पीटीआई, नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पंजाब सरकार भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) परियोजना से जुड़े हिमाचल प्रदेश के 1966 से बकाया भुगतान को लेकर उसके द्वारा पेश प्रस्ताव पर सहमति के बेहद करीब है।
केंद्र ने 30 जुलाई को शीर्ष अदालत को बताया था कि बकाया भुगतान के लिए सहयोगी राज्यों के बीच एक नए ‘कैशलेस’ फार्मूले पर आपसी सहमति बन सकती है।
न्यायालय ने तब दर्ज किया था कि हिमाचल और हरियाणा की सरकारें केंद्र के प्रस्ताव पर सैद्धांतिक रूप से सहमत हो गई हैं, लेकिन पंजाब सरकार ने इस पर आपत्ति जताई है। न्यायालय ने पंजाब सरकार को प्रस्ताव न मानने के लिए फटकार लगाई और कहा कि उसे अदालत के आदेशों का अनुपालन नहीं करने की आदत है।
हिमाचल प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने बुधवार को चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और वी. मोहना की पीठ से कहा कि शीर्ष अदालत ने इस मामले को इसलिए सूचीबद्ध किया है ताकि यह पता लगाया जा सके कि पंजाब सरकार केंद्र के प्रस्ताव से सहमत है या नहीं।
केंद्र की ओर से पेश हुए अटार्नी जनरल (एजी) आर. वेंकटरमणी ने पीठ से कहा कि पंजाब सहमति के बहुत करीब आ रहा है। सभी एक दिशा में बढ़ रहे हैं।
उन्होंने पीठ से मामले को अगले सप्ताह सूचीबद्ध करने का अनुरोध करते हुए कहा-‘मुझे लगता है कि हम कमियों को दूर कर लेंगे।’इसके बाद पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त तक टाल दी।
सूत्रों के मुताबिक, बीबीएमबी एक नवंबर 2011 के बाद से भाखड़ा ब्यास परियोजना से हिमाचल प्रदेश के हिस्से की बिजली के लिए 7.19 प्रतिशत का भुगतान कर रहा है जबकि पंजाब और हरियाणा ने बीबीएमबी परियोजना के पिछले बकाया का भुगतान नहीं किया है जो 13,066 मिलियन यूनिट बिजली के बराबर है।
केंद्र के प्रस्ताव में कहा गया है कि चूंकि भुगतान के लिए बिजली की कीमत को लेकर पक्षकारों के बीच कोई सहमति नहीं बनी, इसलिए पंजाब और हरियाणा से हिमाचल को बिजली के रूप में भुगतान करने का सुझाव दिया गया है।
यह भी तय किया गया कि हिमाचल, पंजाब और हरियाणा को 420 करोड़ रुपये का बकाया नहीं देगा और यह रकम 13,066 मिलियन यूनिट बिजली से समायोजित की जाएगी।