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‘लतीफ़ को मत भूलना’: क्या बीजेपी ने सालों तक गुजरात में एक गैंगस्टर का सियासी फ़ायदा उठाया?

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Sep 22, 2026


अहमदाबाद में डॉन अब्दुल लतीफ़ के साथ दिखाई देता भाजपा का झंडा

इमेज स्रोत, Getty/FB

इमेज कैप्शन, 1980 के दशक में अहमदाबाद में अब्दुल लतीफ़ के साम्राज्य से शायद कोई ही अपरिचित हो

साल 1995 में लतीफ़ के शार्पशूटर शरीफ़ और एक अन्य साथी को पकड़ने के बाद पुलिस अधिकारी गीता जौहरी तीन पुलिसकर्मियों के साथ लतीफ़ के घर के बाहर खड़ी थीं.

उन्होंने अतिरिक्त सहायता के लिए पुलिस कंट्रोल रूम को फ़ोन किया. मदद के लिए दरियापुर के पोपटियावाड़ के पास एक पुलिस वैन आई, यह लतीफ़ के घर का इलाक़ा था.

लेकिन वह अंदर नहीं गई, पुलिसकर्मी अंदर जाने को तैयार नहीं थे. कारण यह था कि पुलिसकर्मियों को यकीन नहीं हो रहा था कि उन्हें सचमुच लतीफ़ के घर जाना है.

इस घटना का ज़िक्र गुजरात के जाने-माने पत्रकार प्रशांत दयाल ने अपनी पुस्तक ‘लतीफ़’ में किया है. इससे लतीफ़ के प्रभाव और पुलिस में भी उसके फैले ख़ौफ़ का अंदाज़ा लगता है.

1980 के दशक में अहमदाबाद के ‘डॉन’ अब्दुल लतीफ़ के साम्राज्य से शायद ही कोई अपरिचित होगा.

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अगर लतीफ़ न होते तो क्या गुजरात में बीजेपी मज़बूत न होती?

रिटायर प्रोफ़ेसर घनश्याम शाह का मानना है कि यह कहना सही नहीं है कि ‘अगर लतीफ़ न होते तो गुजरात में बीजेपी इतनी मज़बूत न होती’.

लेकिन यह ज़रूर कहा जा सकता है कि गुजरात के इस राजनीतिक माहौल में लतीफ़ ने एक कैटलिस्ट की भूमिका निभाई.

उनका कहना है, “बीजेपी ने 1985 के बाद के वर्षों में चल रहे आरक्षण विरोधी आंदोलन को चतुराई से अपने पक्ष में मोड़ लिया. लतीफ़ आदि को बढ़ावा देकर गुजरात में दंगे भी हुए, लेकिन नुक़सान दोनों पक्षों को हुआ. हमें यह भी याद रखना चाहिए कि 1969 के भयावह दंगों या 2002 के दंगों के समय लतीफ़ नहीं था.”

उर्विश कोठारी अहमदाबाद स्थित वरिष्ठ स्तंभकार और लेखक हैं. उन्होंने कहा, “लतीफ़ एक समय बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए उपयोगी था, और दोनों ने समय-समय पर उनका इस्तेमाल किया.”

“लेकिन गुजरात में हिंदू बहुसंख्यक होने के बावजूद, लक्ष्य ऐसा माहौल बनाना था जहां ऐसा दिखाया जा सके कि ‘हिंदू भय और खतरे में है’. इसके लिए लतीफ़ ज़रूरी था.”

“लतीफ़ ने भले ही कांग्रेस को फायदा पहुंचाया हो, लेकिन उन्होंने बीजेपी को उससे कहीं ज़्यादा फायदा पहुंचाया है.”

उर्वीश कोठारी कहते हैं, “उस समय बीजेपी को वास्तव में ऐसे प्रतीकों की ज़रूरत थी जो जनता से कनेक्ट कर सकें. उस समय अहमदाबाद में लगातार दंगे हो रहे थे.”

वह यह भी कहते हैं, “आज अगर आप अहमदाबाद में किसी भी मिडिल ऐज के व्यक्ति से मिलेंगे तो उनके मन में मुस्लिम लोगों के प्रति नकारात्मक भाव की कोई न कोई कहानी ज़रूर सुन लेंगे.”

उनके मुताबिक़, “दरअसल, बीजेपी ने लतीफ़ का भरपूर इस्तेमाल करके ऐसा माहौल, ऐसी चर्चा और ऐसा वातावरण तैयार किया.”

“ज़रा सोचिए कि 89 प्रतिशत हिंदू आबादी वाले गुजरात में एक बड़ी आबादी के मन में असुरक्षा की भावना पैदा करना कितना बड़ा काम है. बीजेपी ने गुजरात में ऐसा असंभव काम कर दिखाया है.”

हालांकि, उनका स्पष्ट मानना है कि लतीफ़ के होने या न होने से बीजेपी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.

