जागरण न्यूज नेटवर्क, नई दिल्ली। धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को शिक्षा मंत्री पद से अपना इस्तीफा सौंप दिया। नीट पेपर लीक के खिलाफ दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर देश के विभिन्न शहरों में छात्र प्रदर्शनों के बीच उन्होंने पद छोड़ा है।
वैसे, शिक्षा मंत्रालय में प्रधान का चार साल और छह महीने का कार्यकाल विवादों से मुक्त नहीं रहा। इनमें यूजीसी का जाति-समता नियम, नीट पेपर लीक और गैर-भाजपा शासित राज्यों के साथ लगातार टकराव जैसे मुद्दे शामिल हैं।
मोदी सरकार में प्रधान की वापसी असहज स्थितियों में हुई। जून 2024 में जब प्रधान नवगठित 18वीं लोकसभा में सांसद के तौर पर शपथ लेने के लिए खड़े हुए, तो आइएनडीआइए के सदस्यों ने “नीट” और “शर्म करो, शर्म करो” के नारे लगाकर उन्हें टोका।
विपक्षी दल उस साल नीट-यूजी में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ अपनी नाराजगी प्रकट कर रहे थे। प्रधान के लिए सबसे अधिक परेशान करने वाला मुद्दा नीट पेपर लीक रहा। उनके कार्यकाल में दो बार (2024 और 2026) यह मुद्दा सामने आया।
2024 में पेपर लीक और ग्रेस मार्क्स में विसंगतियों के आरोप लगे। बिहार और दूसरी जगहों पर अनियमितताओं की खबरें आईं। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में दखल दिया और सीबीआइ जांच कराई गई। एनटीए प्रमुख को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी। इस साल यह संकट फिर से सामने आया।
तीन मई को हुई नीट-यूजी को पेपर लीक के आरोपों के बाद 12 मई को रद कर दिया गया। इससे लाखों छात्र परेशान हुए और सीजेपी ने जंतर-मंतर पर धरना दिया। 2026 की शुरुआत में यूजीसी ने उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाले नियमों की अधिसूचना जारी की।
कथित तौर पर इसका उद्देश्य शैक्षणिक संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव से निपटना था। लेकिन, संभावित दुरुपयोग, रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन और सामाजिक विभाजन के डर से इन नियमों की व्यापक आलोचना हुई।
आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने इसके कार्यान्वयन पर रोक लगा दी। 2022 में शुरू की गई पीएम-श्री योजना का कई गैर-भाजपा शासित राज्यों ने विरोध किया।
तमिलनाडु, केरल, बंगाल और पंजाब ने या तो सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करने में देरी की या इससे इन्कार कर दिया। इन राज्यों का कहना था कि केंद्र सरकार जरूरी फंड को राष्ट्रीय शिक्षा नीति को मानने की शर्त से जोड़ रही है।
इस साल सीबीएसई की 12वीं क्लास की बोर्ड परीक्षाओं के लिए आन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) लागू करने पर मूल्यांकन में कथित गलतियों, खराब स्कैन क्वालिटी, तकनीकी दिक्कतों और मार्किंग में विसंगतियों को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया।
जनवरी 2026 में हुए आंतरिक परीक्षण में 36 से ज्यादा ऐसी कमियों का पता चला था, जिन्हें ओएसएम लागू करने से पहले नजरअंदाज कर दिया गया था।