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प्रवेश परीक्षा के प्रश्नपत्र बार-बार लीक होने से नाराज़ जेन ज़ी के प्रदर्शनकारियों के सड़कों पर उतरने के बाद धर्मेंद्र प्रधान को पिछले महीने शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर होना पड़ा.
उनके पद छोड़ने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तत्काल संकट से उबरने में मदद मिली है, लेकिन युवाओं की नाराज़गी को नियंत्रित रखना उनकी सरकार के लिए लंबे समय तक एक बड़ी चुनौती बना रह सकता है.
पीएम मोदी ने पेपर लीक मामलों में अभियुक्तों पर तेज़ी से मुकदमा चलाने के लिए फ़ास्ट-ट्रैक अदालतों की घोषणा की और परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए नंदन नीलेकणि को सरकारी प्रयास की अगुवाई सौंप दी.
लेकिन युवाओं की चिंता को कम करने के लिए इससे कहीं अधिक व्यापक प्रयास की ज़रूरत पड़ सकती है. युवाओं का कहना है कि उनका ऐसी व्यवस्था से धैर्य टूट रहा है, जो उन्हें नौकरियों के अवसर या ऐसा शिक्षा तंत्र नहीं दे पा रही जो उन्हें ढंग के रोज़गार दिला सके.
अर्थशास्त्री और ‘इंडिया आउट ऑफ़ वर्क: रीथिंकिंग इंडियाज़ ग्रोथ स्टोरी’ नामक नई किताब के लेखक संतोष मेहरोत्रा ने बीबीसी से कहा, “पिछले 10 सालों में लेबर मार्केट की हालत बहुत तंग हो गई है. ग़ैर-कृषि क्षेत्र की नौकरियां नहीं बढ़ रही हैं और वास्तविक मज़दूरी बढ़ोत्तरी नहीं हुई है.”
उन्होंने कहा, “भारत एक साथ दो समस्याओं का सामना कर रहा है. अर्थव्यवस्था ढांचागत रूप से कमज़ोर है, इसलिए श्रम की मांग नहीं बढ़ रही. और हमारी शिक्षा व्यवस्था इतनी कमज़ोर है कि वह ऐसे नए वर्कर तैयार नहीं कर पा रही जो रोज़गार के काबिल हों.”
बुनियादी ढांचे पर भारी सरकारी ख़र्च से जीडीपी में तेज़ वृद्धि हुई. और यह अब तक भारत की असमान आर्थिक वृद्धि को लेकर होने वाली आलोचना के लिए सरकार का मुख्य कवच रही है.
लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि पिछले महीने की उथल-पुथल शिक्षा संकट और बढ़ती युवा बेरोज़गारी का स्पष्ट संकेत है और सरकार के सामने बड़ी चुनौती पेश कर सकती है.
मेहरोत्रा के अनुसार, “देश में सीधे नकदी हस्तानांतरण (डायरेक्ट बेनिफ़िट ट्रांसफ़र-डीबीटी) समेत शुरू की गईं कई कल्याणकारी योजनाएं, इस बात का संकेत हैं कि सरकार ने कम से कम निजी स्तर पर इस समस्या को पहचान लिया है.”
लेकिन इसे ठीक करने का काम बहुत बड़ा है.
ग्रैजुएट बेरोज़गारी ने बढ़ाई चिंता
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भारत में दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है, जिसमें 15 से 29 साल की उम्र के 36 करोड़ से अधिक लोग शामिल हैं.
पिछले दो दशकों में शिक्षित होने वालों की संख्या काफ़ी बढ़ी है और निजी कॉलेजों और व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थानों की संख्या में भी तेज़ी से बढ़ोत्तरी हुई है.
हालांकि, अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की ‘स्टेट ऑफ़ वर्किंग इंडिया 2026 रिपोर्ट’ के अनुसार, “शिक्षा से रोज़गार की ओर पड़ाव एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, खासकर ग्रेजुएट्स के लिए.”
युवाओं में बेरोज़गारी की दर अधिक उम्र के लोगों की तुलना में लगभग चार गुना अधिक है और दुनिया के औसत से काफ़ी अधिक है.
यह समस्या नई नहीं है. पिछले 25 सालों से ग्रैजुएट्स में बेरोज़गारी दर 35-40% के आसपास बनी हुई है.
लेकिन भारत की जनसंख्या वृद्धि या लेबर फ़ोर्स में आने वाली आबादी के बढ़ते आकार और बेहतर शैक्षिक परिणामों के कारण हाल के सालों में यह समस्या और भी बढ़ गई है.
साल 1983 में, 20 से 29 वर्ष की उम्र वर्ग के लोगों में से 4% ग्रैजुएट थे, और उनमें से 13% बेरोज़गार थे. 2023 में, 28% ग्रैजुएट थे और उनमें से 67% बेरोज़गार थे.
शिक्षा की गुणवत्ता रोज़गार की काबिलियत को प्रभावित करने वाली एक प्रमुख चुनौती बनी हुई है, जबकि ग्रैजुएट लोगों की संख्या में बढ़ोत्तरी के बावजूद उसी अनुपात में रोज़गार में बढ़ोत्तरी नहीं हुई है.
रिपोर्ट में पाया गया, “2004-05 और 2023 के बीच, जहां हर साल लगभग 50 लाख ग्रैजुएट जुड़े, वहीं केवल लगभग 28 लाख युवाओं को ही रोज़गार मिला और वेतनभोगी रोज़गार पाने वालों का हिस्सा और भी कम था. इससे ग्रैजुएट बेरोज़गारी में वृद्धि हुई और आमदनी में वृद्धि दर धीमी हो गई.”
