
आंध्र प्रदेश के अनंतपुर ज़िले में छह पीढ़ियों का एक बड़ा संयुक्त परिवार रहता है. इस घर में एक दिन के खाने के लिए 50 किलो चावल की बोरी की ज़रूरत होती है. रविवार को मांसाहारी खाने के लिए एक मेमना चाहिए होता है. अगर शाम को पकौड़े खाने हो तो 15 किलो बेसन चाहिए होता है क्योंकि उस परिवार में पूरे 83 लोग हैं.
बीबीसी की टीम इस संयुक्त परिवार के साथ पूरा दिन बिताने के लिए कुरलापल्ली पहुंची. उनसे जाना कि इतने सारे सदस्य एक साथ कैसे रहते हैं और वे एक साथ क्या करते हैं.
कुर्लापल्ली कल्याणदुर्ग से सात किलोमीटर दूर स्थित है.
इस गांव में 400 घर और 2,000 की आबादी है. गांव में दाख़िल होते ही दाईं ओर मुड़ें और आपको सड़क पर आमने-सामने दो बड़े घर दिखाई देंगे. एक ही संयुक्त परिवार इन दोनों घरों में रहता है.
सड़क के एक किनारे बने दो मंज़िला मकान में प्रवेश करते ही सबसे पहले आपको रसोईघर दिखाई देगा. उसके पीछे दो मंज़िला बैलगाड़ी का शेड है. उस मकान के ठीक सामने एक और तीन मंज़िला मकान है, और उसी सड़क पर आगे जाने पर एक और मकान है जिसके साथ एक बड़ा खाली प्लॉट है. वहां ट्रैक्टर और बसें खड़ी हैं. अब ये तीन मकान काफी नहीं हैं, इसलिए परिवार चौथा मकान भी बनवा रहा है.
इतने बड़े परिवार की मुख्य आजीविका कृषि पर निर्भर है. घर के सभी सदस्य मिलकर फसलें उगाते हैं, साथ ही दुधारू गाय और भेड़ें भी पालते हैं.

दोनों बुज़ुर्गों पर निर्भर करता है फ़ैसला
इस संयुक्त परिवार में 83 सदस्य हैं और इसके मुखिया हनुमंथा रायडू और मुत्यालप्पा हैं.
दूध दुहने से लेकर खेती और व्यापार तक, हर चीज़ का फ़ैसला वही लोग करते हैं.
परिवार के मुखिया हनुमंथा रायडू ने कहा कि इतने बड़े परिवार के हर सदस्य के लिए आजीविका का साधन उपलब्ध कराना उनकी ज़िम्मेदारी है. उन्होंने कहा कि घर में कोई भी, यहां तक कि उनके साले मुत्यालप्पा भी, उनके ख़िलाफ़ नहीं बोलते और उनका सम्मान करते हैं.
वो बताते हैं, “मेरे पिता और दादाजी के देहांत के बाद से परिवार का बोझ मुझ पर आ गया है. तब से मैं अकेले ही इस परिवार की देखभाल कर रहा हूँ. हम बच्चों को पढ़ाते हैं और बाकी को खेती-बाड़ी का काम सौंप देते हैं.”
“हम एक-दूसरे का सहारा बनकर अपना जीवन यापन करते हैं. अब तक हमारे बीच कोई समस्या या मतभेद नहीं हुआ है. हम सबने मिलकर कड़ी मेहनत की है. वे मेरी हर बात मानते हैं. मेरे साले भी मेरी बात सुनते हैं. मेरे और मेरे साले के इतने सारे बेटे होने के बावजूद, कोई कुछ नहीं कहता.”

