोफ़ेसर यूनुस ने मुझसे कहा था कि जब आप दिल्ली से गुज़र ही रहे तो वहां क्यों नहीं रुक जाते. इस पर मैंने कहा कि “सर, मुझे नहीं लगता कि ऐसा करना सही होगा. मैं सिर्फ़ भारतीय विदेश मंत्री से मिलने के लिए बिना औपचारिक निमंत्रण के दिल्ली नहीं जा सकता.”
”मुझे नहीं लगता था कि ऐसी यात्रा से दोनों देशों के रिश्तों का माहौल बेहतर होने की कोई गारंटी होगी.”
”बात सिर्फ़ भारत सरकार की नहीं थी. भारत में ऐसे लोग भी थे, जिनका बांग्लादेश के प्रति नकारात्मक नज़रिया था और जो अवामी लीग के समर्थक थे.”
”इसलिए मुझे लगा कि ऐसी अनावश्यक यात्रा का कोई मतलब नहीं है. उन्होंने मेरी इस दलील को स्वीकार कर लिया.”
प्रथम आलो ने तौहीद हुसैन ने पूछा, ”भारत ने कहा था कि चुनाव के बाद बांग्लादेश के साथ रिश्ते सामान्य हो जाएंगे. भारतीय लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ढाका में बीएनपी के नेतृत्व वाली सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए और अप्रैल में विदेश मंत्री ख़लीलुर रहमान ने दिल्ली का दौरा किया. इसके बावजूद नई चुनी हुई सरकार के साथ रिश्ते उस तरह आगे नहीं बढ़े, जैसी कई लोगों को उम्मीद थी. आख़िर समस्या कहां है?
इसके जवाब में तौहीद हुसैन ने कहा, ”मैं नहीं कह सकता कि अभी चीज़ें इस तरह क्यों हो रही हैं. विदेश मंत्री शायद इस सवाल का बेहतर जवाब दे पाएंगे.”
तौहीद हुसैन ने जब इस्तीफ़े की पेशकश की
तौहीद हुसैन ने हाल ही में एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा था कि तीन अलग-अलग मौक़ों पर इस्तीफ़ा देना चाहते थे. प्रथम आलो ने पूछा कि ऐसा क्यों था?
इसके जवाब में तौहीद ने कहा, ”मैं विस्तार में नहीं जाना चाहता. लेकिन तब मुझे अहसास हुआ कि एक तरह का “किचन कैबिनेट” पहले ही बन चुका था.
मुझे एक ख़ास मुद्दे पर चर्चा के लिए दोपहर के भोजन पर बुलाया गया था. जब मैं वहाँ पहुँचा, तो ख़ुद को एक असहज स्थिति में पाया. वह कैबिनेट की बैठक नहीं थी, बल्कि चुनिंदा लोगों की बैठक थी. वहाँ पहुँचते ही मुझ पर सवालों की बौछार कर दी गई. ऐसा लगा जैसे मुझे सिर्फ़ आलोचना के लिए बुलाया गया हो.”
तौहीद हुसैन ने कहा, ”उस लंच बैठक में जिनेवा एयरपोर्ट पर आसिफ़ नजरुल से जुड़े दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम पर चर्चा हुई. मैंने जिनेवा में जो कुछ हुआ था, उसका पूरा विवरण दिया. लेकिन इसके बाद मुझे इतनी तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा कि मुझे लगा जैसे मैं वहाँ एक अभियुक्त की तरह खड़ा हूँ.
”आखिर में मैंने कहा, शायद आप मेरे काम करने के तरीक़े से संतुष्ट नहीं हैं. शायद आपको लगता है कि मैंने विदेश मंत्रालय में 33 साल काम किया है, इसलिए मैं उसके अधिकारियों का पक्ष ले रहा हूँ. अगर आपको सचमुच ऐसा लगता है, तो किसी और को यह ज़िम्मेदारी दे दीजिए. मुझे पद छोड़ने दीजिए.”
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शेख़ हसीना का भारत में होना
नई दिल्ली से पाँच अगस्त को शेख़ हसीना की वर्चुअल प्रेस कॉन्फ़्रेंस पर बांग्लादेश ने कड़ी आपत्ति जताई.
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने कहा, ”भारतीय धरती पर शेख़ हसीना का प्रेस कॉन्फ़्रेंस उस दिन हुआ, जब बांग्लादेश की जनता जुलाई क्रांति की दूसरी वर्षगांठ मना रही है. यह बांग्लादेश की संप्रभुता पर हमला है और जुलाई क्रांति के शहीदों का अपमान है.”
बांग्लादेश ने कहा, “इस देश की जनता ने जुलाई क्रांति की भावना को अपनाते हुए दृढ़ संकल्प लिया है कि हमारा राष्ट्र कभी भी फासीवाद के उन अंधेरे दिनों में वापस नहीं जाएगा और बांग्लादेश कभी किसी का वफ़ादार या संरक्षित राज्य नहीं बनेगा. जनसंहार की दोषी शेख़ हसीना और उनका माफ़िया गिरोह अब कभी बांग्लादेश की राजनीति में जगह नहीं पाएगा.”
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना को मानवता के ख़िलाफ़ कथित अपराधों के मामले में मौत की सज़ा सुनाई जा चुकी है. वह पांच अगस्त 2024 को सत्ता से हटाए जाने के बाद से ही भारत में हैं.
बयान में शेख़ हसीना के प्रत्यर्पण को लेकर भी निराशा ज़ाहिर की गई है.
दूसरी ओर भारत ने दिल्ली के फ़ॉरेन कॉरेस्पॉन्डेंट्स क्लब ऑफ़ साउथ एशिया की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम को एक निजी संगठन का कार्यक्रम बताया था और कहा था कि इससे उसका कोई लेना-देना नहीं है.
बांग्लादेश से संबंध सुधारने की भारत की पहल
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2025 के आख़िर में जब यह साफ़ होने लगा कि बांग्लादेश में बीएनपी और उसके कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक़ रहमान सत्ता में आ सकते हैं, तब भारत ने रिश्ते सुधारने के लिए शांत और चरणबद्ध कूटनीतिक पहल शुरू की.
सबसे पहले, दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच संपर्क बढ़ा.
नवंबर 2025 में बांग्लादेश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार खलीलुर रहमान और भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की नई दिल्ली में मुलाक़ात हुई.
इसे दोनों देशों के बीच गतिरोध कम करने की अहम कोशिश माना गया.
जयशंकर 31 दिसंबर 2025 को बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया को श्रद्धांजलि देने ढाका पहुंचे थे. इस दौरान उन्होंने ख़ालिदा ज़िया के बेटे और बीएनपी नेता तारिक़ रहमान से मुलाक़ात कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शोक संदेश भी सौंपा था.
बीएनपी सरकार बनने के बाद भारत ने तुरंत नई सरकार से संपर्क बढ़ाया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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