इमेज स्रोत, Grigory SYSOYEV / POOL / AFP via Getty Images
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईरान युद्ध की वजह से पेट्रोल-डीज़ल का इस्तेमाल कम करने की अपील के बाद रूस ने कहा है कि तेल की आपूर्ति में भारत के हितों को कोई नुक़सान नहीं होगा.
14-15 मई को दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में शामिल होने से पहले आरटी इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने यह कहा.
पीएम मोदी ने 10 मई को ईरान युद्ध का हवाला देते हुए पेट्रोल-डीज़ल के साथ ही खाद्य तेल का भी उपयोग कम करने और सोना कम ख़रीदने की अपील की थी.
प्रधानमंत्री ने कहा था, “भारत के इंपोर्ट का बहुत बड़ा हिस्सा क्रूड ऑयल है और दुर्भाग्य से जिस क्षेत्र से दुनिया के बड़े हिस्से को तेल मिलता है आज वही क्षेत्र संघर्ष और युद्ध में उलझा हुआ है इसलिए जब तक हालात सामान्य नहीं होते, हम सबको मिलकर छोटे छोटे संकल्प लेने होंगे.”
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
भारत अपनी कुल ज़रूरतों का लगभग 90 फ़ीसदी तेल आयात करता है. यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से भारी मात्रा में रियायती तेल ख़रीदना शुरू किया था, जिससे भारत के कुल आयात में रूस की हिस्सेदारी बढ़ती चली गई.
जुलाई 2024 तक भारत के कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी बढ़कर 44.6 फ़ीसदी तक पहुंच गई थी. हालांकि, अमेरिकी दबाव और टैरिफ नीतियों के कारण जनवरी 2026 तक यह घटकर 20.6% रह गई.
रूसी विदेश मंत्री ने क्या कहा?
इमेज स्रोत, MAXIM SHIPENKOV / POOL / AFP via Getty Images
भारत में ब्रिक्स विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में शामिल होने से पहले रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने आरटी इंडिया को दिए इंटरव्यू में भारत और रूस के संबंधों को लेकर खुलकर बात की.
लावरोव ने कहा, “जो लोग रूस-भारत दोस्ती के भविष्य को लेकर चिंता पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं, मुझे लगता है उन्हें चिंता नहीं करनी चाहिए… कुछ वैश्विक ताकतें भारत और रूस के संबंधों को कमज़ोर करने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन उनकी ये कोशिशें सफल नहीं होंगी.”
रूसी विदेश मंत्री ने कहा कि भारत और रूस के संबंध भारत की आज़ादी के समय से ही क़ायम हैं. उन्होंने कहा, “भारत की आज़ादी के बाद लंबे समय तक कोई भी पश्चिमी देश भारत की सैन्य क्षमता विकसित करने में मदद करने के लिए तैयार नहीं था. रूस ने भारत को न सिर्फ़ हथियार उपलब्ध कराए बल्कि कई तरह के हथियारों के उत्पादन के लिए तकनीक भी साझा की.”
“हमने ब्रह्मोस मिसाइल से शुरुआत की, फिर कलाश्निकोव मशीनगनों तक पहुंचे और अब टी‑90 टैंक भी भारत में बनाए जा रहे हैं.”
उन्होंने आगे जोड़ा कि पिछले साल रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने दीर्घकालिक आर्थिक सहयोग की योजना पर सहमति बनाई, जिसमें सैन्य‑तकनीकी सहयोग भी शामिल है.
आईटी इंडिया की एंकर ने रूसी तेल कंपनियों लुकोइल और रोसनेफ़्ट पर प्रतिबंध के बाद भारत में रूसी तेल के आयात में भारी गिरावट आने का ज़िक़्र करते हुए पूछा कि क्या इससे रूस को कोई चिंता हुई थी और क्या इससे भारत के एक साझेदार के रूप में रूस के नज़रिए में कोई फ़र्क पड़ा था?
इमेज स्रोत, Alexander Zemlianichenko / POOL / AFP
लावरोव ने इस पर कहा, “भारत का इससे कोई लेना-देना नहीं था. हम अमेरिका के एक ग़ैरक़ानूनी फ़ैसले की बात कर रहे हैं, जो उन्होंने यूक्रेन के संदर्भ में लिया था.”
उन्होंने कहा, “मैं आपको आश्वस्त कर सकता हूं कि रूसी तेल की आपूर्ति के मामले में भारत के हितों को कोई नुक़सान नहीं होगा और हम यह सुनिश्चित करेंगे कि यह अनुचित खेल, अनुचित मुक़ाबला हमारे अनुबंधों को प्रभावित न करें.”