सबके पास एक ही रास्ता है
मुत्यालप्पा ने कहा कि वे अपने दादा-दादी के समय से इसी तरह साथ रहे हैं और भविष्य में भी इसी तरह साथ रहने की कोशिश कर रहे हैं.
उन्होंने आगे कहा, “हमारे चार जीजा हैं, और हम दोनों भाई हैं. हम अपने दादाओं के ज़माने से इसी तरह साथ रहते आए हैं. हम भविष्य में भी इसी तरह साथ रहने की कोशिश कर रहे हैं. हम सब सुबह एक साथ बैठते हैं और हर किसी को उसका काम सौंप देते हैं. हम घर के सारे काम, खाने-पीने, कपड़ों आदि का ध्यान रखते हैं. हम कुछ बाहरी लोगों को भी काम पर बुलाते हैं. हम अपने जीजाओं के बच्चों को अपने घर में पालते हैं और उनके बच्चों को भी अपने घर में ही रखते हैं. यही हमारा तरीका है.”
मुत्यालप्पा ने कहा कि इसी साझा आधार के कारण वे लोग, जिन्होंने कभी गरीबी का सामना किया था, अब इतना अच्छा जीवन जी पा रहे हैं.
उन्होंने कहा, “शुरुआत में हमने बहुत गरीबी झेली. हमारे पास ओढ़ने के लिए कंबल भी नहीं था, खाने के लिए सिर्फ एक वक्त का खाना मिलता था. उस दौर से उठकर आज हम इस मुकाम पर पहुंचे हैं. यह सब सिर्फ इसलिए मुमकिन हुआ क्योंकि हम सब साथ थे. अगर हम अलग-अलग होते तो कभी इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाते.”
“जिस घर में हम अभी रह रहे हैं, उसे बनाने में 20 करोड़ रुपये लगे. क्या अकेले रहकर यह मुमकिन हो पाता? मेरे पिता के पास 60 एकड़ ज़मीन थी, और उनके गुज़र जाने के बाद हम सबने मिलकर 75 एकड़ ज़मीन खरीदी. इसीलिए हम सबको कहते हैं, ‘अलग मत होइए, अगर हम ऐसे साथ रहेंगे तो सब कुछ ठीक हो जाएगा’.”
परिवार के प्रबंधन की ज़िम्मेदारी संभालने वाले महेश का कहना है कि परिवार के दोनों मुखिया सुबह चाय पीते समय तय करते हैं कि कौन क्या काम करेगा.
उन्होंने कहा, “मेरे पिता का नाम हनुमंथा रायडू है. सभी बड़े-बुज़ुर्ग सुबह चाय पीते हैं और आधे घंटे तक बातें करते हैं, फिर हम तय करते हैं कि किसे क्या काम सौंपना है. मेरा काम गाड़ियों की देखभाल करना और घर में ज़रूरत का सामान लाना है. मेरा दूसरा भाई टमाटर जैसी हमारी उगाई हुई फसलों को एक छोटे ट्रक में भरकर बाज़ार ले जाता है. इस तरह हम खेती, भेड़ चराना और गायों की देखभाल करने जैसे अपने-अपने काम करते हैं. अब तक हम बिना किसी परेशानी के अपना जीवन यापन कर रहे हैं.”

परिवार के मुखिया, हनुमंथा रायडू, दादा चिम्मला नागप्पा, इस परिवार की पहली पीढ़ी के मुखिया थे. उनकी दो पत्नियां थीं और उन्होंने अपनी पहली पत्नी की बेटी का विवाह येल्लप्पा से कर दिया था.
तब से वह हमेशा दामाद ही रहे हैं.
बाद में, दूसरी पत्नी के दो बेटे और दो बेटियाँ हुईं. येल्लप्पा के चार बेटे और दो बेटियाँ एक साथ रहते थे.
येल्लप्पा और नागप्पा की मृत्यु के बाद, उनके उत्तराधिकारी, हनुमंथा रायडू और मुत्यालप्पा, अब घर में बड़े हैं और निर्णय लेते हैं.
मुत्यालप्पा के पास डाकिया के रूप में काम करने के अलावा कोई और नौकरी नहीं है.

