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पाकिस्तान ने एक पत्र लिखकर संयुक्त राष्ट्र से कहा है कि वह सिंधु जल संधि के बारे में भारत के ‘एकतरफ़ा फ़ैसले’ का नोटिस ले क्योंकि इस संधि को निलंबित रखने से दक्षिण एशिया की शांति और सुरक्षा के लिए गंभीर परिणाम हो सकते हैं.
बीते गुरुवार को संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि आसिम इफ़्तिख़ार ने इस सिलसिले में पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री की ओर से ये पत्र संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष को सौंपा.
भारत की ओर से इस मामले पर फ़िलहाल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.
भारत ने पिछले साल जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में चरमपंथी हमले के बाद पाकिस्तान के साथ कूटनीतिक संपर्क सीमित करने के अलावा नदियों के पानी के बंटवारे से संबंधित 1960 की सिंधु जल संधि को भी निलंबित कर दिया था.
संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के मिशन ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ‘एक्स’ पर एक बयान जारी किया, जिसमें कहा गया कि भारत की ओर से एक साल से सिंधु जल संधि के निलंबन के कारण शांति और सुरक्षा के अलावा मानवीय मामलों में भी बेहद गंभीर प्रभाव पड़ रहे हैं.
पत्र में सुरक्षा परिषद पर ज़ोर दिया गया कि वह इस ‘ख़तरनाक स्थिति’ का नोटिस ले और भारत से कहे कि वह सिंधु जल संधि को बहाल करे.
एक साल से सिंधु जल संधि के निलंबन से पाकिस्तान को कितना नुक़सान हुआ?
क्या इसके निलंबित रहने से पाकिस्तान को भविष्य में पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है और इससे किसानों और खेती पर कैसे प्रभाव पड़ेंगे?
यह जानने के लिए बीबीसी उर्दू ने जल विशेषज्ञों से बात की –
जल समझौता रोके जाने से पाकिस्तान को कितना नुक़सान?
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सिंधु जल संधि के तहत भारत को ब्यास, रावी और सतलुज नदी के पानी पर जबकि पाकिस्तान को तीन पश्चिमी नदियों- सिंधु, चिनाब और झेलम के पानी पर अधिकार दिया गया था. वैसे, इन तीनों नदियों (सिंधु, चिनाब, झेलम) के भी 20 फ़ीसद पानी पर भारत का अधिकार है.
सिंधु जल संधि के पूर्व एडिशनल कमिश्नर शीराज़ मेमन का कहना है कि इस संधि के तहत दोनों देशों की कुछ बुनियादी ज़िम्मेदारियां हैं. इनमें साल में कम से कम एक बार दोनों देशों के वॉटर कमिश्नर्स की बैठक करना, नदियों में पानी के बहाव का डेटा साझा करना और दोनों ओर नदियों पर जारी प्रोजेक्ट्स पर दूसरे देशों की निरीक्षण टीमों के दौरे शामिल हैं.
उनका कहना है कि दोनों देशों के सिंधु जल कमिश्नर्स आमतौर पर मई के महीने में यह बैठक करते हैं और दोनों देशों की सरकारों को इसकी सालाना रिपोर्ट एक जून को पेश की जाती है. शीराज़ मेमन के अनुसार इस संधि पर अमल रोकने का मतलब यह है कि इससे जुड़ी बैठकें, मुआयना दौरे या नदियों में पानी के बहाव की डेटा शेयरिंग नहीं होगी.
पूर्व सिंधु जल कमिश्नर जमात अली शाह कहते हैं कि अगर एक पक्ष किसी भी समझौते से पीछे हट जाता है तो यह उसकी गंभीरता की कमी को ज़ाहिर करता है. बीबीसी से बात करते हुए जमात अली शाह ने कहा कि अगर पूरे एक साल पर नज़र डाली जाए तो इससे पाकिस्तान को बहुत ज़्यादा नुक़सान तो नहीं हुआ है लेकिन आगे चलकर इसके ख़राब असर हो सकते हैं.
उनका कहना था कि ज़ाहिर है कि अगर एक पक्ष दशकों पुराने समझौते को निलंबित रखता है और उसे ख़त्म करने की कोशिश करता है तो दूसरे पक्ष की चिंता बढ़ती है. यही वजह है कि पाकिस्तान इस मामले को सुरक्षा परिषद ले गया है.
शाह के अनुसार पाकिस्तान के लिए यह संधि कोई रियायत नहीं थी, बल्कि “इसमें हमने तीन नदियां भारत को देने का फ़ैसला किया था. हर समझौते की एक पवित्रता होती है और वह बरक़रार रहनी चाहिए. हमारे लिए सबसे अहम इस संधि की साख है.”
वह कहते हैं, “मैं नहीं समझता कि भारत में इतनी क्षमता या शक्ति है कि वह पाकिस्तान का पानी रोक सके लेकिन भविष्य में अगर उसने ऐसा करने की कोशिश की तो इसके प्रभाव पाकिस्तान पर निश्चित रूप से पड़ेंगे.”
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पाकिस्तान नेशनल असेंबली के पूर्व सदस्य और जल मामलों के विशेषज्ञ मोहसिन लेग़ारी कहते हैं कि सिंधु जल संधि के तहत भारत बहते हुए पानी में स्टोरेज बना सकता है.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “मिसाल के तौर पर भारत चिनाब पर मौजूद अपने बांधों को अचानक भरना शुरू कर देता है जिससे पाकिस्तान की ओर पानी का बहाव कम हो जाता है.”