रूसी विदेश मंत्री ने कहा, “दो साल पहले जब हम ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहे थे तब हमने कई ऐसे कदम उठाए थे जिनसे स्वतंत्र इन्फ़्रास्ट्रक्चर तैयार हो सके, जैसे कि सीमा-पार भुगतान प्रणाली, भुगतान समाधान ढांचा (पेमेंट सेटलमेंट इन्फ़्रास्ट्रक्चर) और नए निवेश मंच और री-इंश्योरेंस सुविधा के रूप में ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज का भी प्रस्ताव दिया गया था. अब तक इन सभी ट्रैक्स पर पश्चिमी संस्थाओं का कब्ज़ा है.”
अमेरिका के जापान, भारत समेत अन्य देशों पर रूसी तेल न ख़रीदने के दबाव को अनुचित बताते हुए लावरोव ने कहा, “यह औपनिवेशक (कॉलोनियल) या नव-औपनिवेशक तरीके हैं, आप इसे कुछ भी कह सकते हैं लेकिन यह दूसरों के शोषण करने के तरीकों की बात कर रहे हैं. तुम्हें सस्ता रूसी तेल नहीं ख़रीदना चाहिए, तुम्हें मेरा महंगा तेल ख़रीदना चाहिए. अमेरिका से महंगी एलएनजी ख़रीदो… हम वैश्विक ऊर्जा पर नियंत्रण कर दुनिया पर राज करेंगे.”
“सभी ऐसे दबावों में नहीं आते. भारत ने इसे बार-बार टाला है और कहा है कि वह खुद तय करेगा कि उसे ऊर्जा किससे ख़रीदनी है. हालांकि ऐसी ख़बरें हैं कि भारत ने एक टैंकर को लेने से मना कर दिया था जिसमें रूसी तेल था. लेकिन कुल मिलाकर भारत ने अपनी स्थिति साफ़ कर दी है.”
रूस से दीर्घकालिक अनुबंध करें, अमेरिका की परवाह न करें

पूर्व वाणिज्य अधिकारी और ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के प्रमुख अजय श्रीवास्तव कहते हैं, “भारत अपने इस्तेमाल के 90 फ़ीसदी तेल का आयात करता है. इसमें से खाड़ी देशों से आने वाला 50 फ़ीसदी तेल होर्मुज़ स्ट्रेट की वजह से रुका है और 30 फ़ीसदी तेल, जो पिछले साल हमने रूस से ख़रीदा था, वो अमेरिकी दबाव की वजह से रुक गया है. यह एक आपातकाल जैसी स्थिति है.”
“इसलिए अमेरिका की जायज़-नाजायज़ धमकियों को दरकिनार कर हमें रूस से तेल, एलएनजी, फर्टिलाइज़र्स की आपूर्ति का 30 से लेकर 50 साल तक का दीर्घकालिक अनुबंध करना चाहिए. इस बारे में कोई दो-राय नहीं होनी चाहिए.”
वह कहते हैं, “मैंने गहराई से अध्ययन किया कि और कौन से स्रोत हैं जिनसे हम तेल ले सकते हैं. जिन भी देशों से हम तेल ख़रीदते हैं वह इतने बड़े नहीं हैं कि वह रूस के बराबर तेल दे सकें. पश्चिम एशिया और रूस हमारे लिए लाइफ़लाइन हैं और दोनों ही अभी रुके हुए हैं. इसलिए हमें तुरंत रूस से अनुबंध करना चाहिए और अमेरिका के गुस्से की ज़रा भी परवाह नहीं करनी चाहिए.”
लेकिन इस मामले पर वरिष्ठ पत्रकार और कूटनीतिक विश्लेषक स्मिता शर्मा की राय अलग है. वह कहती हैं, “मुझे नहीं लगता कि भारत ऐसा करेगा.”
“हमारी विदेश नीति में आज यह समस्या है कि हम अमेरिका के सामने थोड़ा भी खड़ा नहीं हो पा रहे हैं. डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ़ों ने हमारे एमएसएमई, हमारे मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर की कमर तोड़ दी… अब हमारा विदेशी मुद्रा भंडार दबाव में है, विदेशी निवेशकों का भारत में विश्वास नहीं है और ऐसे में भारत की स्थिति ऐसी नहीं है कि किसी को दुश्मन बना ले. इसलिए रूस से अगर तेल लेंगे भी तो उसकी घोषणा नहीं करेंगे.”
‘साफ़ नहीं बोलेगा भारत’
इमेज स्रोत, ANI
सर्गेई लावरोव बार-बार कह रहे हैं कि अमेरिका का रूसी तेल ना ख़रीदने के लिए दूसरे देशों पर दबाव बनाना बिलकुल अनुचित है. वो चाह रहा है कि ज़्यादातर देश उसी से तेल ख़रीदें.
लेकिन अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि व्यवहारिक रूप से यह संभव नहीं है.
वह कहते हैं, “यह बात है कि अमेरिका अपना तेल बेचना चाह रहा है. हमने भी पिछले साल उनसे दोगुना तेल लिया है. फिर भी वो 10 बिलियन डॉलर तक भी नहीं पहुंचा है. अमेरिका ने बहुत सारे देशों को आपूर्ति करने का ठेका ले लिया है लेकिन उनके पास ख़ुद भी इतना तेल नहीं है. इसीलिए वेनेज़ुएला और ईरान जैसी घटनाओं के पीछे उद्देश्य यह भी है कि अमेरिका का तेल का स्रोत बढ़ जाए.”