सुबह के दैनिक कार्यों के बाद, परिवार के कुछ सदस्य खेतों में काम करने चले जाते हैं. कुछ लोग मवेशियों की देखभाल करते हैं. कुछ लोग दूध दुहते हैं, जबकि अन्य भेड़ों की देखभाल करते हैं, गोबर इकट्ठा करते हैं और गौशाला की सफाई करते हैं. घर की महिलाओं को खाना पकाने का काम सौंपा जाता है. सभी बच्चे सुबह स्कूल के लिए निकल जाते हैं.
हनुमंथा रायडू ने कहा कि वे आपस में किसी भी तरह के विवाद से बचने के लिए घर पर ही मिलकर शादियां भी करवा रहे हैं.
हनुमंथा रायडू ने कहा, “मैंने अपने बेटों और अपने साले के बेटों की शादी एक ही दिन नौ धार्मिक जगहों पर करवाई. मैंने कसम खाई थी कि अपने बेटे महेश की शादी वहीं करूंगा. अगर मैं अपने किसी एक बेटे की शादी करता, तो झगड़े होते, कहते कि उसने सिर्फ़ अपने बेटे की शादी की है, बाकी सबको छोड़ दिया है. इसलिए, हम परिवार के सभी 9 लड़कों को एक ही समय पर धार्मिक जगह ले गए और उनकी शादी एक ही समय पर करवाई.”

पारंपरिक तरीके से बनता है खाना
83 लोगों के लिए खाना पकाने का सारा काम एक ही रसोईघर में होता है. और वह भी लकड़ी के चूल्हे पर, जो इस संयुक्त परिवार की खासियत है. इस घर में छह पीढ़ियों से खाना पकाने के पारंपरिक तरीके अपनाए जा रहे हैं.
महेश बताते हैं कि उनके परिवार में एक ही रसोईघर है. एक ही जगह पर तीन घर होने के बावजूद, वे जहां भी जगह मिलती है वहीं सो जाते हैं. लेकिन वे एक ही बर्तन में 83 लोगों के लिए खाना बनाते हैं.
महेश बताते हैं, “हमारे यहाँ 83 लोगों के लिए सिर्फ एक ही बर्तन है. हम आज भी लकड़ी का चूल्हा इस्तेमाल करते हैं. जो भी बनाना होता है, बेलन से ही बनाते हैं. हम सब कुछ प्राकृतिक तरीके से करते हैं. हमने आज तक गैस या चक्की का इस्तेमाल नहीं किया है. हम आज भी पुराने तरीकों का पालन कर रहे हैं. हम छह पीढ़ियों से साथ मिलकर खाना बना रहे हैं, इसलिए हमें कोई परेशानी नहीं होती. सभी लोग एक ही तरह का खाना खाते हैं. आज भी, चाहे कुछ भी हो जाए, हम सबके लिए एक ही तरह का खाना बनाते हैं.”
इस घर में नाश्ते की शुरुआत रागी संगति की गांठें बनाने से होती है. खेतों में काम करने जाने वाले लोग इन गांठों को अपने टिफिन बॉक्स में पैक करके निकल जाते हैं. घर की एक महिला अनुराधा बताती हैं कि गांठें बनाने के लिए दो महिलाएं एक बड़े पत्थर पर गांठों को पीसती हैं.
अनुराधा ने कहा, “हम सबके लिए एक जैसा खाना बनाते हैं. हम एक ही तरह की करी, चावल और दलिया बनाते हैं. अब हमारे यहाँ मधुमेह के मरीज़ हैं, इसलिए हम उनके लिए चपाती, दलिया और रोटी बनाते हैं. अगर हमें हफ्ते में एक बार सबके लिए पकौड़े, वड़ा और मिठाई बनानी हो, तो हम सबके लिए बनाते हैं. हम थोड़ा-थोड़ा करके बनाते हैं. हमारे घर के लिए हमें रोज़ 50 किलो चावल मिलता है.”
राजेश्वरी इतने बड़े संयुक्त परिवार में खाना पकाने का सारा काम संभालती हैं. दो अन्य लोगों के साथ खेतों में काम करने जाने वालों के लिए गाड़ी भेजने के साथ-साथ, वह दिन में तीन बार खाना बनाने और सभी बच्चों की देखभाल भी करती हैं.
राजेश्वरी कहती हैं, “हम एक दिन में एक पैकेट तेल इस्तेमाल कर लेते हैं. घर में 80 लोगों के अलावा 20-30 और लोग हैं. हमें उनके लिए भी खाना बनाना पड़ता है. हमें तीन किलो दाल पकानी होती है, चटनी बनानी होती है. चटनी को हम ओखली में पीसते हैं. फिर उसे लकड़ी के चूल्हे पर पकाते हैं. सुबह दलिया और दोपहर में चावल बनाते हैं. अगर टिफिन बनाना हो तो रात में बनाते हैं. चपाती और पकौड़े बनाने के लिए 15 किलो मैदा चाहिए होता है.”