उनके मुताबिक़, इसी तरह भारत की ओर से अचानक इन बांध को ख़ाली कर दिया जाता है जिसकी वजह से बहुत ज़्यादा पानी पाकिस्तान की तरफ़ आ जाता है.
लेग़ारी कहते हैं कि सिंधु जल संधि के ज़रिए दोनों देशों के अधिकारी पानी के बहाव से जुड़े मामलों पर एक-दूसरे से संपर्क में रहते थे लेकिन एक साल से यह संपर्क न होने के कारण दोनों देश इन आंकड़ों को साझा नहीं कर रहे हैं.
लेग़ारी कहते हैं कि फसल के लिए वक़्त बहुत अहम होता है और अगर तय समय पर पानी न मिले तो नुक़सान किसान को ही होता है.
‘फ़ौरी ख़तरा नहीं, लेकिन…’
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जमात अली शाह कहते हैं कि अगर भारत आगे चलकर संधि का उल्लंघन करते हुए पानी रोकने वाले प्रोजेक्ट्स बनाता है तो पाकिस्तान की तरफ़ पानी के बहाव पर फ़र्क़ पड़ेगा.
उन्होंने कहा, “यह हो सकता है कि जब हमें पानी चाहिए हो तब न मिले और जब पानी की मांग कम हो तब ज़रूरत से ज़्यादा पानी हमारे पास हो.”
जमात अली शाह कहते हैं कि इस संधि के निलंबन से पाकिस्तान की खेती को फ़िलहाल नुक़सान नहीं पहुंच रहा है. उनका कहना है कि अगर भारत कोई नया प्रोजेक्ट शुरू करता है तो अगले पांच से दस सालों में पाकिस्तान को नुक़सान हो सकता है.
उनका कहना था कि पाकिस्तान के लिए मुश्किल यह है कि अगर भारत की ओर से पानी के बहाव की जानकारी नहीं दी जाती तो इससे योजना बनाने पर असर पड़ सकता है, “कभी ज़रूरत से कम पानी मिलेगा, तो कभी बहुत ज़्यादा पानी बाढ़ के खतरों को बढ़ा देगा.”
क्या सुरक्षा परिषद भारत पर दबाव डाल सकती है?
पाकिस्तान ने सुरक्षा परिषद को जो ख़त लिखा है उसके बारे में जमात अली शाह कहते हैं कि यह पाकिस्तान का एक प्रतीकात्मक क़दम ही है.
उनके मुताबिक़ पाकिस्तान इस मामले पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस) का रुख़ कर सकता है.
अगर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय पाकिस्तान के पक्ष में फ़ैसला देता है तो फिर पाकिस्तान यह कहते हुए संयुक्त राष्ट्र के पास जा सकता है कि भारत इस फ़ैसले को नहीं मान रहा है, इसलिए उस पर प्रतिबंध लगाए जाएं.
वह कहते हैं कि पाकिस्तान के पास यूरोपीय आयोग और अमेरिका जैसे फ़ोरम भी हैं जहां उसे साबित करना होगा कि भारत एक अंतरराष्ट्रीय संधि का उल्लंघन कर रहा है, इसलिए उस पर कार्रवाई की जानी चाहिए.
सिंधु जल संधि क्या है?
भारत और पाकिस्तान ने सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के पानी के बंटवारे के लिए विश्व बैंक की मध्यस्थता में नौ साल की बातचीत के बाद सितंबर 1960 में सिंधु जल संधि की थी.
उस समय भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्राध्यक्ष जनरल अय्यूब ख़ान ने कराची में इस समझौते पर दस्तख़त किए थे. तब यह उम्मीद जताई गई थी कि यह संधि दोनों देशों के किसानों के लिए ख़ुशहाली लाएगी और शांति, सद्भावना व दोस्ती की गारंटी होगी.
नदियों के पानी के बंटवारे का यह समझौता कई युद्धों, विवादों और झगड़ों के बावजूद 65 वर्षों से बरक़रार था.

इस संधि के तहत भारत को ब्यास, रावी और सतलुज नदियों के पानी पर पूरा अधिकार दिया गया जबकि पाकिस्तान को तीन पश्चिमी नदियों- सिंधु, चिनाब और झेलम के पानी पर अधिकार दिया गया. समझौते के अनुसार इन नदियों के 80 प्रतिशत पानी पर पाकिस्तान का हक़ है.
भारत को पश्चिमी नदियों के बहते पानी से बिजली पैदा करने का अधिकार है लेकिन समझौते के अनुसार वह पानी जमा करने या उसके बहाव को कम करने वाली परियोजनाएं नहीं बना सकता.
इसके विपरीत उसे पूर्वी नदियों यानी रावी, ब्यास और सतलुज पर किसी भी तरह के प्रोजेक्ट बनाने का अधिकार है और इस पर पाकिस्तान एतराज़ नहीं कर सकता.
समझौते के तहत एक स्थायी सिंधु आयोग भी बनाया गया जो किसी विवादास्पद परियोजना की स्थिति में समझौता के लिए काम करता है. हालांकि अगर आयोग हल नहीं निकाल पाता, तो संधि के अनुसार सरकारें उसे हल करने की कोशिश करती हैं.
इसके अलावा विशेषज्ञों की मदद लेने या विवादों के हल के लिए ‘कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन’ में जाने का तरीक़ा भी सुझाया गया था.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.