“अमेरिका भारत या किसी भी दूसरे स्वतंत्र देश को बाध्य नहीं कर सकता कि उससे तेल ख़रीदें. दूसरी बात यह है कि उनके पास इतना तेल है भी नहीं. यूरोप ने रूस से ऊर्जा ख़रीदना बंद कर दिया है, अमेरिका से लेने की बात हो रही है. इसी तरह ब्रिटेन भी है. लेकिन अमेरिका के पास इतना तेल ही नहीं है कि वह आपूर्ति कर सके. उनकी रिफ़ाइनरियां बन रही हैं, बनने में 10 साल लगेंगे… तब तक?”
अजय श्रीवास्तव कहते हैं, “यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारत को जब भी ज़रूरत पड़ी है रूस ने हमेशा साथ दिया है. चाहे वह 65 की जंग हो, 71 की जंग हो, हमारा पहला परमाणु परीक्षण हो या उसके बाद की दसियों घटनाएं हों. अमेरिका हमेशा ही पाकिस्तान के साथ खड़ा रहा है या भारत पर प्रतिबंध लगाए. रूस ने संयुक्त राष्ट्र में उन प्रतिबंधों को वीटो किया और सक्रिय रूप से हमारी मदद की.”
स्मिता शर्मा कहती हैं, “रूसी विदेश मंत्री का भारत के समर्थन में बयान अप्रत्याशित नहीं है क्योंकि वह भी जानते हैं कि भारत पर अमेरिका का कैसा दबाव है. चिंताएं हैं रिश्तों को लेकर. भारत को भी चीन-रूस, रूस-ईरान, रूस-पाकिस्तान के संबंधों को लेकर चिंताएं हैं लेकिन ये गंभीर नहीं हैं.”
स्मिता शर्मा कहती हैं, “रूस के साथ भारत ने ईरान के मुक़ाबले अलग यह किया कि रूस का साथ दिया है. भारत ने यूक्रेन पर हमले की साफ़ शब्दों में निंदा नहीं की. इसके अलावा तेल ख़रीद पर दबाव के बाद भी भारत ने रूस से तेल की ख़रीद को शून्य नहीं किया.”
“डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में अमेरिका के दबाव में भारत ने ईरान से तेल की ख़रीद को शून्य कर दिया था. अब रूस से तेल की ख़रीद भले ही कम हो गई हो लेकिन पर्दे के पीछे से वह चल ही रही है. बल्कि फ़रवरी-मार्च में तो उसमें उछाल ही आया था.”

वह कहती हैं, “भारत ने अभी तक यह साफ़-साफ़ नहीं कहा है कि हम रूस से तेल ख़रीद रहे हैं या बंद कर चुके हैं. हम कुछ भी साफ़ नहीं बोल रहे हैं, एक अस्पष्टता बनाए रखी है, लेकिन अच्छी बात यह है कि रूस से तेल ख़रीद जारी है. हमने भले ही इसे कम किया है लेकिन पूरी तरह बंद नहीं किया गया है.”
ब्रिक्स की परेशानी
रूसी विदेश मंत्री के ब्रिक्स करेंसी के प्रस्ताव पर श्रीवास्तव कहते हैं, “हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि चीन जिस चीज़ को बढ़ावा देता है वह ब्रिक्स का एजेंडा न बने. भले ही हम डॉलर से प्रेम न करें लेकिन उसे हम मीडियम ऑफ़ एक्सचेंज के रूप में देखते हैं और उसकी जगह लेना अभी आसान नहीं है.”
लेकिन स्मिता शर्मा को लगता है कि गुरुवार से शुरु होने वाला विदेश मंत्रियों का सम्मेलन मुश्किल परिस्थितियों में हो रहा है.
वो कहती हैं, “ब्रिक्स में इस समय काफ़ी ज़्यादा ध्रुवीकरण हो चुका है. ईरान और यूएई की वजह से जो मतभेद पैदा हुए हैं उसके कारण पिछले दौर की बातचीत के बाद कोई बयान जारी नहीं किया गया था. चीन ने अपने विदेश मंत्री को इस सम्मेलन में यह कहकर नहीं भेजा कि डोनाल्ड ट्रंप चीन में हैं. उसने अपने राजदूत को शामिल होने को कहा है.”
“ब्रिक्स में भारत अलग-थलग स्थिति में है क्योंकि रूस-चीन-ईरान एक साथ खड़े हैं और भारत भले ही रास्ता बदल रहा हो लेकिन उसने दिखा दिया है कि वह इसराइल के और अमेरिका के साथ है. ईरान के साथ बातचीत जारी है लेकिन रिश्तों में एक खटास तो आई ही है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.