‘रविवार को एक भेड़ और 10 किलो चिकन’
महेश बताते हैं, “हम सुबह रागी मुड्डा जरूर बनाते हैं. दोपहर में चावल और करी बनाते हैं. अगर कुछ खास खाना होता है, तो रात में बनाते हैं. सुबह हम सब अपने-अपने काम पर निकल जाते हैं. चूंकि हम सब रात में एक जगह पहुंचते हैं, इसलिए खाना रात में ही बनाते हैं, चाहे वो खास हो, मांसाहारी हो या टिफिन. हम जो भी खाते हैं, सबके लिए एक ही तरह का खाना बनाते हैं.”
राजेश्वरी ने कहा कि जब त्योहार और मेले आते हैं, तो उन्हें दो भेड़ें और 20 किलो चिकन लाना पड़ता है.
“त्योहार आने पर हमें दो भेड़ें और 20 किलो चिकन पकाना पड़ता है. अगर रविवार को बनाना हो तो एक भेड़ और 10 किलो मुर्गा पकाना पड़ता है.”

सरकारी स्कूलों में बच्चों की शिक्षा…
इस संयुक्त परिवार में सभी लोग घर पर कन्नड़ बोलते हैं. इतने बड़े परिवार में कोई भी सरकारी या निजी नौकरी नहीं करता है.
उनके पास संयुक्त संपत्ति के रूप में चार ट्रैवल बसें भी हैं. महेश ने बताया कि इंटरमीडिएट और डिग्री की पढ़ाई पूरी करने के बावजूद, परिवार के बड़े सदस्यों के लिए इतने बड़े परिवार की देखभाल करना मुश्किल है, इसलिए उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़कर घर के काम-काज संभाले हैं.
उन्होंने आगे कहा, “हमारे परिवार में किसी ने कभी काम नहीं किया. हमने उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं की. हमने इंटरमीडिएट और डिग्री तक पढ़ाई की. हमने तय किया था कि हम खेती करके अपना जीवन यापन करेंगे और अब हम सब पढ़ाई छोड़कर खेती और घर के कामों में लगे हुए हैं. चूंकि हमारे बड़े-बुजुर्ग भी बूढ़े हो रहे हैं और उनकी देखभाल करना मुश्किल हो रहा है, इसलिए हम अपनी पढ़ाई छोड़कर यहां उनकी देखभाल कर रहे हैं.”
उन्होंने कहा कि वे अपने परिवार के सभी बच्चों को शिक्षित कर रहे हैं, और वे उन सभी को सरकारी कॉलेजों और स्कूलों में पढ़ा रहे हैं.
महेश ने कहा, “हम अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे रहे हैं. हम उनकी देखभाल के लिए मौजूद हैं, इसलिए हम चाहते हैं कि वे आगे बढ़ें. 32 बच्चे पढ़ रहे हैं. उनमें से छह इंटरमीडिएट में हैं. कुछ डिग्री हासिल कर रहे हैं. हम सरकारी कॉलेजों और स्कूलों में प्रथम श्रेणी से लेकर डिग्री तक सभी को शिक्षा दे रहे हैं. हम सिर्फ एक-दो करके नहीं, बल्कि सभी के साथ समान व्यवहार कर रहे हैं. आठ छोटे बच्चे आंगनवाड़ी जाते हैं. बाकी सभी प्रथम श्रेणी से लेकर डिग्री तक की पढ़ाई कर रहे हैं.”