रिपोर्ट के अनुसार, ग्रैजुएट या पोस्ट ग्रैजुएट लोगों में से केवल 3.7% को ही उच्च स्तर का रोज़गार मिला और 7% से भी कम को परमानेंट सैलरी वाली नौकरियां मिलीं.
आईटी सेक्टर और मैन्युफ़ैक्चरिंग में संकट
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यह कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसका जल्द से जल्द समाधान हो सके.
मेहरोत्रा कहते हैं, “छोटे और मध्यम आकार के उद्योगों (एसएमई) के में तत्काल सुधार से निश्चित रूप से कुछ नौकरियां पैदा हो सकती हैं. क्योंकि ‘नोटबंदी’ और जीएसटी के कारण नए रोज़गार पूरी तरह से ठप हो गए.”
हालांकि, उन्होंने आगे कहा कि भारत को मैन्युफ़ैक्चरिंग को फिर से ज़िंदा करने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए एक नई औद्योगिक नीति के बारे में सोचने की ज़रूरत होगी.
उनके अनुसार, “जीडीपी में मैन्यूफ़ैक्चरिंग क्षेत्र की हिस्सेदारी साल 2015 में 17% से घटकर मौजूदा समय में 14% हो गई है. और मैन्यूफ़ैक्चरिंग में रोज़गार 2015 के बाद पांच सालों तक गिरा और अब जाकर उन स्तरों से थोड़ा ऊपर चढ़ा है.”
मेहरोत्रा का कहना है कि इस हीच 2020 के बाद कृषि क्षेत्र में कुल रोज़गार में वास्तव में 8 करोड़ लोगों की वृद्धि हुई है, जो अप्रत्यक्ष बेरोज़गारी का स्पष्ट संकेत है.
ऐसा इसलिए है क्योंकि तेज़ी से औद्योगीकरण वाली अर्थव्यवस्था में लेबर आमतौर पर कृषि छोड़कर सर्विस या मैन्युफ़ैक्चरिंग क्षेत्र में चले जाते हैं, जैसा कि दुनिया भर में देखा जाता है.
इन सभी चुनौतियों में एआई के आ जाने से भी जटिलता आ गई है क्योंकि सॉफ़्टवेयर जैसे प्रमुख रोज़गार पैदा करने वाले उद्योगों का व्यावसायिक मॉडल तीन दशकों से भारतीय मध्यम वर्ग के सपने की जान रहा है.
वॉल स्ट्रीट बैंक गोल्डमैन सैक्स की हालिया रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि भारत में खेती बारी के अलावा जो नौकरियां हैं उनमें 8-12% नौकरियां एआई की वजह से कम हो सकती हैं और इसके असर अभी से दिखने लगे हैं.
भारत की सबसे प्रमुख स्टाफ़िंग एजेंसियों में से एक, टीम लीज डिज़िटल की सीईओ नीति शर्मा के अनुसार, हाल के महीनों में आईटी क्षेत्र में नई नौकरियों की रफ़्तार 10 फ़ीसदी से कम ही रही.
टेंपरेरी ठेका प्रथा बढ़ी है, सैलरी सालों से स्थिर बनी हुई है और नॉलेज आधारित नौकरियां जिन्हें भारतीय ग्रैजुएट दो दशक पहले आसान मानते थे, अब उतनी बड़ी संख्या में उपलब्ध नहीं हैं.
डिग्री की जगह हुनर बना मानदंड
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हाल ही में चेन्नई में देश की सबसे बड़ी सॉफ़्टवेयर कंपनियों में से एक एचसीएल टेक्नोलॉजीज़ के एक कार्यक्रम में सैकड़ों कर्मचारियों ने एक साथ ‘वी वांट ए हाइक’ (हमें वेतन बढ़ोत्तरी चाहिए) के नारे लगाए.
यह इस बात का संकेत है कि जो सेक्टर कभी बेहतर जीवन का सुनहरा मौका माना जाता था, वहां भी निराशा है.
शर्मा ने बीबीसी से कहा, “युवा ग्रैजुएट्स को अपने सोचने का तरीक़ा नई वास्तविकता के अनुसार बदलना होगा ताकि सफ़ेदपोश नॉलेज आधारित नौकरियां कम हो रही हैं. और शिक्षा संस्थानों को केवल नॉलेज आधारित शिक्षा देने के बजाय व्यावसायिक हुनर देने की दिशा में बदलाव करना होगा, क्योंकि भर्ती अब केवल डिग्री के आधार पर नहीं बल्कि वास्तविक हुनर के आधार पर हो रही है.”
इसका सीधा मतलब है कि ग्रैजुएट डिग्री रखने वाले युवा भारतीयों को भी प्लंबर, बिजली मिस्त्री और मैकेनिक जैसे काम करने की वास्तविकता स्वीकार करनी पड़ सकती है और यह ज़रूरी नहीं कि उन्हें वातानुकूलित दफ्तरों में आरामदायक करियर मिले.
इसका मतलब यह भी है, जैसा कि प्रमुख बाजार निवेशक देविना मेहरा ने एक्स पर लिखा, “हम ऐसी पीढ़ी की बात कर रहे हैं जो अब अपने माता-पिता से बेहतर जीवन स्तर को स्वाभाविक मानकर नहीं चल सकती.”
मेहरा के अनुसार, “भारत के विकास के इतने शुरुआती चरण में ही आमदनी का ठहर जाना एक ‘आपदा’ साबित हो सकता है और इसे रोकने के लिए मोदी सरकार को बहुत गंभीरता से काम करना होगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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