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‘राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव से संपत्ति का मालिकाना हक नहीं बदलता’, सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

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Aug 24, 2026


डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि राजस्व रिकॉर्ड में किसी संपत्ति के म्यूटेशन यानी दाखिल-खारिज या नामांतरण से मालिकाना हक न तो बनता है और न ही खत्म होता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी संपत्ति के टाइटल का फैसला केवल राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि इसे अन्य सबूतों के साथ परखा जाना चाहिए।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद कर दिया, जिसमें केवल राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर संपत्ति विवाद का फैसला सुनाया गया था।

पीठ ने कहा कि किसी अन्य व्यक्ति के पक्ष में राजस्व एंट्री होने मात्र से यह नहीं माना जा सकता कि अचल संपत्ति में अधिकार स्वेच्छा से छोड़ दिया गया है। जिस पक्ष को इसका लाभ लेना है, उसे स्वतंत्र सबूतों के जरिए इसे साबित करना होगा।

केवल वित्तीय उद्देश्यों के लिए है राजस्व रिकॉर्ड

पीठ ने कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि यह एक स्थापित कानून है कि राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज प्रविष्टि न तो कोई मालिकाना हक बनाती है और न ही उसे समाप्त करती है। यह मुख्य रूप से टैक्स या लगान वसूली के लिए होती है।

अदालत ने आगे कहा कि नायब तहसीलदार का आदेश राजस्व रिकॉर्ड को विनियमित कर सकता है, लेकिन केवल एक व्यक्ति की जगह दूसरे का नाम दर्ज करने से यह संपत्ति के अधिकारों का हस्तांतरण या त्याग नहीं बन जाता। संपत्ति के वास्तविक मालिकाना हक को तय करने का अधिकार पूरी तरह से सिविल कोर्ट के पास है।

साक्ष्य के तौर पर खंडन योग्य है प्रविष्टि

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 117 के तहत राजस्व प्रविष्टि की सत्यता की वैधानिक मान्यता एक खंडन योग्य साक्ष्य है, न कि मालिकाना हक की मान्यता। इसका मूल्यांकन बाकी सबूतों के साथ किया जाना चाहिए।

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