‘हम अपनी ज़रूरत के हिसाब से ही उत्पादन करते हैं’
वे इस परिवार की ज़रूरतों के हिसाब से अनाज और सब्ज़ियाँ उगाते हैं.
महेश ने बताया कि वे ज़रूरत के हिसाब से ही अपने पास रखते हैं और बाकी बाज़ार में बेच देते हैं.
महेश बताते हैं, “हमारे पास कुल 120 एकड़ ज़मीन है. हम मुख्य रूप से मिर्च, बैंगन, टमाटर, तरबूज़, पपीता और मूंगफली उगाते हैं. हम खुद ही बेचते भी हैं. हम तरबूज़ और पपीते दिल्ली, टमाटर और बैंगन चेन्नई भेजते हैं. हम इन्हें बिचौलियों को नहीं सौंपते. हम इन्हें खुद अपने वाहनों में लादकर सीधे बाज़ार ले जाते हैं और बेचते हैं. हम अपनी कमाई से ही अपना गुज़ारा करते हैं. हम अपने घर के लिए 5 एकड़ ज़मीन पर धान उगाते हैं. हम चक्की में धान पीसकर ज़रूरत के हिसाब से घर में रखते हैं. बाकी धान बाज़ार भेज देते हैं.”

कभी कोई झगड़ा नहीं होता
इस जॉइंट फ़ैमिली में छह सास और 14 बहुएं हैं. महेश कहते हैं कि उन्होंने अपने घर की औरतों के बीच कभी कोई झगड़ा नहीं देखा.
परिवार की सबसे बड़ी महिला अनुराधा कहती हैं, “हम छह सास और 14 बहुएं, सब बहुत अच्छे से रहती हैं. कुछ अपना काम गार्डन में करती हैं, कुछ घर पर करती हैं. कोई किसी के लिए प्रॉब्लम नहीं खड़ी करता. अगर कुछ भी होता है, तो हम उसे तुरंत संभाल लेते हैं. कुछ बहुत ज़्यादा बातें करती हैं लेकिन कुछ और नहीं करतीं. अगर आपस में कोई झगड़ा या बहस भी हो जाए, तो वे फिर नॉर्मल तरीके से मिल-जुल जाती हैं.”

राजेश्वरी ने कहा कि भले ही हम थोड़ी देर के लिए आपस में झगड़ते थे, लेकिन शाम को हम सब मिलकर खूब मस्ती करते थे.
उनका कहना है कि जो महिलाएं इस घर को छोड़कर दूसरे गांवों में बहू बनकर गई हैं, उन्हें अपने ससुराल वालों द्वारा परिवार की तारीफ सुनकर गर्व महसूस होता है.
राजेश्वरी कहती हैं, “मैं इस घर की पाँचवीं पीढ़ी हूँ. मैं इस घर की सबसे बड़ी पोती हूँ और मेरे दादाजी ने मुझे बचपन से यहीं पढ़ाया-लिखाया है. मेरे चाचा और चाची भी संयुक्त परिवार में रहकर बहुत खुश हैं. आजकल तो अगर एक या दो भाई ही रह जाते हैं, तो वे संपत्ति के लिए अलग हो जाते हैं. लेकिन हमारे गाँव में लोग इस बात पर गर्व करते हैं कि 83 लोग आज भी साथ हैं.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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