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यहाँ मनाया जाता है 76 दिनों तक दशहरा, लेकिन नहीं जलाया जाता रावण

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Oct 21, 2026


बस्तर दशहरा की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें हर समुदाय की भूमिका तय है.

इमेज कैप्शन, बस्तर दशहरा की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें हर समुदाय की भूमिका तय है

जब देश भर में रावण के पुतले धू-धू कर जल रहे होते हैं, तब छत्तीसगढ़ के बस्तर में लकड़ी का एक विशाल रथ जंगल की धरती पर आगे बढ़ रहा होता है. न रामलीला, न रावण वध, न तीर-कमान.

बस्तर में दशहरा भगवान राम की नहीं, यहां की आराध्य देवी दंतेश्वरी की विजयगाथा है और बस्तर का यह दशहरा उत्सव पूरे 76 दिन चलता है.

बस्तर दशहरा की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें हर समुदाय की भूमिका तय है. रथ बनाने वाले एक गांव के हैं, रस्सी लाने वाले दूसरे के, रथ खींचने वाले लोग तीसरे के, सारा आयोजन बिना किसी बाधा के समाप्त होने की कामना के साथ नौ दिनों तक गड्ढे में बैठ कर प्रार्थना करने वाले जोगी चौथे गांव का.

रथ की लकड़ी एक गांव से आती है, कारीगर दूसरे गांव के, रस्सी तीसरे इलाक़े की देन है और विजय रथ खींचने का अधिकार किलेपाल परगना के माड़िया आदिवासियों के पास है.

इस कार्यक्रम के लिए रथ बनाने वाले एक ही गांव के लोग होते हैं.

इमेज कैप्शन, इस कार्यक्रम के लिए रथ बनाने वाले एक ही गांव के लोग होते हैं

बस्तर के सांसद और बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप कहते हैं, “यही इस दशहरा पर्व की विशेषता है कि बस्तर के हर समाज के लोग इसमें शामिल होते हैं. हर समाज की भूमिका तय है. साल दर साल इस विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा को देखने के लिए भारत के अलावा दूसरे देशों से लोग बड़ी संख्या में पहुंचते हैं. इस दशहरा में हम किसी का पुतला दहन नहीं करते.”

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