पीटीआई, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि उपभोक्ताओं से उस सेवा का शुल्क नहीं वसूला जा सकता, जो उन्हें अब उपलब्ध ही नहीं कराई जा रही है। अदालत ने कहा कि टैरिफ निर्धारण केवल गणितीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि नियामकीय संतुलन का विषय है, जिसमें कंपनियों की लागत वसूली और उपभोक्ता हितों के बीच संतुलन जरूरी है।
न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और आलोक आराधे की पीठ ने दिल्ली विद्युत नियामक आयोग (डीईआरसी) की अपील स्वीकार करते हुए विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण (एपीटीईएल) के फरवरी 2025 के आदेश को रद कर दिया और डीईआरसी का 2019 का आदेश बहाल कर दिया।
मामला रिठाला स्थित 108 मेगावाट गैस आधारित अस्थायी बिजली संयंत्र से जुड़ा था, जिसे टाटा पावर दिल्ली वितरण लिमिटेड (टीपीडीडीएल) ने राष्ट्रमंडल खेल-2010 से पहले बिजली आपूर्ति बढ़ाने के लिए स्थापित किया था।
संयंत्र की अवधि केवल पांच से छह वर्ष तय थी और मार्च 2018 के बाद इससे बिजली आपूर्ति बंद हो गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे में उपभोक्ताओं से उस सेवा का भुगतान नहीं कराया जा सकता, जो उन्हें मिल ही नहीं रही।
अदालत ने विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 61(डी) का हवाला देते हुए कहा कि शुल्क निर्धारण करते समय आयोग को उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा और बिजली लागत की उचित वसूली, दोनों बातों को ध्यान में रखना होता है। यह उपभोक्ता हितों को गौण नहीं, बल्कि केंद्रीय वैधानिक सिद्धांत के रूप में स्थापित करता है।
डीईआरसी ने नवंबर 2019 में संयंत्र के लिए वित्त वर्ष 2017-18 तक छह प्रतिशत वार्षिक दर से मूल्यOास की अनुमति दी थी, जिससे 83.34 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत हुई। हालांकि लगभग 94.59 करोड़ रुपये की शेष पूंजी लागत और रखरखाव व्यय को टैरिफ में शामिल करने की अनुमति नहीं दी गई, क्योंकि संयंत्र ने मार्च 2018 के बाद बिजली आपूर्ति बंद कर दी थी।
टीपीडीडीएल ने इस आदेश को एपीटीईएल में चुनौती दी थी। एपीटीईएल ने फरवरी 2025 में कहा था कि डीईआरसी ने संयंत्र की उपयोगी आयु 15 वर्ष मानी थी, इसलिए मूल्यOास भी उसी अवधि के आधार पर होना चाहिए।
न्यायाधिकरण ने डीईआरसी का आदेश रद कर मामले को दोबारा आयोग को भेज दिया था।हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बिजली खरीद समझौता केवल मार्च 2018 तक के लिए था और टीपीडीडीएल ने इसे कभी चुनौती नहीं दी। इसी आधार पर अदालत ने डीईआरसी के पक्ष में फैसला सुनाया।