जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर शिक्षा के अधिकार अधिनियम (आरटीइ) के तहत गरीब बच्चों के निजी स्कूलों में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा पाने के अधिकार पर मुहर लगाई है।
कोर्ट ने कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत आस-पड़ोस के स्कूल राज्य सरकार की ओर से भेजे गए छात्र को बिना किसी देरी के प्रवेश देने को बाध्य हैं।
शीर्ष अदालत ने कहा कि यह राष्ट्रीय मिशन होना चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट ने लखनऊ पब्लिक स्कूल, एलडिको की अपील खारिज करते हुए बच्चे को प्रवेश देने के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी है।
स्कूल में एडमिशन पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने हाई कोर्ट के आदेश में दखल देने से इनकार करते हुए अपने फैसले में कहा कि स्कूल को उस छात्र को प्रवेश देना अनिवार्य है जिसका नाम सरकार की ओर से स्कूल को भेजी गई सूची में शामिल है।
कोर्ट ने कहा कि वह पड़ोस के स्कूल के उस संवैधानिक और वैधानिक दायित्व को दोहराते हैं कि वह राज्य सरकार द्वारा भेजे गए छात्रों को बिना किसी देरी के प्रवेश दें। उनका ये दायित्व बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिनियम 2009 की धारा 12 और यूपी बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा नियम, 2011 के नियम 83 के संवैधानिक और वैधानिक दर्शन के अनुरूप है।
कोर्ट ने कहा कि यदि आरटीई कानून के निर्देशों को उसकी मूल भावना के अनुरूप अक्षरश: लागू नहीं किया जाएगा तो इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि शिक्षा का अधिकार जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत मौलिक अधिकार है, एक कोरा वादा बनकर रह जाएगा।
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कोर्ट ने कहा कि आरटीई अधिनियम की धारा 38 के तहत राज्यों को इस अधिनियम के प्रविधानों को लागू करने के लिए नियम अधिसूचित करने का अधिकार दिया गया है।
इसी अधिकार का उपयोग करते हुए उत्तर प्रदेश ने यूपी आरटीई नियम 2011 अधिसूचित किए हैं, जिनमें पड़ोस के स्कूलों में दाखिले के विभिन्न उपाय शामिल हैं। इनमें दाखिले के चरण से लेकर प्रारंभिक शिक्षा पूरी होने तक के नियम कायदे शामिल हैं।
सरकार के नियमों का करें पालन
कोर्ट ने यूपी के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि एक बार जब सरकार 2009 के अधिनियम के तहत दाखिले के लिए किसी आवेदन का मूल्यांकन कर लेती है, तो स्कूल को आगे बढ़ना होगा और समय-समय पर निर्धारित अन्य प्रविधानों का पालन करना होगा।
सरकार के निर्णय पर पुनर्विचार करने के लिए स्कूल को दी गई सीमित समय-सीमा, बच्चों के शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करने में होने वाली देरी से बचने के लिए राज्य द्वारा सोच समझ कर लिया गया निर्णय है।
कोर्ट ने कहा कि इस नियामक ढांचे को अपनी मानक शक्ति आरटीई अधिनियम 2009 में निहित पड़ोस के स्कूल की अवधारणा से मिलती है।
कोर्ट ने कहा कि यह एक सोची समझी वैधानिक परिकल्पना है, जिसका उद्देश्य बच्चे के शुरुआती वर्षों के दौरान दर्जे की समानता और सामाजिक एकीकरण को व्यावहारिक रूप देना है। यह कानून स्कूलों के लिए यह अनिवार्य करता है कि वे अपनी कक्षा की कुल क्षमता के कम से कम 25 प्रतिशत तक समाज के कमजोर और वंचित वर्गों के बच्चों को प्रवेश दें।
कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार यह कानून हमारे समाज की सामाजिक संरचना में बदलाव लाने का प्रयास करता है। यह न केवल युवा भारत को शिक्षित करने की दिशा में एक कदम है बल्कि दर्जे की समानता के उद्देश्य को सुनिश्चित करने की दिशा में भी ठोस उपाय है। यह एक राष्ट्रीय मिशन होना चाहिए और यह समुचित सरकार और स्थानीय प्राधिकरण का एक अनिवार्य दायित्व होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रभावी कार्यान्वयन के लिए जरूरी है कि स्कूल उपलब्ध सीटों की जानकारी काफी पहले से प्रकाशित करे और प्रवेश से इनकार करने के किसी भी मामले को विशिष्ट कारणों के साथ दर्ज किया जाए। इन कारणों की समीक्षा शैक्षिक अधिकारियों द्वारा एक निर्धारित समयसीमा के भीतर की जानी चाहिए, ताकि जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकार्ता जैसे स्कूलों को सरकार के चयन पर कुछ असहमति हो सकती है, संबंधित अधिकारी के समक्ष पक्ष रख सकते हैं, लेकिन उन्हें इसके परिणाम की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। बल्कि उन्हें उस छात्र को प्रवेश देना अनिवार्य है जिसका नाम स्कूल को भेजी सूची में शामिल है।