उनका कहना है, “अगर आप बीजेपी की राजनीति को देखें, तो आज यह स्पष्ट है कि अगर लतीफ़ नहीं होता, तो शायद बीजेपी नया लतीफ़ बना लेती. दरअसल, लतीफ़ से मिली सफलता उनकी प्रचार रणनीति का परिणाम थी.”

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इतने साल बाद भी बीजेपी ‘लतीफ़’ की याद दिलाती है

गुजरात में लगभग सभी चुनावों में लतीफ़ का नाम आज भी गूंजता है. इस साल हुए अहमदाबाद नगर निगम चुनावों में भी उनका नाम फिर से गूंजा.

उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने 21 अप्रैल, 2026 को अहमदाबाद के दरियापुर में आयोजित एक बैठक में लोगों को लतीफ़ की याद दिलाई थी.

उन्होंने कहा , “मुझे इस इलाके के लोगों को कांग्रेस के कुशासन की याद दिलाने की ज़रूरत नहीं है. याद है न? अपनी ज़मीन पर जीना हमारे लिए कितना मुश्किल था. कांग्रेस के शासनकाल में हमारा शहर ‘लतीफ़ के शहर’ के नाम से जाना जाता था. बीजेपी के शासनकाल में चाहे लतीफ़ हो या लतीफ़ के दादा, सबको घर भेज दिया गया.”

इसी तरह, बीजेपी के पूर्व विधायक भूषण भट्ट ने 15 अप्रैल, 2026 को अपने चुनाव प्रचार के दौरान लतीफ़ को याद किया.

खाड़िया में एक सभा में उन्होंने कहा, “उस समय शाहपुर, जमालपुर और खाड़िया छोड़कर लोगों को क्यों जाना पड़ा? 1980 और 1990 के दशक में पूरे गुजरात में यह बात मशहूर थी कि अहमदाबाद की पुलिस और प्रशासन लतीफ़ के हाथों में था. आपको याद है न? हम खाड़िया को पाकिस्तान नहीं बनने देंगे.”

हालांकि, इस बार बीजेपी इसी खाड़िया में हार गई जो चार दशकों से उसका गढ़ था.

इससे पहले, जब 2017 में फिल्म ‘रईस’ रिलीज़ हुई थी, तब यह चर्चा थी कि यह लतीफ़ के जीवन पर आधारित है, और उसी साल 2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव भी हुए थे.

इस संबंध में हमने गुजरात बीजेपी के मीडिया प्रभारी से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने इस मुद्दे पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया और कहा कि पार्टी इस मामले पर टिप्पणी नहीं करना चाहती है.

अहमदाबाद के जमालपुर-खाड़िया क्षेत्र के पूर्व विधायक और बीजेपी नेता भूषण भट्ट ने लतीफ़ के प्रभुत्व के वर्षों को करीब से देखा है. उनका कहना है कि उस समय अहमदाबाद में लतीफ़ की पहुंच अकल्पनीय थी.

एक उदाहरण देते हुए वो कहते हैं, “लतीफ़ को मेरे पिता विधायक अशोक भट्ट और पुलिस आयुक्त के बीच फ़ोन पर एक कांस्टेबल के तबादले के बारे में हुई बात की भी जानकारी तुरंत मिल गई थी. इससे इसके साम्राज्य का पता चलता है. हत्याओं, गोलीबारी और दूसरी चीज़ों की तो बात ही छोड़िए.”

वह कहते हैं, “लतीफ़ की वजह से गुजरात की राजनीति उत्तर प्रदेश और बिहार की तरह एनकाउंटर राज की ओर बढ़ रही थी. लतीफ़ के अंत के साथ ही यह सब रुक गया. वह माहौल जहां सरकार, मीडिया, व्यवस्था सब जो उसके इशारों पर चलता था, वह सब समाप्त हो गया.”

हालांकि, वो यह कहते हैं कि यह सही नहीं है कि लतीफ़ की वजह से बीजेपी को गुजरात में राजनीतिक लाभ मिला.

भूषण भट्ट कहते हैं, “अगर केशुभाई की सरकार ने लाल आंख नहीं दिखाई होती तो, आज गुजरात एक अलग राह पर होता. गुजरात में शांति और सुरक्षा केवल बीजेपी सरकार के उठाए गए कदमों के कारण ही है.”

प्रोफ़ेसर घनश्याम शाह कहते हैं, “बीजेपी ज़रूरत पड़ने पर लतीफ़ का इस्तेमाल करती रही है.”

उर्वीश कोठारी कहते हैं, “लतीफ़ की मृत्यु के बाद, उसका असर कम होता गया और फिर नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री बने. बाद में, इस तरह के चुनाव प्रचार में उन्होंने लतीफ़ का नाम लेना बंद कर दिया और फिर ‘मियां मुशर्रफ़’ और ‘पाकिस्तान’ का ज़िक्र करने लगे. लतीफ़ अब उनके लिए छोटा होने लगा था. अब तो लतीफ़ अतीत की बात हो गया है. अब बीजेपी को उनकी ज़रूरत भी नहीं है, क्योंकि उसके पास और बहुत सारी चीज़ें है.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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