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बंगाल में ‘खेला होबे’ का खूनी रूप, बीजेपी ने चंद्रनाथ रथ की हत्या को बताया TMC के डर्टी पॉलिटिक्स

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May 8, 2026


पीटीआई, नई दिल्ली। भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी के निजी सचिव चंद्रनाथ रथ की हत्या के बाद पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पर तीखा हमला बोला है।

इसने इसे बंगाल में व्याप्त ”माफिया संस्कृति” और ”महाजंगल राज” का परिणाम बताते हुए आरोप लगाया कि यह घटना राज्य में ”संस्थागत” चुनावी हिंसा का प्रमाण है।

चुनावी हार से बौखलाई टीएमसी : शिवराज

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस हत्या की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि चुनावी हार के बाद ममता बनर्जी और उनकी पार्टी पूरी तरह बौखला गई है।

उन्होंने लखनऊ में मीडिया से बातचीत में कहा, ”लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है, लेकिन हार से घबराकर टीएमसी अब खूनी खेल पर उतर आई है।” लोकतंत्र पर सीधा प्रहार : धर्मेंद्र प्रधान केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इसे लोकतंत्र पर हमला करार दिया।

उन्होंने इंटरनेट मीडिया पर लिखा कि ममता बनर्जी के शासन में ”रक्त रंजित राजनीतिक संस्कृति” को बढ़ावा दिया गया। प्रधान के अनुसार, बंगाल की सत्ता हाथ से खिसकता देख टीएमसी अपने सबसे क्रूर रूप में सामने आ रही है, जहां असहमति का जवाब हत्या से दिया जा रहा है।

भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ ने इसे ”खेला होबे” का राजनीतिक मॉडल बताया, वहीं पार्टी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने आरोप लगाया कि पिछले 15 वर्षों में बंगाल में हिंसा को संस्थागत रूप दे दिया गया है।

भाजपा नेताओं ने स्पष्ट किया कि जब भी टीएमसी को चुनावी झटका लगता है, वह भाजपा कार्यकर्ताओं को निशाना बनाना शुरू कर देती है, जिसे अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

चुनाव समापन के बाद विशेष पर्यवेक्षक के दायित्व से सुब्रत गुप्ता और एनके मिश्रा हुए कार्यमुक्त

बंगाल विधानसभा चुनाव के समापन के साथ ही निर्वाचन आयोग ने अपने विशेष पर्यवेक्षकों को उनके दायित्वों से मुक्त कर दिया है। आयोग ने गुरुवार को सुब्रत गुप्ता और एनके मिश्रा को पत्र जारी कर इस फैसले की जानकारी दी।

सुब्रत को पहले राज्य में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) प्रक्रिया के दौरान रोल आब्जर्वर के रूप में नियुक्त किया गया था। उनके कार्य से संतुष्ट होकर आयोग ने उन्हें विधानसभा चुनाव के लिए विशेष पर्यवेक्षक की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी सौंपी थी।

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वहीं, पूर्व आइपीएस अधिकारी एनके मिश्रा को विशेष पुलिस पर्यवेक्षक के रूप में तैनात किया गया था, जिनकी भूमिका चुनाव के दौरान कानून-व्यवस्था और आयोग के निर्देशों के पालन को सुनिश्चित करना था।

चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब आयोग ने दोनों अधिकारियों को उनके दायित्वों से मुक्त कर दिया है। आयोग के इस कदम को चुनावी प्रक्रिया के औपचारिक समापन का हिस्सा माना जा रहा है, जिससे स्पष्ट है कि राज्य में अब नई सरकार के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

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